Rig Veda Sukta 77
Mandala 8Sukta 7711 Mantras

Sukta 77

Sukta 8.77

Devata

Indra

यह सूक्त इन्द्र की स्तुति करता है—उनके जन्म से ही उन्हें निर्णायक, बहु-शक्तिशाली वीर के रूप में स्मरण करता है, जो योग्य मित्रों की खोज करता है और तुरंत संग्राम तथा दान-समृद्धि की ओर प्रवृत्त होता है। इसमें पर्वतों को विदीर्ण कर पोषण और धन-वैभव को मुक्त करने वाले उनके कर्म का स्मरण है, और उनके सुगढ़, पूर्णतः निर्मित आयुधों तथा भुजाओं की प्रशंसा है, जो विजयकारी ऋत-व्यवस्था के साधन हैं। इसका प्रयोजन यजमान और समुदाय के लिए इन्द्र की सुनवाई और सहायता—बल, रक्षा और प्रचुरता—का आह्वान करना है।

Mantras

Mantra 1

जज्ञानो नु शतक्रतुर्वि पृच्छदिति मातरम् । क उग्राः के ह शृण्विरे ॥

नवजात शतक्रतु इन्द्र ने भीतर ही अपनी माता से पूछा— “वे उग्र कौन हैं? और कौन सचमुच (मेरी पुकार) सुनेंगे?”— मानो सत्य-युद्ध के सहायक खोज रहा हो।

Mantra 2

आदीं शवस्यब्रवीदौर्णवाभमहीशुवम् । ते पुत्र सन्तु निष्टुरः ॥

तब सामर्थ्यवती माता ने उसके विषय में कहा— ‘ऊर्णावाभ, महीशुव’: “हे पुत्र, वे ही तुम्हारे लिए प्रतिरोध को गिराने वाले, निश्चय-विजयी बनें।”

Mantra 3

समित्तान्वृत्रहाखिदत्खे अराँ इव खेदया । प्रवृद्धो दस्युहाभवत् ॥

तब वृत्रहन् ने उन पर दबाव डाला और उन्हें क्षीण किया— जैसे धुरी-स्थान में अरों को घिसा जाता है; बल में प्रवृद्ध होकर वह भीतर के दस्यु का हन्ता बन गया।

Mantra 4

एकया प्रतिधापिबत्साकं सरांसि त्रिंशतम् । इन्द्रः सोमस्य काणुका ॥

इन्द्र—तीक्ष्ण वीर—एक ही स्थिर विधान से सोम का पान करता है; एक साथ तीस धाराएँ (सराएँ) उसने पी लीं—आनन्द-शक्ति की विराट परिपूर्णता को अपने भीतर धारण करते हुए।

Mantra 5

अभि गन्धर्वमतृणदबुध्नेषु रजस्स्वा । इन्द्रो ब्रह्मभ्य इद्वृधे ॥

इन्द्र ने लोकों के अथाह रजस्-प्रदेशों के अधो-गह्वर में गन्धर्व को परास्त किया; और ऋषियों के ब्रह्म (पवित्र वाणी) के लिए वह वृद्धि पाता है—मन्त्र का रक्षक और सिद्धिकर्ता बनकर।

Mantra 6

निराविध्यद्गिरिभ्य आ धारयत्पक्वमोदनम् । इन्द्रो बुन्दं स्वाततम् ॥

इन्द्र ने उसे पर्वतों से भेदकर निकाला और पका हुआ अन्न-रस धारण कराया; उसने सुगठित भण्डार—पूर्णता में विस्तृत—जीव के पोषण हेतु प्राप्त किया।

Mantra 7

शतब्रध्न इषुस्तव सहस्रपर्ण एक इत् । यमिन्द्र चकृषे युजम् ॥

हे इन्द्र! शत-गाँठों वाला बाण तेरा है—सहस्र-पंखों वाला, एक ही होकर भी पर्याप्त; उसी से तूने अपना विजय-युग्म (युजम्) रचा है।

Mantra 8

तेन स्तोतृभ्य आ भर नृभ्यो नारिभ्यो अत्तवे । सद्यो जात ऋभुष्ठिर ॥

उसी (विजयी सामर्थ्य) से स्तोताओं के लिए—नरों और नारियों के लिए—भोग्य, तृप्तिदायक अन्न ला; क्योंकि तू ऋभुष्ठिर है—कौशल में स्थिर, क्षणमात्र में जन्मा (तत्क्षण सिद्ध)।

Mantra 9

एता च्यौत्नानि ते कृता वर्षिष्ठानि परीणसा । हृदा वीड्वधारयः ॥

ये ते च्यौत्न—तेजस्वी प्रेरणाएँ—हैं; परिपूर्णता से गढ़े हुए तेरे अति-प्रचुर कर्म; और हृदय के अंतर्धारण से तूने दृढ़, प्रतिरोधी बल को संभाले रखा है।

Mantra 10

विश्वेत्ता विष्णुराभरदुरुक्रमस्त्वेषितः । शतं महिषान्क्षीरपाकमोदनं वराहमिन्द्र एमुषम् ॥

निश्चय ही, उरुक्रम विष्णु ने—तेरी प्रज्वलित प्रेरणा से प्रेरित होकर—ये सब तेरे लिए ला दिए: सौ महिष (बलवान् शक्तियाँ), क्षीर-पाक अन्न/ओदन, और वराह—एमुष—हे इन्द्र, वश में करके रूपान्तरित करने योग्य बल के रूप में।

Mantra 11

तुविक्षं ते सुकृतं सूमयं धनुः साधुर्बुन्दो हिरण्ययः । उभा ते बाहू रण्या सुसंस्कृत ऋदूपे चिदृदूवृधा ॥

तेरा धनुष दूर तक पहुँचने वाला, सुगढ़ और सुमय (उत्साह-बल से परिपूर्ण) है; स्वर्ण-नोक वाला बाण/प्रहार सीधा और साधु है। और तेरी दोनों भुजाएँ रमणीय, पूर्णतः संस्कृत हैं—ऋदूप (कोमल) मार्गों में भी बढ़ती हुई, कोमल शक्ति को भी बढ़ाने वाली।

Frequently Asked Questions

It praises Indra’s many-powered heroism—from his very birth—to show that he hears the call, defeats obstacles, and brings nourishment, wealth, and victory to his allies.

It is a poetic image for Indra breaking through hard obstruction and releasing hidden bounty—food, wealth, and sustaining power—into the human world.

It can be recited as an Indra-invocation for courage and breakthrough—especially when seeking strength to overcome resistance and to ‘open’ stuck resources into steady support.

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