Rig Veda Sukta 94
Mandala 10Sukta 9414 Mantras

Sukta 94

Sukta 10.94

Devata

Indra (recipient) with Soma-pressing stones (Grāvāṇaḥ) as invoked powers

Chandas

Trishtubh (common in Soma/Indra hymns; cadence fits)

यह सूक्त सोम-पेषण के पत्थरों (ग्रावाणः/अद्रयः) को काव्यात्मक रूप से जीवित, वाणीवान शक्तियों के रूप में व्यक्त करता है, जिनकी लयबद्ध खड़खड़ाहट इन्द्र को अर्पित स्तुति-गान बन जाती है। यह सोम-पेषण की क्रिया-विधि और पवित्रता—उसकी ध्वनि, वेग और सुव्यवस्थित गति—का उत्सव मनाता है, और पत्थरों को ऐसे कर्ता के रूप में दिखाता है जो सोम-रस का सार निकालते हैं तथा यज्ञ के भीतर प्रेरित वाणी (वाच्) को जाग्रत करते हैं।

Mantras

Mantra 1

प्रैते वदन्तु प्र वयं वदाम ग्रावभ्यो वाचं वदता वदद्भ्यः । यदद्रयः पर्वताः साकमाशवः श्लोकं घोषं भरथेन्द्राय सोमिनः ॥

ये (पत्थर) आगे बोलें; और हम भी बोलें। बोलने वालों में, पेरने-शिलाओं (ग्राव) से वाणी कहो। जब वे शिलाएँ—पर्वत-सम, एक साथ वेगवान—सोम-धारियों के लिए इन्द्र को स्तुति-श्लोक और गूँजता घोष ले आती हैं।

Mantra 2

एते वदन्ति शतवत्सहस्रवदभि क्रन्दन्ति हरितेभिरासभिः । विष्ट्वी ग्रावाणः सुकृतः सुकृत्यया होतुश्चित्पूर्वे हविरद्यमाशत ॥

ये (ग्रावाणः) सैकड़ों-हज़ारों में मानो बोल उठते हैं; हरितवर्ण मुखों से चारों ओर गर्जना करते हैं। सुगठित पेषण-पत्थर अपने सुकार्य (सुकृत्या) से—होता के भी प्राचीन, भक्ष्य हवि को—प्राप्त कर लेते हैं।

Mantra 3

एते वदन्त्यविदन्नना मधु न्यूङ्खयन्ते अधि पक्व आमिषि । वृक्षस्य शाखामरुणस्य बप्सतस्ते सूभर्वा वृषभाः प्रेमराविषुः ॥

ये बोलते हैं; उन्होंने बिना किसी वाहन के मधु पा लिया है; पकी हुई आमिषि पर ऊपर से झुलाते-पीड़ते हैं। अरुण वृक्ष की शाखा-सा प्रहार करते हैं; वे सुभार-धारी वृषभ आगे-आगे गरज उठे।

Mantra 4

बृहद्वदन्ति मदिरेण मन्दिनेन्द्रं क्रोशन्तोऽविदन्नना मधु । संरभ्या धीराः स्वसृभिरनर्तिषुराघोषयन्तः पृथिवीमुपब्दिभिः ॥

वे विशाल वाणी बोलते हैं; मदिरा-रस की मन्दता में इन्द्र को पुकारते हुए, उन्होंने प्रत्यक्ष मधु पा लिया है। एकत्र पकड़कर, धीर जन अपनी स्वसृ-बहनों के साथ नाचे; अपने प्रतिध्वनियों से पृथ्वी को गुंजायमान करते हुए।

Mantra 5

सुपर्णा वाचमक्रतोप द्यव्याखरे कृष्णा इषिरा अनर्तिषुः । न्यङ्नि यन्त्युपरस्य निष्कृतं पुरू रेतो दधिरे सूर्यश्वितः ॥

सुपर्ण (सुन्दर-पंखों वाले) ने वाणी (वाक्) को रचा; द्युलोक की खोखली गुहा में कृष्ण, शीघ्रगामी (इषिरा) नाच उठे। वे नीचे उतरते हैं—ऊपरी लोक के निष्कृत (काट-छाँट/उत्कीर्ण) स्थान की ओर; सूर्य-श्वित् (सूर्य-तेज से दीप्त) उन्होंने बहुत-सा रेतस् (बीज/वीर्य) धारण किया।

Mantra 6

उग्रा इव प्रवहन्तः समायमुः साकं युक्ता वृषणो बिभ्रतो धुरः । यच्छ्वसन्तो जग्रसाना अराविषुः शृण्व एषां प्रोथथो अर्वतामिव ॥

उग्रों की भाँति आगे को प्रवाहित होते हुए वे एकत्र खिंच आए; एक साथ युक्त, वृषभ (बलवान) धुर (जुए की डंडियाँ) धारण करते हैं। जब वे हाँफते, ग्रसते हुए गर्जना करते हैं, तब उनकी गड़गड़ाहट घोड़ों के समान सुनाई देती है।

Mantra 7

दशावनिभ्यो दशकक्ष्येभ्यो दशयोक्त्रेभ्यो दशयोजनेभ्यः । दशाभीशुभ्यो अर्चताजरेभ्यो दश धुरो दश युक्ता वहद्भ्यः ॥

दश अवनि (पट्टों) को, दश कक्ष्य (गिर्थ/बंध) को, दश योक्त्र (जुए/जोड़) को, दश योजन (बंधन) को—गाओ। दश भीशु (लगाम/रेन) को, अजर (अविनाशी) को—अर्चना करो। दश धुर (जुए की डंडियाँ) हैं, और दश युक्त वहनकर्ता हैं जो भार ढोते हैं।

Mantra 8

ते अद्रयो दशयन्त्रास आशवस्तेषामाधानं पर्येति हर्यतम् । त ऊ सुतस्य सोम्यस्यान्धसोंऽशोः पीयूषं प्रथमस्य भेजिरे ॥

वे अद्रि (सोम-पीषण-शिला) दस-यंत्रों से युक्त, वेगवान हैं; उनका हरित-स्वर्ण, वांछनीय अधान (स्थापन) चारों ओर घूमता है। वे पिसे हुए सोम के सोम्य अन्धस् के अंश का प्रथम मधुर सार—आनन्द-रस का पीयूष—अपने लिए ग्रहण करते हैं।

Mantra 9

ते सोमादो हरी इन्द्रस्य निंसतेंऽशुं दुहन्तो अध्यासते गवि । तेभिर्दुग्धं पपिवान्त्सोम्यं मध्विन्द्रो वर्धते प्रथते वृषायते ॥

वे सोम-भोजी हरि (इन्द्र के अश्व) समीप आते हैं; सोम-अंशु को दुहते हुए वे ‘गवि’ (गौ—दीप्त क्षेत्र) पर अध्यासित होते हैं। उन्हीं से दुहा हुआ सोम्य मधु पीकर इन्द्र बढ़ता है—वह फैलता है, वृषा-शक्ति बनकर प्रकट होता है।

Mantra 10

वृषा वो अंशुर्न किला रिषाथनेळावन्तः सदमित्स्थनाशिताः । रैवत्येव महसा चारवः स्थन यस्य ग्रावाणो अजुषध्वमध्वरम् ॥

तुम्हारे लिए सोम-अंशु वृषा (वृषभ-बल) है; प्रहार में तुम कदापि नहीं चूकते। इळा-सम्पन्न, सदा ही स्तन-आहार से पोषित हो। रैवती के समान महिमा से शोभित, उज्ज्वल बनो—हे ग्रावाणः—जिन्होंने मध्वर (यज्ञ) को आनन्दपूर्वक स्वीकार किया है।

Mantra 11

तृदिला अतृदिलासो अद्रयोऽश्रमणा अशृथिता अमृत्यवः । अनातुरा अजराः स्थामविष्णवः सुपीवसो अतृषिता अतृष्णजः ॥

हे सोम-पीषण के अद्रि (पेषण-पाषाणो), तुम दृढ़ और अखण्ड हो; श्रम-रहित और अचलित, अपने कर्म में अमृतस्वरूप हो। तुम अनातुर, अजर हो; अविष्णु—अडिग बल में स्थित हो। रस-सम्पन्न, अतृषित हो; अतृष्ण-आनन्द से उत्पन्न हो।

Mantra 12

ध्रुवा एव वः पितरो युगेयुगे क्षेमकामासः सदसो न युञ्जते । अजुर्यासो हरिषाचो हरिद्रव आ द्यां रवेण पृथिवीमशुश्रवुः ॥

युग-युग से तुम्हारे पितर ध्रुव हैं, क्षेम की कामना करने वाले; सभा के अधिपतियों की भाँति वे तुम्हें कर्म में युक्त करते हैं। अजर, हरिषाच—हरित-काञ्चन गति वाले, हरिद्रव—पीताभ प्रकाश से प्रवाहित, तुम अपने नाद से द्यौ और पृथिवी को गुंजा देते हो।

Mantra 13

तदिद्वदन्त्यद्रयो विमोचने यामन्नञ्जस्पा इव घेदुपब्दिभिः । वपन्तो बीजमिव धान्याकृतः पृञ्चन्ति सोमं न मिनन्ति बप्सतः ॥

विमोचन के क्षण में ये अद्रि यही उद्घोष करते हैं, मानो प्रत्युत्तर-प्रहारों से वेगवान अञ्जस्पा (शीघ्र-पीषक) हों। बीज बोने वालों की भाँति, पकी धान्य-रचना करने वालों की भाँति, वे सोम को छिड़कते हैं; परिश्रम करते हुए भी उसे घटाते नहीं।

Mantra 14

सुते अध्वरे अधि वाचमक्रता क्रीळयो न मातरं तुदन्तः । वि षू मुञ्चा सुषुवुषो मनीषां वि वर्तन्तामद्रयश्चायमानाः ॥

सुते हुए सोम-यज्ञ में, अविच्छिन्न अध्वर में, तुमने वाणी को उस पर स्थापित किया—जैसे खेल-खेल में बच्चे अपनी माता को चुभोते-ठेलते हैं। जो भली-भाँति निचोड़ी गई है, उस मनीषा (अन्तःप्रेरित बुद्धि) को पूरी तरह खोल दो; और खोजते-संग्रह करते हुए अद्रि (सोम-पाषाण) अपने नियत परिक्रमण में घूमते-फिरते रहें।

Frequently Asked Questions

Because the Veda treats ritual sound as sacred power: the stones’ clatter is imagined as a kind of speech (Vāc) that becomes praise and helps carry the offering to Indra.

Indra is the main recipient of the offering, but the hymn also invokes the Grāvāṇaḥ/Adrayaḥ as active divine-like powers within the Soma ritual.

Repeated, disciplined action ‘presses out’ an essence: outwardly the Soma juice, inwardly clarity and inspired thought—released through ordered effort and sacred speech.

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