
Sukta 8.76
Indra (with Maruts)
यह सूक्त मरुतों सहित इन्द्र का आह्वान करता है—उन्हें शक्ति के अजेय स्वामी के रूप में, यज्ञ में पधारने, सोमपान करने, और उपासकों के लिए विजय तथा वृद्धि सुनिश्चित करने हेतु प्रेरित करता है। युद्ध-भाव और अनुष्ठानिक आमंत्रण के साथ-साथ इसमें प्रेरित वाणी (वाच्) पर एक चिंतनशील संकेत भी है, जो इन्द्र के द्वारा उदित होती है; इस प्रकार बाह्य विजय को ऋत (सत्य-व्यवस्था) के माध्यम से होने वाले आन्तरिक गठन से जोड़ा गया है।
Mantra 1
इमं नु मायिनं हुव इन्द्रमीशानमोजसा । मरुत्वन्तं न वृञ्जसे ॥
मैं अब इस मायिन् इन्द्र को पुकारता हूँ—ओज से ईशान, सामर्थ्य का स्वामी; मरुतों सहित, जो प्रकाश के संग्राम में विचलित न होने वाला है।
Mantra 2
अयमिन्द्रो मरुत्सखा वि वृत्रस्याभिनच्छिरः । वज्रेण शतपर्वणा ॥
यह इन्द्र, मरुतों का सखा, शतपर्व वज्र से वृत्र का शिर विदीर्ण कर गया—अवरोध की गाँठ तोड़कर, ताकि शक्ति और प्रकाश की धाराएँ मुक्त होकर बहें।
Mantra 4
अयं ह येन वा इदं स्वर्मरुत्वता जितम् । इन्द्रेण सोमपीतये ॥
यह वही है जिसके द्वारा मरुतों के साथ यह स्वर्गलोक (स्वर्) जीता गया—वही इन्द्र, जो सोमपान के लिए आता है, ताकि प्रकाश का आनन्द हमारे भीतर प्रतिष्ठित हो।
Mantra 5
मरुत्वन्तमृजीषिणमोजस्वन्तं विरप्शिनम् । इन्द्रं गीर्भिर्हवामहे ॥
हम अपनी प्रेरित वाणियों से इन्द्र का आह्वान करते हैं—मरुतों से युक्त, अपने पथ में सीधा चलने वाला, बल से परिपूर्ण, व्यापक प्रभावी कर्म वाला इन्द्र—कि वह हमारे होने की शक्ति का विस्तार करे।
Mantra 6
इन्द्रं प्रत्नेन मन्मना मरुत्वन्तं हवामहे । अस्य सोमस्य पीतये ॥
हम प्राचीन आकांक्षामय मन से मरुतों से युक्त इन्द्र का आह्वान करते हैं—इस सोम के पान के लिए—कि पुरातन और सत्य बल हमारे भीतर फिर से जाग उठे।
Mantra 7
मरुत्वाँ इन्द्र मीढ्वः पिबा सोमं शतक्रतो । अस्मिन्यज्ञे पुरुष्टुत ॥
हे मरुतों सहित इन्द्र, हे मीढ्वः (उदार दाता), हे शतक्रतो (शत-शक्ति वाले), इस यज्ञ में—हे पुरुष्टुत (बहु-स्तुत)—सोम का पान करो।
Mantra 8
तुभ्येदिन्द्र मरुत्वते सुताः सोमासो अद्रिवः । हृदा हूयन्त उक्थिनः ॥
हे मरुत्वते इन्द्र, हे अद्रिवः (वज्र/अद्रि धारण करने वाले), ये सुते हुए सोम-रस केवल तुम्हारे लिए हैं; उक्थिन (स्तोत्र-गायक) हृदय से तुम्हें उक्थ द्वारा पुकारते हैं।
Mantra 9
पिबेदिन्द्र मरुत्सखा सुतं सोमं दिविष्टिषु । वज्रं शिशान ओजसा ॥
हे मरुत्सखा इन्द्र, दिविष्टिषु (दिव्य ऊँचाइयों/प्रकाशमय प्रयत्नों) में यह सुता हुआ सोम पियो; ओज से वज्र को शिशान (तेज/धार) करते हुए।
Mantra 10
उत्तिष्ठन्नोजसा सह पीत्वी शिप्रे अवेपयः । सोममिन्द्र चमू सुतम् ॥
हे इन्द्र! तू बल के साथ उठ खड़ा हुआ; पीकर, हे शिप्र (ओष्ठोंवाले), तूने अपने ओठों को कम्पित किया। हे इन्द्र, चमू (पात्र) में निचोड़ा हुआ सोम पान कर।
Mantra 11
अनु त्वा रोदसी उभे क्रक्षमाणमकृपेताम् । इन्द्र यद्दस्युहाभवः ॥
जब तू दस्यु-हन् (दस्युओं का संहारक) बना, हे इन्द्र, तब दोनों—रोदसी, द्यौ और पृथिवी—अपने क्रन्दन के साथ तेरे पीछे चलीं और तुझे नहीं छोड़ा।
Mantra 12
वाचमष्टापदीमहं नवस्रक्तिमृतस्पृशम् । इन्द्रात्परि तन्वं ममे ॥
मैं उस वाणी को अपने भीतर रचता हूँ जो अष्टपदी है, नवस्रक्ति (नव शक्तियों की माला) से विभूषित है, और ऋत को स्पर्श करती है। इन्द्र से ही मैं अपनी तनु (स्व-देह/स्व-स्वरूप) को परि—आवृत कर—गढ़ता हूँ।
Because the Maruts are Indra’s storm-like companions who intensify his power. Together they represent unstoppable force that clears obstacles and brings victory, rain, and increase.
The hymn repeatedly invites Indra to come to the sacrifice and drink the Soma. Accepting Soma signifies his active presence and his readiness to grant strength and success to the worshippers.
It says the poet forms an inspired, truth-touching speech within himself—structured and powerful—and that this inner capacity comes through Indra. In other words, Indra’s gift is not only outer victory but also inner clarity and right expression.
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