Rig Veda Sukta 9
Mandala 10Sukta 99 Mantras

Sukta 9

Sukta 10.9

Rishi

Sindhudvīpa Āmbara (traditional Anukramaṇī attribution for RV 10.9, Āpaḥ-sūkta)

Devata

Āpaḥ (Waters)

Chandas

Gāyatrī (3 pādas of 8 syllables)

ऋग्वेद 10.9 ‘आपः’ (जल) को समर्पित स्तोत्र है। जल को आनंद, पोषण, बल, निर्मल दृष्टि और आरोग्य के स्रोत के रूप में सराहा गया है। कवि उनसे जीवन-शक्ति तथा औषधि-सदृश शुद्धि की याचना करता है और अंत में उनके ‘रस’ (सार) के साथ अंतरंग संयोग का भाव प्रकट करता है, जिससे अग्नि भी उस नवीकृत, प्रकाशमय अवस्था में प्रविष्ट होती है।

Mantras

Mantra 1

आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन । महे रणाय चक्षसे ॥

हे आपः! तुम निश्चय ही आनन्द-प्रद (मयोभू) हो; हमारे भीतर पोषण देने वाली ऊर्ज़ा (ऊर्जस्) धारण कराओ—महान रण के लिए और दिव्य दर्शन (चक्षस्) के लिए।

Mantra 2

यो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेह नः । उशतीरिव मातरः ॥

तुम्हारा जो परम शिवतम रस है—उसे यहाँ हमारे साथ बाँटो; हे मातृस्वरूपिणी आपः! जैसे उत्कंठित माताएँ अपना स्नेह बाँटती हैं।

Mantra 3

तस्मा अरं गमाम वो यस्य क्षयाय जिन्वथ । आपो जनयथा च नः ॥

उसके पास हम यथोचित जाएँ—जिसके निवास-स्थान (क्षय) के लिए तुम उसे प्रेरित/पुष्ट करती हो; और हे आपः! तुम हमारे भीतर भी जन्म (जनयथा) उत्पन्न करती हो।

Mantra 4

शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये । शं योरभि स्रवन्तु नः ॥

हमारे लिए ये देवी आपः कल्याणकारी, अभीष्ट-सहायिनी और पानार्थ (पीतये) हों। वे हमारे प्रति शान्ति और सुख-कल्याण देने वाले रस के साथ प्रवाहित हों।

Mantra 5

ईशाना वार्याणां क्षयन्तीश्चर्षणीनाम् । अपो याचामि भेषजम् ॥

हे आपः! तुम्‍ही धन-निधींच्या अधिष्ठात्री, जनसमुदायांत वसणाऱ्या (क्षयन्ती) आहात; तुमच्याकडून मी भेषज—उपचारक, आरोग्यदायी शक्ती—याची याचना करतो.

Mantra 6

अप्सु मे सोमो अब्रवीदन्तर्विश्वानि भेषजा । अग्निं च विश्वशम्भुवम् ॥

अप्सु—जलांत—सोम ने मुझसे कहा: ‘अन्तः (भीतर) ही सब भेषज हैं; और अग्नि भी—विश्वशम्भु, सर्वकल्याणकर्ता।’

Mantra 7

आपः पृणीत भेषजं वरूथं तन्वे मम । ज्योक्च सूर्यं दृशे ॥

हे आपः! मेरे तनु के लिए औषधि-शक्ति, अचूक वरूथ (रक्षा) मुझे पूर्ण करो; और यह भी दो कि मैं दीर्घकाल तक सूर्य को दर्शन करूँ।

Mantra 8

इदमापः प्र वहत यत्किं च दुरितं मयि । यद्वाहमभिदुद्रोह यद्वा शेप उतानृतम् ॥

हे आपः! इसे बहा ले जाओ—मुझमें जो कुछ भी दुरित (दुःख/दोष) है; या मैंने विद्रोह में हिंसा की हो, या वाणी में शपथ और अनृत (असत्य) में गिर पड़ा हूँ।

Mantra 9

आपो अद्यान्वचारिषं रसेन समगस्महि । पयस्वानग्न आ गहि तं मा सं सृज वर्चसा ॥

हे आपः! आज मैं तुम्हारे साथ चला हूँ; रस में हम समग (समरस) हुए हैं। हे पयस्वान् अग्नि! यहाँ आओ; अपने तेजस्वी वर्चस् से मुझे पूर्णतः संयुक्त कर दो।

Frequently Asked Questions

It praises the Waters as living divine powers that bring joy, nourishment, and purification, and it asks them for strength, clear perception, and healing.

Because water is seen not only as physically cleansing but also as restoring wholeness—washing away impurity and imbalance and returning health and vitality.

It is commonly recited during purification (ācamana/prokṣaṇa), before worship or fire-rituals, and in prayers for health—using clean water as the ritual support for the mantra’s intent.

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