Rig Veda Sukta 12
Mandala 8Sukta 1233 Mantras

Sukta 12

Sukta 8.12

Devata

Indra

Chandas

Gayatri (likely; needs confirmation by metrical count)

यह सूक्त इन्द्र के लिए सोम का तात्कालिक आह्वान है। इसमें उस मादक ‘मद’ की स्तुति की गई है जो उसकी वीर्य-शक्ति को प्रज्वलित करता है और उसे प्रकाश-भक्षक शत्रु का विनाश करने को प्रेरित करता है। कवि बार-बार इन्द्र को अपने निचोड़े हुए सोम पर आने के लिए पुकारते हैं, चाहे वह ‘दूर’ ही क्यों न हो; और अंत में वे वैदिक परंपरा के अनुसार कल्याण की याचना करते हैं—वीरत्व-बल, घोड़े और गौएँ—जो यथोचित हवि और प्राचीन पुरोहितीय प्रज्ञा के द्वारा सुनिश्चित होते हैं।

Mantras

Mantra 1

य इन्द्र सोमपातमो मदः शविष्ठ चेतति । येना हंसि न्यत्रिणं तमीमहे ॥

हे इन्द्र, सोमपान में परम-निपुण, वह मद—वह उन्मेष—जिससे, हे अतिशक्तिमान, तेरा चेतन जाग्रत होता है, और जिससे तू प्रकाश-भक्षक को मारकर दूर फेंक देता है—उसी तेरी शक्ति को हम चाहते हैं।

Mantra 2

येना दशग्वमध्रिगुं वेपयन्तं स्वर्णरम् । येना समुद्रमाविथा तमीमहे ॥

जिस शक्ति से तुमने प्रकाश लाने वाले, दृढ़-धृत दशग्व को कंपित कर दिया, और जिस शक्ति से तुमने समुद्र-तुल्य आधार को पार कराने में सहायता की—उसी तुम्हारी उस महिमा को हम याचते हैं।

Mantra 3

येन सिन्धुं महीरपो रथाँ इव प्रचोदयः । पन्थामृतस्य यातवे तमीमहे ॥

जिस शक्ति से तुमने महान् जलधाराओं—सिन्धु की अपः—को रथों की भाँति वेग से प्रवाहित किया, और ऋत के गमन हेतु पथ खोल दिया—उसी तुम्हारी उस शक्ति को हम याचते हैं।

Mantra 4

इमं स्तोममभिष्टये घृतं न पूतमद्रिवः । येना नु सद्य ओजसा ववक्षिथ ॥

हमारी अभिष्टि और विजय के लिए, हे अद्रिवः (सोम-पाषाणधारी), इस स्तोम को स्वीकार करो—शुद्ध घृत के समान परिष्कृत; और इसके द्वारा तुम तत्क्षण ओज से बलवान होकर हमें आगे वहन करो।

Mantra 5

इमं जुषस्व गिर्वणः समुद्र इव पिन्वते । इन्द्र विश्वाभिरूतिभिर्ववक्षिथ ॥

हे गिर्वण इन्द्र! इस स्तुति को स्वीकार कर, इसमें आनन्द ले। जैसे समुद्र उमड़कर भर उठता है, वैसे ही तू अपनी समस्त ऊतियों—सहायता और रक्षण-शक्तियों—से परिपूर्ण होकर ववक्षिथ (वृद्धि को प्राप्त हो)।

Mantra 6

यो नो देवः परावतः सखित्वनाय मामहे । दिवो न वृष्टिं प्रथयन्ववक्षिथ ॥

जो देव दूरस्थ परावत से हम उसे सख्य के लिए पुकारते हैं—जो द्युलोक की वर्षा-सा विस्तार करता है—वह हमारे लिए बलवान होकर ववक्षिथ, और अपना प्रवाह व्यापक करे।

Mantra 7

ववक्षुरस्य केतवो उत वज्रो गभस्त्योः । यत्सूर्यो न रोदसी अवर्धयत् ॥

उसके केतु—किरण-चिह्न—ववक्षुः, और उसके हस्तों में वज्र भी; जब उसने सूर्य की भाँति दोनों रोदसी—द्यावा-पृथिवी—को विस्तृत और वर्धित किया।

Mantra 8

यदि प्रवृद्ध सत्पते सहस्रं महिषाँ अघः । आदित्त इन्द्रियं महि प्र वावृधे ॥

हे सत्पते, यदि तू अत्यन्त प्रवृद्ध होकर सहस्र महिष-सम आक्रामक शत्रुओं को भी परास्त कर चुका है, तो निश्चय ही तेरा इन्द्रिय—तेजस्वी अधिपत्य-बल—महान् और प्रबल होकर बढ़ गया है।

Mantra 9

इन्द्रः सूर्यस्य रश्मिभिर्न्यर्शसानमोषति । अग्निर्वनेव सासहिः प्र वावृधे ॥

इन्द्र, सूर्य की रश्मियों के साथ तू रेंगती हुई तम-आवरण को सुखा देता है, मुरझा देता है; और अग्नि, वन में विजयी वीर के समान, महाबल से बढ़ता है।

Mantra 10

इयं त ऋत्वियावती धीतिरेति नवीयसी । सपर्यन्ती पुरुप्रिया मिमीत इत् ॥

यह तेरी ऋत्वियावती—ऋतु और यज्ञ-नियम से समृद्ध—सदा-नवीन धीत आगे बढ़ती है; पूजती हुई, बहुतों को प्रिय, वह सचमुच (हमारे लिए) सत्य भागों को मापकर बाँट देती है।

Mantra 11

गर्भो यज्ञस्य देवयुः क्रतुं पुनीत आनुषक् । स्तोमैरिन्द्रस्य वावृधे मिमीत इत् ॥

यज्ञ का देव-प्रेमी गर्भ (गर्भः) निरन्तर क्रतु (संकल्प-शक्ति) को पवित्र करता है। स्तोत्रों से इन्द्र की शक्ति बढ़ती है—और वह सचमुच (इत्) उचित माप-रचना को नापकर स्थापित करता है।

Mantra 12

सनिर्मित्रस्य पप्रथ इन्द्रः सोमस्य पीतये । प्राची वाशीव सुन्वते मिमीत इत् ॥

मित्र के सामंजस्य में प्राप्ति-शक्ति (सनि) फैल गई है; इन्द्र सोम-पान के लिए (आगे) बढ़ता है। सुन्वते—सोम निचोड़ने वाले—की ओर प्राची, वाशीव—पुकार-सी—धारा के समान; वह सचमुच (इत्) उपलब्धि को मापकर बाँटता है।

Mantra 13

यं विप्रा उक्थवाहसोऽभिप्रमन्दुरायवः । घृतं न पिप्य आसन्यृतस्य यत् ॥

जिसे विप्र—उक्थवाहस, उन्नत वाणी के वाहक—मार्ग की खोज में, हर्षित करते और उसकी ओर दबाव से बढ़ते हैं; उसने घृत-सा पी लिया है—ऋतस्य आसन्य्, अर्थात् ऋत (सत्य-व्यवस्था) का वज्र-आसन, वही सत्य-क्रम का आधार।

Mantra 14

उत स्वराजे अदितिः स्तोममिन्द्राय जीजनत् । पुरुप्रशस्तमूतय ऋतस्य यत् ॥

और स्वराज् (स्व-शासक) के लिए अदिति ने इन्द्र के हेतु स्तोत्र को जन्म दिया—बहु-प्रशस्त, सहायता के लिए—जो ऋत (सत्य-व्यवस्था) का है।

Mantra 15

अभि वह्नय ऊतयेऽनूषत प्रशस्तये । न देव विव्रता हरी ऋतस्य यत् ॥

वह्नि (अग्नि-वाहक) सहायता के लिए, प्रशंसा के लिए पुकार उठे। हे देव! तुम्हारे दोनों हरि (ताम्रवर्ण) अश्व नियम से विचलित नहीं होते—वे ऋत (सत्य-व्यवस्था) में ही चलते हैं।

Mantra 16

यत्सोममिन्द्र विष्णवि यद्वा घ त्रित आप्त्ये । यद्वा मरुत्सु मन्दसे समिन्दुभिः ॥

चाहे तुम, हे इन्द्र, सोम में आनन्द लो; या विष्णु के विशाल पग-प्रसार में; या त्रित आप्त्य के साथ; या मरुतों के बीच—यहाँ तुम इन्दुओं (रस-बिन्दुओं) के साथ संयुक्त होकर हर्षित होओ।

Mantra 17

यद्वा शक्र परावति समुद्रे अधि मन्दसे । अस्माकमित्सुते रणा समिन्दुभिः ॥

या फिर, हे शक्र, यदि तुम दूर परावति में, समुद्र के ऊपर, आनंद लेते हो—तो भी हमारे निचोड़े हुए सोम में, हे रणवीर, इन्दु-बिन्दुओं के साथ मिलकर हर्षित हो।

Mantra 18

यद्वासि सुन्वतो वृधो यजमानस्य सत्पते । उक्थे वा यस्य रण्यसि समिन्दुभिः ॥

या यदि तुम सोम-निचोड़ने वाले के वर्धक हो, हे सत्पते, यजमान के—और यदि उसके उक्थ में तुम रमते हो—तो इन्दु-बिन्दुओं के साथ यहाँ मिलकर हर्षित हो।

Mantra 19

देवंदेवं वोऽवस इन्द्रमिन्द्रं गृणीषणि । अधा यज्ञाय तुर्वणे व्यानशुः ॥

तुम्हारे अवस (सहाय) के लिए हम इन्द्र को—इन्द्र को—देव-देव, बार-बार स्तुति से गाएँ; तब वे वेग से बढ़ते यज्ञ के लिए व्यापक रूप से (मार्ग) पा गए।

Mantra 20

यज्ञेभिर्यज्ञवाहसं सोमेभिः सोमपातमम् । होत्राभिरिन्द्रं वावृधुर्व्यानशुः ॥

यज्ञों द्वारा यज्ञ-वाहक इन्द्र को वे बढ़ाते हैं; सोमों द्वारा उसे सोम-पान में परम-श्रेष्ठ बनाकर विस्तृत करते हैं; और होतृ-शक्तियों द्वारा इन्द्र को वर्धित कर पूर्णतः प्रकट-भाव में प्रविष्ट कराते हैं।

Mantra 21

महीरस्य प्रणीतयः पूर्वीरुत प्रशस्तयः । विश्वा वसूनि दाशुषे व्यानशुः ॥

महान् हैं उसके प्रणेयन—उसकी प्राचीन मार्गदर्शक प्रेरणाएँ; और महान् हैं उसकी प्रशस्ति-स्तुतियाँ भी। दाशुष—दाता के लिए वे समस्त वसुओं को प्रकट कर लाते हैं।

Mantra 22

इन्द्रं वृत्राय हन्तवे देवासो दधिरे पुरः । इन्द्रं वाणीरनूषता समोजसे ॥

वृत्र—आवरणकर्ता के वध हेतु देवों ने इन्द्र को अग्र में स्थापित किया। और वाणियाँ—प्रेरित वचन—इन्द्र का अनुगान करती हुई उसे ओजस् के साथ संयोग में ले आईं, जिससे शक्ति संचित होकर प्रभावी हो।

Mantra 23

महान्तं महिना वयं स्तोमेभिर्हवनश्रुतम् । अर्कैरभि प्र णोनुमः समोजसे ॥

हम स्तोत्रों से उस महान्—अपनी महिमा से महान्—हवन-श्रुत (आह्वान-सुनने वाले) को आगे बढ़ाते हैं; अर्चाओं/अर्कों (दीप्त स्तुतियों) से हम उसे प्रेरित करते हैं कि वह समोजस्—एकत्रित प्रभावी बल—में संहति करे।

Mantra 24

न यं विविक्तो रोदसी नान्तरिक्षाणि वज्रिणम् । अमादिदस्य तित्विषे समोजसः ॥

दोनों रोदसी (द्यावा-पृथिवी) उसे अलग नहीं कर सकतीं, न अन्तरिक्ष-प्रदेश वज्रिण (वज्रधारी) को विभक्त कर सकते हैं; जन्म से ही उसकी तित्विषा (दीप्त तेज) समोजस्—एक ही बल—में संचित होती जाती है।

Mantra 25

यदिन्द्र पृतनाज्ये देवास्त्वा दधिरे पुरः । आदित्ते हर्यता हरी ववक्षतुः ॥

हे इन्द्र, जब पृतनाज्य (युद्ध-प्रेरणा/युद्ध-उत्साह) में देवों ने तुम्हें अग्रभाग में स्थापित किया, तब सचमुच तुम्हारे हर्यत (उत्सुक) दो हरी (हरि-अश्व) तुम्हें आगे वहन कर ले गए।

Mantra 26

यदा वृत्रं नदीवृतं शवसा वज्रिन्नवधीः । आदित्ते हर्यता हरी ववक्षतुः ॥

जब तुम, हे वज्रधारी, अपने पराक्रम से नदियों को रोककर रखने वाले वृत्र का वध करते हो, तब निश्चय ही तुम्हारे उत्सुक हरित (अश्व) तुम्हें आगे वहन करते हैं।

Mantra 27

यदा ते विष्णुरोजसा त्रीणि पदा विचक्रमे । आदित्ते हर्यता हरी ववक्षतुः ॥

जब तुम्हारे लिए विष्णु ने अपने तेज से तीन पग (त्रीणि पदा) विचक्रमे, तब निश्चय ही तुम्हारे उत्सुक हरित (अश्व) तुम्हें आगे वहन करते हैं।

Mantra 28

यदा ते हर्यता हरी वावृधाते दिवेदिवे । आदित्ते विश्वा भुवनानि येमिरे ॥

जब तुम्हारे उत्सुक हरित (अश्व) दिन-प्रतिदिन बढ़ते हैं, तब निश्चय ही समस्त भुवन तुम्हारे द्वारा धारण और व्यवस्थित किए जाते हैं।

Mantra 29

यदा ते मारुतीर्विशस्तुभ्यमिन्द्र नियेमिरे । आदित्ते विश्वा भुवनानि येमिरे ॥

जब मरुत-गण—तूफ़ानी शक्ति की जन-समूह—हे इन्द्र, तुम्हारे लिए अपने को युग्मित करते हैं, तब निश्चय ही तुम्हारे द्वारा समस्त भुवन धारण और सम्यक्-नियमित हो जाते हैं।

Mantra 30

यदा सूर्यममुं दिवि शुक्रं ज्योतिरधारयः । आदित्ते विश्वा भुवनानि येमिरे ॥

जब तुमने उस सूर्य को—शुद्ध, दीप्तिमान ज्योति को—दिव्य आकाश में दृढ़तापूर्वक स्थापित किया, तब निश्चय ही तुम्हारी शक्ति के अधीन समस्त भुवन और अस्तित्व-स्थितियाँ अपने उचित क्रम और संयम में आ गईं।

Mantra 31

इमां त इन्द्र सुष्टुतिं विप्र इयर्ति धीतिभिः । जामिं पदेव पिप्रतीं प्राध्वरे ॥

हे इन्द्र, यह सुगठित स्तुति-गीत विप्र अपने प्रेरित ध्यानों से तुम्हारे लिए प्रवाहित करता है—जैसे कोई स्वजन, पद-पद पर पोषण करता हुआ—अन्तर्यज्ञ के पथ में आगे बढ़ाता है।

Mantra 32

यदस्य धामनि प्रिये समीचीनासो अस्वरन् । नाभा यज्ञस्य दोहना प्राध्वरे ॥

जब उसके प्रिय धाम (धामनि) में सम्यक्-प्रवृत्त जन एक साथ स्वर उठाते हैं, तब यज्ञ की नाभि पर स्थित दोहने वाली गौएँ अपने रस-प्रवाह दुह देती हैं—अध्वर (यज्ञ-गति) में आगे बढ़ती हुई।

Mantra 33

सुवीर्यं स्वश्व्यं सुगव्यमिन्द्र दद्धि नः । होतेव पूर्वचित्तये प्राध्वरे ॥

हे इन्द्र, हमें सुवीर्य, स्वश्व्य और सुगव्य—उत्तम वीर्य, उत्तम अश्व-बल और उत्तम गो-सम्पदा—प्रदान कर। प्राचीन-चित्ति वाले होतृ की भाँति, इसे हमारे लिए अध्वर (यज्ञ-यात्रा) में आगे बढ़ा दे।

Frequently Asked Questions

It asks Indra to come to the pressed Soma, awaken his victorious power, destroy the forces that “devour light,” and grant strength, protection, and prosperity (especially horses and cattle).

It emphasizes that even if Indra is imagined as distant, the sacrifice and Soma-call can still reach him—inviting him to rejoice with the worshippers’ offerings right now.

Several verses appear Gāyatrī-like (3 lines of ~8 syllables), but meter should be confirmed by counting syllables across all 33 mantras, since Mandala 8 can mix meters within a single hymn.

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