Rig Veda Sukta 83
Mandala 10Sukta 837 Mantras

Sukta 83

Sukta 10.83

Rishi

Manyu (personified) / traditionally attributed to a seer of the Manyu hymns (Book 10, late layer; specific attribution varies by Anukramaṇī)

Devata

Manyu (Wrath/Ardour as divine power, often linked with Indra)

Chandas

Triṣṭubh (probable)

यह सूक्त मन्यु—दिव्य क्रोध/उत्साह—का आह्वान करता है, जो इन्द्र की विजयी शक्ति का सहचर देवतुल्य बल है। उपासक प्रार्थना करता है कि युद्ध में मन्यु उसके साथ जुते, ताकि वृत्र-सदृश अवरोधों और शत्रु शक्तियों का दमन हो। मन्यु को स्वयंजात, अप्रतिहत और सर्वत्र क्रियाशील कहा गया है, और उससे याचना की जाती है कि वह ‘हम में बल स्थापित करे’—अन्तरंग और बाह्य दोनों संघर्षों के लिए। सूक्त का समापन निकट-सहचर्य के बिंब से होता है—मन्यु दाहिने हाथ पर—और इसे मधुर रस (सोम/मधु-युक्त आहुति) के अर्पण से मुहरबंद किया जाता है, जो गुप्त, अन्तःपान के लिए है।

Mantras

Mantra 1

यस्ते मन्योऽविधद्वज्र सायक सह ओजः पुष्यति विश्वमानुषक् । साह्याम दासमार्यं त्वया युजा सहस्कृतेन सहसा सहस्वता ॥

हे मन्यु! जिसने तेरे वज्र और बाण को सुसज्जित किया है, वही तेरे बल और ओज को बढ़ाता है, जो समस्त मानव-लोक में अपना प्रवाह पोषित करता है। हे सहस्कृत (बल से गढ़े हुए) सहस्वन्! तेरे साथ युग्म होकर—बल से बल को साधते हुए—हम त्वारे प्रबल सहसा से दास (अन्धकार-रोधक) और आर्य (मानव-भेद) दोनों पर विजय पाएं।

Mantra 2

मन्युरिन्द्रो मन्युरेवास देवो मन्युर्होता वरुणो जातवेदाः । मन्युं विश ईळते मानुषीर्याः पाहि नो मन्यो तपसा सजोषाः ॥

मन्यु ही इन्द्र है; मन्यु ही निश्चय देव है। मन्यु ही होता है, वरुण है, जातवेदस् (जन्मों का ज्ञाता) है। मानुषी प्रजाएँ मन्यु की स्तुति करती हैं; हे मन्यो! तपस् के साथ सजोशा (समरस-संयोग) होकर हमारी रक्षा कर।

Mantra 3

अभीहि मन्यो तवसस्तवीयान्तपसा युजा वि जहि शत्रून् । अमित्रहा वृत्रहा दस्युहा च विश्वा वसून्या भरा त्वं नः ॥

हे मन्यो! तवसों में भी तवसीयन्, हमारे निकट आ; तपस् से युक्त होकर शत्रुओं को विदीर्ण कर। अमित्रहा, वृत्रहा, दस्युहा—तू हमारे लिए समस्त वसूनि (सम्पदाएँ) ले आ।

Mantra 4

त्वं हि मन्यो अभिभूत्योजाः स्वयम्भूर्भामो अभिमातिषाहः । विश्वचर्षणिः सहुरिः सहावानस्मास्वोजः पृतनासु धेहि ॥

हे मन्यु! तू ही वह ओज है जो सब पर अभिभव करता है; तू स्वयम्भू है—दीप्त तेज, जो शत्रु-आक्रान्ताओं को पराजित करता है। हे विश्वचरषणि, हे सहुरि, हे सहावान! युद्धों के भीतर, हमारे भीतर अपना ओज धारण करा।

Mantra 5

अभागः सन्नप परेतो अस्मि तव क्रत्वा तविषस्य प्रचेतः । तं त्वा मन्यो अक्रतुर्जिहीळाहं स्वा तनूर्बलदेयाय मेहि ॥

मैं अभागा होकर, मानो अलग पड़ गया हूँ; हे प्रचेतः, हे तविषस्य! यह सब तेरे क्रतु—तेरी संकल्प-शक्ति—से ही है। इसलिए, हे मन्यु, मेरे भीतर के अक्रतु—निर्बुद्धि—को तिरस्कृत कर; और मेरी अपनी तनु के पास आ—उसे बल देनेवाली बना।

Mantra 6

अयं ते अस्म्युप मेह्यर्वाङ्प्रतीचीनः सहुरे विश्वधायः । मन्यो वज्रिन्नभि मामा ववृत्स्व हनाव दस्यूँरुत बोध्यापेः ॥

यह मैं हूँ—तेरा ही; मेरे पास आ, मेरी ओर मुख कर, हे सहुरे, हे विश्वधायः। हे मन्यु, वज्रधारी! मुझे चारों ओर से आवृत कर; हम दस्युओं का वध करें, और आपः—पवित्र करनेवाली गहराइयों—की ओर जागें।

Mantra 7

अभि प्रेहि दक्षिणतो भवा मेऽधा वृत्राणि जङ्घनाव भूरि । जुहोमि ते धरुणं मध्वो अग्रमुभा उपांशु प्रथमा पिबाव ॥

मेरे साथ आगे बढ़; मेरे दाहिने ओर स्थित हो। तब हम बहुत-से वृत्रों—अवरोधक आवरणों—को रौंद डालें। मैं तेरे लिए मधु का धारण करने वाला प्रथम सार अर्पित करता हूँ; तुम दोनों उपांशु—गुप्त रूप से—पहला पान करो।

Frequently Asked Questions

Manyu is divine ardour or sacred wrath—an overpowering, blazing force closely resembling Indra’s victorious energy. The hymn treats this ‘wrath’ as a deity that can be invoked and internalized as strength.

No. While it uses battle language (weapons, enemies, Vṛtra), it also points to inner struggle—overcoming fear, inertia, and inner division by placing Manyu’s ojas (force) within oneself.

The hymn ends by pouring the first essence of sweetness (Soma/madhu imagery) and inviting secret drinking. This symbolizes communion—taking Manyu’s power inward in a controlled, consecrated form.

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