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Sukta 8.16
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Indra
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यह सूक्त इन्द्र की उल्लासपूर्ण स्तुति है—वे समस्त जनों के सार्वभौम अधिपति हैं। नवीन, प्रेरित वाणी से उनका आह्वान किया जाता है कि वे बल, विजय और समृद्धि प्रदान करें। अंत में प्रत्यक्ष प्रार्थना है कि इन्द्र उपासकों को सन्मार्ग पर ले चलें और भौतिक ऐश्वर्यों के साथ अंतःप्रसन्नता (सुम्न) भी प्रदान करें।
Mantra 1
प्र सम्राजं चर्षणीनामिन्द्रं स्तोता नव्यं गीर्भिः । नरं नृषाहं मंहिष्ठम् ॥
नवीन स्तुतिगीतों से मैं चर्षणियों (जनसमुदायों) के सम्राट् इन्द्र का स्तवन करता हूँ—उस नर का, जो नृषाह (मनुष्यों पर विजय पाने वाला) है, जो अत्यन्त महिमावान् और सर्वाधिक उदार दाता है।
Mantra 2
यस्मिन्नुक्थानि रण्यन्ति विश्वानि च श्रवस्या । अपामवो न समुद्रे ॥
जिसमें सब उक्थ (स्तुतिगान) रमते हैं और यश की सारी आकांक्षाएँ परिपूर्ण होती हैं—जैसे जलों का बल समुद्र में एकत्र होता है—वैसा इन्द्र हमारी प्रेरित वाणी और उसकी विजयी कीर्ति का विशाल आश्रय है।
Mantra 3
तं सुष्टुत्या विवासे ज्येष्ठराजं भरे कृत्नुम् । महो वाजिनं सनिभ्यः ॥
सु-रचित, सम्यक् स्तुति से मैं उसे प्राप्त करना चाहता हूँ—उस ज्येष्ठ राजा को, जो संग्राम में पूर्ण (कृत्नु) है; जो महान् वाजिन् है, हमारे लाभों के लिए वाज (बल-सम्पदा) का दाता।
Mantra 4
यस्यानूना गभीरा मदा उरवस्तरुत्राः । हर्षुमन्तः शूरसातौ ॥
जिसके मद (उत्साह-आनन्द) कभी क्षीण नहीं होते—वे गम्भीर, विशाल और अजेय-विजयी हैं; शूर-प्राप्ति (वीर-पुरस्कार) के संग्राम में हर्ष से परिपूर्ण—ऐसी ही इन्द्र-शक्ति है, जब वह हमारे भीतर उदित होती है।
Mantra 5
तमिद्धनेषु हितेष्वधिवाकाय हवन्ते । येषामिन्द्रस्ते जयन्ति ॥
धन-युद्धों में, जहाँ दाँव लगाए जाते हैं, निर्णायक वाणी और मार्गदर्शक आदेश के लिए वे उसी को पुकारते हैं; जिनके साथ इन्द्र है—वे ही जीतते हैं।
Mantra 6
तमिच्च्यौत्नैरार्यन्ति तं कृतेभिश्चर्षणयः । एष इन्द्रो वरिवस्कृत् ॥
उसी को प्रयत्नशील शक्तियाँ अपने यत्नों से प्राप्त करती हैं; उसी को मानव-जन अपने सिद्ध कर्मों से सुनिश्चित करते हैं। यही इन्द्र है—वरिवस्कृत्, जो हमारे लिए विस्तृत अवकाश (वरिवस्) रचता है।
Mantra 7
इन्द्रो ब्रह्मेन्द्र ऋषिरिन्द्रः पुरू पुरुहूतः । महान्महीभिः शचीभिः ॥
इन्द्र ही ब्रह्म है, इन्द्र ही ऋषि है; इन्द्र बहु-समृद्ध, बहु-आहूत (पुरुहूत) है। वह अपनी महान्, महिमामयी शची-शक्तियों से महान् है।
Mantra 8
स स्तोम्यः स हव्यः सत्यः सत्वा तुविकूर्मिः । एकश्चित्सन्नभिभूतिः ॥
वह स्तुति-योग्य है, वह हवि-योग्य है; वह सत्य है—शक्तिमान् सत्त्व, विशाल तरंगित ऊर्जाओं (तुविकूर्मि) से युक्त। एक होकर भी वह अभिभूति—विजयी प्रभुत्व—बन जाता है।
Mantra 9
तमर्केभिस्तं सामभिस्तं गायत्रैश्चर्षणयः । इन्द्रं वर्धन्ति क्षितयः ॥
उसे ऋचाओं से, उसे सामों से, और गायत्री-छन्दों से जन-समुदाय बढ़ाते हैं; क्षितियाँ—मानव निवास-भूमियाँ—इन्द्र को पुष्ट करती हैं, ताकि हमारे भीतर दीप्त बुद्धि की शक्ति बढ़े।
Mantra 10
प्रणेतारं वस्यो अच्छा कर्तारं ज्योतिः समत्सु । सासह्वांसं युधामित्रान् ॥
हम उस श्रेष्ठ पथ के प्रणेता की ओर, समरों में ज्योति के कर्ता की ओर, और युद्ध में शत्रु-शक्तियों को पराजित करने वाले उस सहस्वान् की ओर बढ़ते हैं।
Mantra 11
स नः पप्रिः पारयाति स्वस्ति नावा पुरुहूतः । इन्द्रो विश्वा अति द्विषः ॥
वह पूर्तिकर्ता हमें स्वस्ति सहित पार उतारता है—मानो नाव से; बहु-आहूत इन्द्र, जो समस्त द्वेषों के परे ले जाता है।
Mantra 12
स त्वं न इन्द्र वाजेभिर्दशस्या च गातुया च । अच्छा च नः सुम्नं नेषि ॥
अतः हे इन्द्र, तू बल-समृद्धियों से, यज्ञ-सेवा के दान से और पथ-प्रदर्शन से—हमारे पास अपना सुम्न (अनुग्रह) भी ले आ; हमें आत्म-आनन्द प्रदान कर।
It praises Indra as the supreme ruler and helper, and asks him for strength, success, guidance on the right path, and heartfelt well-being.
It poetically declares that Indra is not only a warrior-god but also the source of inspired sacred speech and seer-like insight that makes prayer effective.
The final verse asks Indra to grant vāja (power and winning energy), lead the worshippers on the path (gātu), and bring sumna—grace and inner gladness.
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