Rig Veda Sukta 29
Mandala 8Sukta 2910 Mantras

Sukta 29

Sukta 8.29

Devata

A single deity-power presented as 'the One' (likely Agni/Indra-type heroic power; identification uncertain from isolated verses)

यह सूक्त एक अद्वितीय वीर दिव्य शक्ति का चिन्तन करता है, जिसे “एक” कहा गया है। वह विशिष्ट रूप से गतिमान है, स्वर्णिम तेज से अपने को आच्छादित करता है, और गुप्त मार्गों तथा अन्तःस्थित “निधियों” को जानता है। यह “एक” ऋषियों के प्रेरित साम-गान (सामन्) से भी जोड़ा गया है, जिसके द्वारा छिपा हुआ प्रकाश प्रकट होता है और सूर्य को उदित-प्रकाशमान किया जाता है—मानो यह आवरण पर प्रकाश की, गूढ़ विजय का संकेत हो।

Mantras

Mantra 1

बभ्रुरेको विषुणः सूनरो युवाञ्ज्यङ्क्ते हिरण्ययम् ॥

एक ही—बभ्रु (ताम्र-भूरा), अपनी गति में विशिष्ट—वह युवा, बलवान्; वह स्वर्णमय तेज से अपने को अभ्यञ्जित करता और अलंकृत करता है।

Mantra 2

योनिमेक आ ससाद द्योतनोऽन्तर्देवेषु मेधिरः ॥

एक ही योनि (आधार/स्रोत) में आसीन हुआ; देवों के भीतर दीप्तिमान, वह मेधावी—बुद्धि का विवेकपूर्ण नियन्ता है।

Mantra 3

वाशीमेको बिभर्ति हस्त आयसीमन्तर्देवेषु निध्रुविः ॥

एक ही अपने हाथ में लोहे की वाशी (कुल्हाड़ी/अज़) धारण करता है; देवों के भीतर वह दृढ़—अचल स्थापक, कर्म का स्थिर नियामक है।

Mantra 4

वज्रमेको बिभर्ति हस्त आहितं तेन वृत्राणि जिघ्नते ॥

एक (इन्द्र) अपने हाथ में स्थापित वज्र धारण करता है; उसी से वह वृत्रों को—प्रकाश और बल के प्रवाह को रोकने वाले समस्त आवरणों को—वध करता है।

Mantra 5

तिग्ममेको बिभर्ति हस्त आयुधं शुचिरुग्रो जलाषभेषजः ॥

एक (इन्द्र) अपने हाथ में तीक्ष्ण आयुध धारण करता है; वह शुद्ध, उग्र—जलाष-भेषज, जीवन-जल को पुनः प्रवाहित करने वाला उपचारक है।

Mantra 6

पथ एकः पीपाय तस्करो यथाँ एष वेद निधीनाम् ॥

एक ही पथों को जानता है और उन्हें गति से परिपूर्ण कर देता है; जैसे चोर निधियों को जानता है—वैसे ही यह शक्ति हमारे भीतर के गुप्त निक्षेपों को जानती है।

Mantra 7

त्रीण्येक उरुगायो वि चक्रमे यत्र देवासो मदन्ति ॥

एक (परम) उरुगाय—विस्तृत गमनवाला—ने तीनों लोकों को नापकर विभक्त किया; वहीं देवगण आनंदित होकर प्रकाशमय मद (उल्लास) में रमते हैं।

Mantra 8

विभिर्द्वा चरत एकया सह प्र प्रवासेव वसतः ॥

विभिन्न शक्तियों से दो चलते हैं, पर एक के साथ मिलकर ही अग्रसर होते हैं; वे ऐसे वास करते और बढ़ते हैं मानो आत्म-यात्रा के दूर-दीप्त विस्तार में।

Mantra 9

सदो द्वा चक्राते उपमा दिवि सम्राजा सर्पिरासुती ॥

दो सदस् (आसन) उन्होंने रचे—स्वर्ग में अनुपम; दो सम्राट, जो सर्पि (घृत) की धारा को उँडेलते हैं—दीप्त पोषण का हवि-रूप अर्पण।

Mantra 10

अर्चन्त एके महि साम मन्वत तेन सूर्यमरोचयन् ॥

कुछ जन अपने स्तोत्र की ज्वाला से उस महान् सामन् का बोध करते हैं; उसी के द्वारा उन्होंने सूर्य को प्रकाशित किया—गुप्त प्रकाश को प्रकट कर दिया।

Frequently Asked Questions

The hymn points to a single divine Power called “the One” (Eka). From the imagery—golden radiance, youthful strength, guidance on paths—it can be read as an Agni/Indra-like heroic light, but the identification remains fluid.

It suggests concealed stores of wealth and power—both outer resources and inner capacities. The One is portrayed as knowing where these are hidden and how to bring them into use.

It expresses a Vedic idea that inspired sound is creative and revelatory. When seers form the true chant, it ‘brings out’ the hidden light—symbolically making the Sun (clarity and truth) appear.

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