Rig Veda Sukta 19
Mandala 8Sukta 1937 Mantras

Sukta 19

Sukta 8.19

Devata

Agni (implied as carrier/leader of the oblation), supported by the gods

यह सूक्त अग्नि को यथाविधि गतिमान नेता और हवि-वाहक के रूप में केंद्र में रखता है, जिसे देवगण स्वयं “प्रवर्तित” करते हैं ताकि अर्पण दिव्य लोक में आरोहण करे। इसमें यज्ञ को बार-बार ‘भद्र’—अग्नि में, दान में, विधि/कर्म में और स्तुति में—मंगलमय कहा गया है, और सही अनुष्ठान-गति को कल्याण से जोड़ा गया है। अंत की ओर यह दानस्तुति-सा स्वर ग्रहण करता है, जहाँ सफल यज्ञ और उदारता के साथ जुड़े यजमानों/दाताओं तथा सामाजिक प्रतिफलों का स्मरण किया गया है।

Mantras

Mantra 1

तं गूर्धया स्वर्णरं देवासो देवमरतिं दधन्विरे । देवत्रा हव्यमोहिरे ॥

उसे—उन्नत बल से—देवों ने प्रवृत्त किया: देव, अर्पण-वाहक, ऋत-पथ पर चलने वाला अग्रणी। और वे हवि को देवत्रा, देव-लोक की ओर ऊर्ध्व ले जाते हैं।

Mantra 2

विभूतरातिं विप्र चित्रशोचिषमग्निमीळिष्व यन्तुरम् । अस्य मेधस्य सोम्यस्य सोभरे प्रेमध्वराय पूर्व्यम् ॥

हे विप्र, विभूतराति, चित्रशोचिष, यन्ता—ऐसे अग्नि की स्तुति कर। इस मेध, इस सोम्य यज्ञ के लिए, हे सोभरि, अध्वर हेतु पूर्व्य (प्राचीन) सामर्थ्य को आगे ला।

Mantra 3

यजिष्ठं त्वा ववृमहे देवं देवत्रा होतारममर्त्यम् । अस्य यज्ञस्य सुक्रतुम् ॥

हम तुझे—यजिष्ठ—वरण करते हैं: देव, देवत्रा ले जाने वाला, अमर्त्य होता। इस यज्ञ के लिए सुक्रतु (शुभ-संकल्प/सद्-शक्ति) को सिद्ध कर।

Mantra 4

ऊर्जो नपातं सुभगं सुदीदितिमग्निं श्रेष्ठशोचिषम् । स नो मित्रस्य वरुणस्य सो अपामा सुम्नं यक्षते दिवि ॥

ऊर्जा के नपात, सौभाग्यशाली, सुदीप्त, श्रेष्ठ-ज्वाला वाले अग्नि—वह हमारे लिए दिवि में मित्र-वरुण की कृपा और अपाम् (जल-देवताओं) का सुम्न, अर्थात् कल्याणकारी अनुग्रह, प्राप्त कराए।

Mantra 5

यः समिधा य आहुती यो वेदेन ददाश मर्तो अग्नये । यो नमसा स्वध्वरः ॥

जो मर्त्य समिधा से, आहुति से, वेद (ज्ञान) से अग्नि को दान देता है; जो नमसा (नम्र श्रद्धा) से—स्वध्वर, अर्थात् स्व-नियंत्रित और ऋजु यज्ञ वाला—वह अग्नि के समीचीन रक्षण में प्रविष्ट होता है।

Mantra 6

तस्येदर्वन्तो रंहयन्त आशवस्तस्य द्युम्नितमं यशः । न तमंहो देवकृतं कुतश्चन न मर्त्यकृतं नशत् ॥

उसके लिए अश्ववान् (वेगवान घोड़े) शीघ्र दौड़ते हैं; उसका यश अत्यन्त द्युम्नित, अर्थात् परम प्रकाशमान होता है। न देवकृत कोई अंहस् (अनिष्ट) और न मर्त्यकृत—कहीं से भी—उस तक पहुँचकर उसे आघात कर सकता है।

Mantra 7

स्वग्नयो वो अग्निभिः स्याम सूनो सहस ऊर्जां पते । सुवीरस्त्वमस्मयुः ॥

हे सहस के पुत्र, ऊर्जाओं के स्वामी! तेरे अग्नियों के साथ हम सुसज्जित, सु-अग्नि-युक्त हों। तू हमारे लिए सुवीर्य का दाता हो, और सहायता सहित पूर्णतः हमारी ओर उन्मुख रह।

Mantra 8

प्रशंसमानो अतिथिर्न मित्रियोऽग्नी रथो न वेद्यः । त्वे क्षेमासो अपि सन्ति साधवस्त्वं राजा रयीणाम् ॥

स्तुत होने पर, हे अग्नि, तू अतिथि-सा स्वागतयोग्य, मित्र-सा स्नेही होता है; रथ के समान तू हमारी उन्नति का वहनकर्ता जानने योग्य है। तुझमें ही क्षेम—निश्चिन्त सुरक्षा—और साधु सिद्धियाँ स्थित हैं; तू रयी—समृद्धि/पूर्णता—का राजा है।

Mantra 9

सो अद्धा दाश्वध्वरोऽग्ने मर्तः सुभग स प्रशंस्यः । स धीभिरस्तु सनिता ॥

हे अग्नि, निश्चय ही वह मर्त्य जो दान करता है और अध्वर-यज्ञ अर्पित करता है, सुभग होता है; वह प्रशंसा के योग्य है। वह अपनी धियों—प्रकाशमयी बुद्धियों—से सनीता बने, विजयी होकर प्राप्त करने वाला हो।

Mantra 10

यस्य त्वमूर्ध्वो अध्वराय तिष्ठसि क्षयद्वीरः स साधते । सो अर्वद्भिः सनिता स विपन्युभिः स शूरैः सनिता कृतम् ॥

जिसके लिए तुम यज्ञ में ऊर्ध्व होकर खड़े रहते हो—जिसका गृह वीर-सम्पदा से बढ़ता है—वह सिद्धि पाता है। वह बलवान अश्वों के साथ प्राप्तकर्ता बनता है; वह विपन्यु (उत्सुक/प्रेरित) शक्तियों के साथ, शूरवीरों के साथ, कृत (करने योग्य) कर्म को जीतकर साकार करता है।

Mantra 11

यस्याग्निर्वपुर्गृहे स्तोमं चनो दधीत विश्ववार्यः । हव्या वा वेविषद्विषः ॥

जिसके घर में अग्नि अपना तेजस्वी वपु (रूप) स्थापित करता है और स्तोम (स्तुति-हिम्न) को धारण कराता है—वह विश्ववार्य (समस्त वरणीय वरों का धारक) है। वह हव्यों को प्रज्वलित/सजीव करता है और विष (विष-विभाजन का) को दूर भगाता है।

Mantra 12

विप्रस्य वा स्तुवतः सहसो यहो मक्षूतमस्य रातिषु । अवोदेवमुपरिमर्त्यं कृधि वसो विविदुषो वचः ॥

हे सहस (बल) वाले, जो विप्र तुम्हारी स्तुति करता है, उसके लिए तुम अपने दानों में सर्वाधिक शीघ्र हो। सहायता को देवमय और मर्त्य-मान से ऊपर कर दो; हे वसु, विद्वान के वचन को सिद्ध/पूर्ण करो।

Mantra 13

यो अग्निं हव्यदातिभिर्नमोभिर्वा सुदक्षमाविवासति । गिरा वाजिरशोचिषम् ॥

जो अग्नि को हवि-दानों से, या नमस्कार-रूप श्रद्धा से—उस सु-दक्ष, सर्वथा समर्थ अग्नि को—सेवित करता है; वाणी द्वारा उस वाजिर, तीव्र-ज्वलित तेजस्वी को आवाहन करता है—वह विजयी ज्योति को नीचे उतार लाता है।

Mantra 14

समिधा यो निशिती दाशददितिं धामभिरस्य मर्त्यः । विश्वेत्स धीभिः सुभगो जनाँ अति द्युम्नैरुद्न इव तारिषत् ॥

जो मर्त्य समिधा से, और तीक्ष्ण निश्चिति के साथ दान करता है; जो अपने धामों—व्यवस्थित शक्तियों—द्वारा अदिति को अर्पित करता है; वह, धी-प्रकाश से सु-भाग्यवान, अपने द्युम्नों से जनों के पार उतर जाता है—जैसे कोई जल-राशि को पार कर जाए।

Mantra 15

तदग्ने द्युम्नमा भर यत्सासहत्सदने कं चिदत्रिणम् । मन्युं जनस्य दूढ्यः ॥

वह द्युम्न हमें ला, हे अग्ने—वह प्रकाश-बल—जिससे तू सदन में भी किसी अत्रिण, किसी शत्रु-भक्षक को परास्त कर देता है; और जन-समूह के दृढ़-धरे क्रोध को भी।

Mantra 16

येन चष्टे वरुणो मित्रो अर्यमा येन नासत्या भगः । वयं तत्ते शवसा गातुवित्तमा इन्द्रत्वोता विधेमहि ॥

जिस शक्ति से वरुण देखता है, और मित्र तथा अर्यमा; जिस शक्ति से नासत्य (अश्विनौ) और भग अपने ऋत-कर्म में प्रवृत्त होते हैं—उसी तुम्हारी उस बल-शक्ति से, हे इन्द्र-त्व से पोषित, हम जो श्रेष्ठ गातु (मार्ग) के ज्ञाता/प्राप्तकर्ता होना चाहते हैं, तुम्हारी सेवा करें और यज्ञ-क्रिया का विधान करें।

Mantra 17

ते घेदग्ने स्वाध्यो ये त्वा विप्र निदधिरे नृचक्षसम् । विप्रासो देव सुक्रतुम् ॥

हे अग्ने, वे ही सचमुच स्वाध्य (स्व-नियंत्रित) हैं—वे विप्र, जिन्होंने तुम्हें अपने भीतर ‘नृचक्षस्’ (मनुष्यों के द्रष्टा) रूप में स्थापित किया है। हे देव, सुक्रतु (शुभ-संकल्प और कुशल कर्म वाले) तुम्हें विप्रजन प्रतिष्ठित करते हैं।

Mantra 18

त इद्वेदिं सुभग त आहुतिं ते सोतुं चक्रिरे दिवि । त इद्वाजेभिर्जिग्युर्महद्धनं ये त्वे कामं न्येरिरे ॥

हे सुभग अग्ने, उन्होंने ही तुम्हारे लिए वेदि और आहुति को सजाया; दिवि (दीप्त लोकों) में तुम्हारे लिए सोम-रस के सवन/सोत्र को स्थापित किया। वे ही वाजों (समृद्धि-शक्तियों) से महान धन जीतते हैं—वे, जो अपना काम (अंतरात्मा की अभिलाषा) तुममें न्येरिरे, अर्थात् तुममें स्थापित करते हैं।

Mantra 19

भद्रो नो अग्निराहुतो भद्रा रातिः सुभग भद्रो अध्वरः । भद्रा उत प्रशस्तयः ॥

हमारे लिए आहुत किया गया अग्नि भद्र (कल्याणकारी) हो; हे सुभग, दान-रति भी भद्र हो; यज्ञ का अध्वर (अनुष्ठान-मार्ग) भद्र हो; और स्तुतियाँ भी भद्र हों।

Mantra 20

भद्रं मनः कृणुष्व वृत्रतूर्ये येना समत्सु सासहः । अव स्थिरा तनुहि भूरि शर्धतां वनेमा ते अभिष्टिभिः ॥

वृत्र-तूर्य (वृत्र-वध के संग्राम) में हमारा मन भद्र कर दे, जिससे हम समत्सु (संघर्षों) में विजयी हों। बहुत-से शत्रु-समूहों को गिरा दे और दृढ़ करके फैला दे; तेरी अभिष्टि (सहायताओं) से हम विजय प्राप्त करें।

Mantra 21

ईळे गिरा मनुर्हितं यं देवा दूतमरतिं न्येरिरे । यजिष्ठं हव्यवाहनम् ॥

मैं वाणी से मनु-निहित उस अग्नि की स्तुति करता हूँ, जिसे देवों ने दूत—अरतिं (अथक गमनशील)—के रूप में प्रवर्तित किया है; यजिष्ठ, हव्यवाहन।

Mantra 22

तिग्मजम्भाय तरुणाय राजते प्रयो गायस्यग्नये । यः पिंशते सूनृताभिः सुवीर्यमग्निर्घृतेभिराहुतः ॥

तीक्ष्ण-जबड़े, सदा-युवा, जो तेज से दीप्त है—उस अग्नि के लिए तुम अर्पण-प्रेरणा का गान करो। जो सूनृता (सत्य-प्रिय वाणी) से सु-वीर्य, श्रेष्ठ वीर-बल को गढ़ता है—वही अग्नि घृत-आहुतियों से आहूत है।

Mantra 23

यदी घृतेभिराहुतो वाशीमग्निर्भरत उच्चाव च । असुर इव निर्णिजम् ॥

जब घृत-आहुतियों से आहूत किया जाता है, तब अग्नि अपनी गूँजती शक्ति को ऊपर भी और नीचे भी धारण करता है—मानो असुर-सम प्रभु-शक्ति अपना दीप्त वस्त्र (निर्णिज) प्रकट कर रही हो।

Mantra 24

यो हव्यान्यैरयता मनुर्हितो देव आसा सुगन्धिना । विवासते वार्याणि स्वध्वरो होता देवो अमर्त्यः ॥

जो हव्यों को प्रवृत्त करता है, मनु द्वारा स्थापित—सुगन्धित मुख वाला देव—वह वरणीय वरदानों को प्रकाशित करता है। स्वध्वर, सु-मार्गित यजमान; हवि-प्रदाता होता—वही अमर्त्य देव है।

Mantra 25

यदग्ने मर्त्यस्त्वं स्यामहं मित्रमहो अमर्त्यः । सहसः सूनवाहुत ॥

हे अग्नि, यदि तुम मर्त्य हो जाओ और मैं अमर्त्य—हे मित्रमहो, हे सहसः सूनु, आहुति से आहूत—तब भी हमारी परस्पर सहायता की बन्धुता दृढ़ बनी रहे।

Mantra 26

न त्वा रासीयाभिशस्तये वसो न पापत्वाय सन्त्य । न मे स्तोतामतीवा न दुर्हितः स्यादग्ने न पापया ॥

हे वसो (कल्याणमय), मैं तुम्हें शत्रु-आरोप (अभिशस्ति) के वश में नहीं करूँगा, न पापत्व की दशा में; मेरा स्तोता मोह में न पड़े, वह कुप्रतिष्ठित न हो—हे अग्नि, पाप के कारण नहीं।

Mantra 27

पितुर्न पुत्रः सुभृतो दुरोण आ देवाँ एतु प्र णो हविः ॥

पिता के पुत्र की भाँति, गृह में सु-सम्भृत होकर, हमारा हवि देवों की ओर अग्रसर हो; वह हमारे लिए आगे बढ़े।

Mantra 28

तवाहमग्न ऊतिभिर्नेदिष्ठाभिः सचेय जोषमा वसो । सदा देवस्य मर्त्यः ॥

हे अग्नि, तेरी अत्यन्त निकट और अन्तरंग ऊतियों (सहायताओं) से मैं तुझसे जुड़ूँ, हे वसु, हर्षपूर्वक सहमति में। देव के सान्निध्य में मर्त्य सदा स्थित रह सकता है।

Mantra 29

तव क्रत्वा सनेयं तव रातिभिरग्ने तव प्रशस्तिभिः । त्वामिदाहुः प्रमतिं वसो ममाग्ने हर्षस्व दातवे ॥

हे अग्नि, तेरे क्रतु (प्रकाशमय कर्म-बल) से मैं प्राप्त करूँ; तेरी रातियों (दानों) से, हे अग्नि, और तेरी प्रशस्तियों (स्तुतिपुष्ट अनुमोदनों) से। हे वसु, वे तुझे ही ‘प्रमति’—पूर्व-विचार और सम्यक् परामर्श—कहते हैं; हे अग्नि, मुझे देने में हर्षित हो।

Mantra 30

प्र सो अग्ने तवोतिभिः सुवीराभिस्तिरते वाजभर्मभिः । यस्य त्वं सख्यमावरः ॥

हे अग्नि, तेरी ऊतियों से—जो सुवीर (वीर-शक्ति) प्रदान करती हैं—वह आगे बढ़ता है; वाज-भर्म (समृद्धि-बल के वहनकर्ता) द्वारा वह पार कर जाता है—वह, जिसकी सख्यता (मित्रता) तूने स्वीकार कर अपनी रक्षा से आच्छादित की है।

Mantra 31

तव द्रप्सो नीलवान्वाश ऋत्विय इन्धानः सिष्णवा ददे । त्वं महीनामुषसामसि प्रियः क्षपो वस्तुषु राजसि ॥

हे (अग्नि)! तेरा ज्वाला-बिन्दु नील-श्याम और गूँजता हुआ है; ऋत्विज्-शक्ति, प्रज्वलित होकर, अपना बल कर्म में स्थापित करती है। तू महान् उषाओं का प्रिय है; रात्रियों में, निवास-स्थानों में, तू उनके प्रिय प्रकाश के रूप में राज्य करता है।

Mantra 32

तमागन्म सोभरयः सहस्रमुष्कं स्वभिष्टिमवसे । सम्राजं त्रासदस्यवम् ॥

हे सोभरयो! हम सहायता के लिए उसी के पास आए हैं—त्रासदस्यु सम्राट के पास—जो सहस्रगुण सामर्थ्यवान है, जिसकी विजय-शक्ति शुभ और स्व-समर्थ है।

Mantra 33

यस्य ते अग्ने अन्ये अग्नय उपक्षितो वया इव । विपो न द्युम्ना नि युवे जनानां तव क्षत्राणि वर्धयन् ॥

हे अग्ने! जिसमें अन्य अग्नियाँ पक्षियों की भाँति अपने घोंसले में स्थित हैं—उसमें, प्रेरित ऋषियों की तरह, जनों के भीतर तेजस्वी शक्तियाँ स्थापित हैं, जो तेरे क्षत्र—तेरे प्रभुत्व-राज्य—को बढ़ाती हैं।

Mantra 34

यमादित्यासो अद्रुहः पारं नयथ मर्त्यम् । मघोनां विश्वेषां सुदानवः ॥

हे अदित्यो! तुम अद्रुह (अकपट) होकर जिस मर्त्य को पार के तट तक ले जाते हो—उसका तुम पालन करते हो। हे सुदानव (सुग्राही दाता) देवो! महिमावानों के समस्त जनों के लिए (तुम कल्याण करते हो)।

Mantra 35

यूयं राजानः कं चिच्चर्षणीसहः क्षयन्तं मानुषाँ अनु । वयं ते वो वरुण मित्रार्यमन्त्स्यामेदृतस्य रथ्यः ॥

तुम ही राजा हो—हे चर्षणीसह (जन-समर्थ) बलवानो—जो मनुष्यों के बीच निवास करता है। हे वरुण, मित्र, अर्यमन्! हम सचमुच तुम्हारे सहचर हों, और ऋत (सत्य-व्यवस्था) के रथ-पथ पर चलें।

Mantra 36

अदान्मे पौरुकुत्स्यः पञ्चाशतं त्रसदस्युर्वधूनाम् । मंहिष्ठो अर्यः सत्पतिः ॥

पौरुकुत्स्य वंश के त्रसदस्यु ने मुझे पचास वधुएँ (कन्याएँ) दीं—वह अति उदार, वह आर्य (श्रेष्ठ), सत्पति (सत् का स्वामी) है।

Mantra 37

उत मे प्रयियोर्वयियोः सुवास्त्वा अधि तुग्वनि । तिसॄणां सप्ततीनां श्यावः प्रणेता भुवद्वसुर्दियानां पतिः ॥

और मेरे लिए—मेरे दो प्रिय जनों के निमित्त—तुग्वन पर उसने सु-वास (सुन्दर निवास) स्थापित किया। श्याव तीन सत्तरियों का अग्रणी बना; वह वसु, दीप्त दानों/प्रकाशमान विभूतियों का स्वामी हुआ।

Frequently Asked Questions

Agni is the main focus—especially as the carrier and leader of the oblation—though the hymn also assumes the supportive presence of other gods who receive the offering through him.

“Bhadra” means auspicious, gracious, and beneficial. The hymn blesses the whole sacrificial process—fire, giving, the rite’s movement, and the praises—so the ritual becomes a channel of well-being.

Parts of Mandala 8 often include dānastuti, praising patrons and recalling gifts. This reflects how Vedic ritual linked divine worship with communal support, generosity, and remembered benefactors.

Read Rig Veda in the Vedapath app

Scan the QR code to open this directly in the app, with audio, word-by-word meanings, and more.

Continue reading in the Vedapath app

Open in App