
Sukta 3.45
Viśvāmitra Gāthina (traditional for RV 3.45 Indra hymn)
Indra
Gāyatrī (probable)
यह संक्षिप्त सूक्त इन्द्र को पुकारता है कि वे अपने हरि (ताम्रवर्ण अश्व/ऊर्जाएँ) के साथ शीघ्र आएँ, किसी भी बन्धन से अवरुद्ध न हों, हवि का आस्वादन करें और यजमान को बल प्रदान करें। इसमें इन्द्र के गम्भीर, समुद्र-सदृश क्रतु (दृढ़ संकल्प) की स्तुति है, जो सुव्यवस्थित धाराओं और चरागाह की ओर बढ़ती गौओं की भाँति वृद्धि का पोषण करता है। अंत में इन्द्र को स्वयंचालित और स्वाधीन शासक मानकर यह प्रार्थना की जाती है कि उनकी बढ़ती हुई शक्ति उपासक को सर्वोच्च, चिरस्थायी यश और कल्याणकारी श्रवण प्रदान करे।
Mantra 1
आ मन्द्रैरिन्द्र हरिभिर्याहि मयूररोमभिः । मा त्वा के चिन्नि यमन्विं न पाशिनोऽति धन्वेव ताँ इहि ॥
हे इन्द्र, मन्द्र (आनन्ददायक) हरिभिः—हरित शक्तियों सहित—आओ; मयूर-रोमभिः, उज्ज्वल-पंखयुक्त तेजों सहित आओ। कोई भी पाशिन (बाँधने वाले) तुम्हें गति में न रोकें; धनुष के खुले विस्तार की भाँति उन्हें लाँघकर, सीधे हमारे पास आओ।
Mantra 2
वृत्रखादो वलंरुजः पुरां दर्मो अपामजः । स्थाता रथस्य हर्योरभिस्वर इन्द्रो दृळ्हा चिदारुजः ॥
वृत्र-खाद (वृत्र-आवरणों का भक्षक), वल-रुज (वल-आवरण का भेदक), पुरां-दर्म (पुरों का विदारक), अपामज (अप्सु—जल-प्रवाहों का प्रेरक): हर्यों के रथ पर स्थित, अभिस्वर (गर्जन-युक्त आक्रमण) सहित इन्द्र दृढ़ से दृढ़ को भी चूर-चूर कर देता है।
Mantra 3
गम्भीराँ उदधीँरिव क्रतुं पुष्यसि गा इव । प्र सुगोपा यवसं धेनवो यथा ह्रदं कुल्या इवाशत ॥
तू महासागरों-सी गम्भीर कर्म-शक्ति (क्रतु) को पुष्ट करता है, जैसे तेजस्वी गौ-समूह का पालन-पोषण होता है। जैसे दुहनी गायें चरागाह की ओर दौड़ती हैं, वैसे ही सु-रक्षित वृद्धि-धाराएँ आगे बढ़ती हैं; जैसे कुल्याएँ (नहरें) ह्रद (सर) की ओर बहती हैं, वैसे ही वे भीतर के सरोवर की ओर जा पहुँचती हैं।
Mantra 4
आ नस्तुजं रयिं भरांशं न प्रतिजानते । वृक्षं पक्वं फलमङ्कीव धूनुहीन्द्र सम्पारणं वसु ॥
हमारे लिए प्रेरक समृद्धि—ऐसा भाग जो रोका न जाए—ले आ। हे इन्द्र, उसे हमारे लिए वृक्ष से पके फल की भाँति झाड़ दे; ऐसा धन जो हमें सुरक्षित पार उतार दे।
Mantra 5
स्वयुरिन्द्र स्वराळसि स्मद्दिष्टिः स्वयशस्तरः । स वावृधान ओजसा पुरुष्टुत भवा नः सुश्रवस्तमः ॥
हे इन्द्र, तू स्वयं-प्रेरित है; स्वयं-शासक है; अपने ही विधान से संचालित, अपनी ही कीर्ति में श्रेष्ठ। बल से बढ़ता हुआ, हे बहु-स्तुत, हमारे लिए सर्वाधिक सु-श्रवस् (उत्तम यश-धारी) बन—हमारी वाणी/सत्य को सुनने वाला और उसे सुना देने वाला।
It invites Indra to come quickly to the sacrifice with his harī and to overcome any obstacles or restraints, so he can strengthen the worshipper and bless them with increase and renown.
Kratu here is Indra’s purposeful will and effective intelligence. Calling it ocean-deep means it is vast, steady, and powerful—able to sustain growth and right action over time.
It emphasizes that Indra’s power does not depend on external support—he acts from his own sovereignty. The worshipper then asks that this autonomous strength become a direct protection and a source of lasting fame.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
A free sign-in with Google or Apple keeps your chat saved across web and the app.
Read Rig Veda in the Vedapath app
Scan the QR code to open this directly in the app, with word-by-word meanings, Sanskrit recitation where available, and more.