
Sukta 8.103
Agni
यह सूक्त अग्नि की स्तुति करता है—उन्हें परम “मार्ग-प्राप्त कराने वाले” (गातुवित्तम) के रूप में, जिनमें ऋत के विधान प्रतिष्ठित हैं और जिनके द्वारा यजमान की वाणी देवों तक पहुँचती है। गायक-गणों को सुगढ़ स्तुति लेकर अग्नि के समीप आने का आह्वान किया गया है; उन्हें विशाल, उज्ज्वल-ज्वाल, उदार दाता, और मरुतों/रुद्रों के सहचर के रूप में वर्णित किया गया है। सूक्त का समापन अग्नि को सोमपान हेतु स्पष्ट निमंत्रण से होता है—वे शोभर्याओं की प्रशंसा में आनंद लें और ऋत-संयत आर्य/श्रेष्ठ वृद्धि को बल प्रदान करें।
Mantra 1
अदर्शि गातुवित्तमो यस्मिन्व्रतान्यादधुः । उपो षु जातमार्यस्य वर्धनमग्निं नक्षन्त नो गिरः ॥
वह प्रकट हुआ—गति का सर्वोत्तम ज्ञाता—जिसमें व्रत (ऋत के नियम) स्थापित किए गए हैं। हमारी गिरः (स्तुतियाँ) अग्नि के निकट पहुँचें—सुजात, आर्य के वर्धन, उस अग्नि के—जो ऋत की ओर उन्नत, श्रेष्ठ वृद्धि को बल देता है।
Mantra 2
प्र दैवोदासो अग्निर्देवाँ अच्छा न मज्मना । अनु मातरं पृथिवीं वि वावृते तस्थौ नाकस्य सानवि ॥
अग्नि—दैवोदास, देवों को देने वाला—अपने महत्त्व/विस्तार के साथ देवताओं की ओर अग्रसर होता है। माता पृथ्वी के अनुकरण में वह व्यापक रूप से फैलता है; और वह स्वर्ग की सानु (शिखर-रेखा) पर स्थिर खड़ा होता है।
Mantra 3
यस्माद्रेजन्त कृष्टयश्चर्कृत्यानि कृण्वतः । सहस्रसां मेधसाताविव त्मनाग्निं धीभिः सपर्यत ॥
जिससे प्रजाएँ अपने कर्मों और कृत्यों में उद्यत होकर कंपित/प्रेरित होती हैं—उस अग्नि की, सहस्र-सां (हजारगुनी) मेधा-प्राप्ति के समान, अपने आत्मबल से और धियों (अंतर्दृष्टियों) से उपासना करो।
Mantra 4
प्र यं राये निनीषसि मर्तो यस्ते वसो दाशत् । स वीरं धत्ते अग्न उक्थशंसिनं त्मना सहस्रपोषिणम् ॥
हे अग्ने, जिसे तुम राये (समृद्धि) की ओर अग्रसर करते हो—वह मर्त्य जो तुम्हें, हे वसु, दान अर्पित करता है—वह वीर को प्राप्त करता है: उक्थ-शंसिन् (स्तोत्र-वचन का घोषक), आत्मबल से सम्पन्न, सहस्र-पोषिन् (हजारगुना पोषण करने वाला)।
Mantra 5
स दृळ्हे चिदभि तृणत्ति वाजमर्वता स धत्ते अक्षिति श्रवः । त्वे देवत्रा सदा पुरूवसो विश्वा वामानि धीमहि ॥
वह दृढ़ से दृढ़ वस्तु को भी भेदकर वाज (बल-समृद्धि) को, अग्रसर कराने वाली शक्ति (अर्वत्) के द्वारा, प्राप्त कर लेता है; वह अक्षय श्रवः (अविनाशी यश) स्थापित करता है। हे पुरूवसु, देवत्रा (देव-लोक में) सदा स्थित तुममें हम समस्त वामानि (वांछनीय वरदानों) को धारण कर एकाग्र करते हैं।
Mantra 6
यो विश्वा दयते वसु होता मन्द्रो जनानाम् । मधोर्न पात्रा प्रथमान्यस्मै प्र स्तोमा यन्त्यग्नये ॥
जो समस्त वसु (आवश्यक धन-सम्पदा) का विभाजन करता है—जन-जन का मन्द्र (आनन्ददायक) होता, प्रेरित होता—वही होता (होतृ) है। मधु के पात्रों-से प्रथम पात्र और हमारे स्तोम (स्तुतिगान) उसी के लिए, अग्नि के लिए, आगे बढ़ते हैं।
Mantra 7
अश्वं न गीर्भी रथ्यं सुदानवो मर्मृज्यन्ते देवयवः । उभे तोके तनये दस्म विश्पते पर्षि राधो मघोनाम् ॥
जैसे लोग गीतों से रथ्य अश्व को सँवारते हैं, वैसे ही देवयवः (देव-प्रार्थी) सुदानवः (सुदानी दाता) स्तुतियों से तुम्हें चमकाते हैं। हे दस्म विश्पते (अद्भुत कुलपति), मघोनों (उदारों) का राधः (दान-वैभव) हमारे लिए पार करा—उभयतः, तोक (आत्मिक संतान) और तनय (शारीरिक संतान) के लिए।
Mantra 8
प्र मंहिष्ठाय गायत ऋताव्ने बृहते शुक्रशोचिषे । उपस्तुतासो अग्नये ॥
ऋत के ज्ञाता-धारक, उज्ज्वल ज्वाला वाले उस महान्—अत्यन्त उदार—के लिए गाओ। स्तुति लेकर समीप आने वाले हम, अग्नि की उपासना करें।
Mantra 9
आ वंसते मघवा वीरवद्यशः समिद्धो द्युम्न्याहुतः । कुविन्नो अस्य सुमतिर्नवीयस्यच्छा वाजेभिरागमत् ॥
वीर-बल से युक्त, यशस्वी मघवा हमारे पास आता है—समिद्ध, द्युम्न के लिए आहूत। क्या उसकी नित्य-नवीन सुमति वाज-शक्तियों सहित सीधी हमारे पास नहीं आएगी?
Mantra 10
प्रेष्ठमु प्रियाणां स्तुह्यासावातिथिम् । अग्निं रथानां यमम् ॥
प्रियों में भी अति-प्रिय, इस अतिथि की स्तुति करो जो आया है—रथों का यम, अग्नि।
Mantra 11
उदिता यो निदिता वेदिता वस्वा यज्ञियो ववर्तति । दुष्टरा यस्य प्रवणे नोर्मयो धिया वाजं सिषासतः ॥
जो उदित भी है और निहित भी, जो जानता है और ज्ञान कराता है—वसु (समृद्ध) वह यज्ञ-योग्य अपने कर्म में चलता-फिरता, घूमता-फिरता है। जिसके अवरोह में तरंगें दुस्तर हैं; फिर भी दीप्त धिया से वे वाज—बल-सम्पदा—को पाने की चेष्टा करते हैं।
Mantra 12
मा नो हृणीतामतिथिर्वसुरग्निः पुरुप्रशस्त एषः । यः सुहोता स्वध्वरः ॥
हमारा अतिथि—वसु (धन-समृद्ध) अग्नि—अप्रसन्न न हो; यह बहु-प्रशंसित वही है, जो सुहोता है, स्वध्वर—सुव्यवस्थित यज्ञ-पथ—का स्वामी है।
Mantra 13
मो ते रिषन्ये अच्छोक्तिभिर्वसोऽग्ने केभिश्चिदेवैः । कीरिश्चिद्धि त्वामीट्टे दूत्याय रातहव्यः स्वध्वरः ॥
हे वसु, हे अग्ने—कुटिल उक्तियों से, किसी भी प्रकार से, कोई तुम्हें आहत न करे। क्योंकि कीर्ति (गायक) भी तुम्हें दूत-कर्म के लिए ही पुकारता है—वह जो हवि अर्पित करता है, जो स्वध्वर—सुव्यवस्थित यज्ञ-पथ—वाला है।
Mantra 14
आग्ने याहि मरुत्सखा रुद्रेभिः सोमपीतये । सोभर्या उप सुष्टुतिं मादयस्व स्वर्णरे ॥
हे अग्नि, मरुतों के सखा, रुद्रों के साथ सोम-पान के लिए आओ। सोभर्याओं की सु-रची स्तुति के निकट आओ; हे स्वर्णलोक-नर, उसमें आनन्दित हो।
It praises Agni as the one who reveals the right path and upholds ṛta, and it invites him to come to the sacrifice—especially to the Soma rite—to accept offerings and praise.
The hymn presents Agni as the best guide who ‘finds the path’—both the ritual path that leads offerings to the gods and the moral/spiritual path aligned with ṛta.
They are storm-deities associated with Rudra, often pictured as Agni’s companions. Mentioning them intensifies the invitation, portraying a powerful divine entourage arriving for Soma-drinking.
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