
Sukta 10.79
Not explicitly named in this single verse; appears to describe a mighty immortal force active among mortals (often interpreted in RV 10.79 as Agni or a consuming cosmic power—requires hymn-level identification)
Triṣṭubh (probable; needs confirmation)
यह सूक्त मनुष्यों के बीच विचरने वाली एक भयानक किन्तु कल्याणकारी अमर शक्ति का चिंतन करता है—जिसकी सबसे संगत पहचान अग्नि के रूप में होती है, उसके भक्षण और रूपान्तरण करने वाले स्वरूप में। इसमें अग्नि को सर्वभक्षी “गर्भ” कहा गया है, जो अपनी दो माताओं—द्यौ और पृथ्वी—का ही आहार करता है; फिर उसे ऐसी योजक शक्ति के रूप में दिखाया गया है जो विपरीत/विखरी ऊर्जाओं को अनुशासित कर एकत्र करती है, और अंततः मित्र तथा वसुओं के अधीन ऋत (सत्य-व्यवस्था) में सामंजस्य और सुव्यवस्था की परिणति कराती है।
Mantra 1
अपश्यमस्य महतो महित्वममर्त्यस्य मर्त्यासु विक्षु । नाना हनू विभृते सं भरेते असिन्वती बप्सती भूर्यत्तः ॥
मैंने इस महाबली के महान महत्त्व को देखा—अमर का, जो मर्त्य जनों के बीच विचरता है। दो जबड़े, भिन्न-भिन्न और धारण किए हुए, साथ लाते और वहन करते हैं; वह रुकती नहीं, वह परिश्रम करती है और बहुत कुछ निगल जाती है।
Mantra 2
गुहा शिरो निहितमृधगक्षी असिन्वन्नत्ति जिह्वया वनानि । अत्राण्यस्मै पड्भिः सं भरन्त्युत्तानहस्ता नमसाधि विक्षु ॥
गुहा (गुप्त गुफा) में शिर (शीर्ष) स्थापित है और दोनों नेत्र अलग-अलग स्थित हैं। बाहर से न दबाया गया हुआ भी वह अपनी जिह्वा से वनों को भक्षण करता है। उसके लिए जन-समुदाय चरणों से अर्घ्य/हविर्द्रव्य समेटते हैं; और उत्तान-हस्त होकर नमस्कार सहित कुलों (विक्षु) में उसे प्रतिष्ठित करते हैं।
Mantra 3
प्र मातुः प्रतरं गुह्यमिच्छन्कुमारो न वीरुधः सर्पदुर्वीः । ससं न पक्वमविदच्छुचन्तं रिरिह्वांसं रिप उपस्थे अन्तः ॥
माता (प्रकृति) से भी अधिक गुप्त को खोजता हुआ वह कुमार, विस्तीर्ण प्रदेशों पर लता-सा सरकता चला। उसने मानो पका हुआ—दीप्तिमान—डंठल पाया, जो भीतर शत्रु के उपस्थ (अंक) में चाटता हुआ था।
Mantra 4
तद्वामृतं रोदसी प्र ब्रवीमि जायमानो मातरा गर्भो अत्ति । नाहं देवस्य मर्त्यश्चिकेताग्निरङ्ग विचेताः स प्रचेताः ॥
हे द्यावा-पृथिवी (रोदसी), तुमचा हा ऋत (सत्य-नियम) मी प्रकट करतो: जन्म लेता हुआ गर्भ दोनों माताओं को भक्षण करता है। मैं, मर्त्य, उस देव को पूर्णतः नहीं जानता; अग्नि ही अन्तर्यामी विवेचक है—वही प्रचेत (पूर्वज्ञान-सम्पन्न) है।
Mantra 5
यो अस्मा अन्नं तृष्वादधात्याज्यैर्घृतैर्जुहोति पुष्यति । तस्मै सहस्रमक्षभिर्वि चक्षेऽग्ने विश्वतः प्रत्यङ्ङसि त्वम् ॥
जो उसके लिए त्रिविध आधारों में अन्न को स्थापित करता है, जो आज्य-घृत से हवन करता है और पोषण करता है—उसकी ओर, हे अग्नि, तुम सहस्र नेत्रों से देखते हो; तुम सर्वतः प्रत्यङ्मुख होकर (सब ओर से) उसकी ओर उन्मुख होते हो।
Mantra 6
किं देवेषु त्यज एनश्चकर्थाग्ने पृच्छामि नु त्वामविद्वान् । अक्रीळन्क्रीळन्हरिरत्तवेऽदन्वि पर्वशश्चकर्त गामिवासिः ॥
हे अग्नि, देवों के बीच त्याग का कौन-सा अपराध तुमने किया है? मैं अब तुम्हें पूछता हूँ, अज्ञानी होकर। न खेलते हुए—फिर भी खेलते हुए—हरि (ताम्रवर्ण) भक्षण के लिए, जैसे कसाई-छुरी गाय को, वैसे ही (देह को) पर्व-पर्व काटता चला गया।
Mantra 7
विषूचो अश्वान्युयुजे वनेजा ऋजीतिभी रशनाभिर्गृभीतान् । चक्षदे मित्रो वसुभिः सुजातः समानृधे पर्वभिर्वावृधानः ॥
वनज (वन में जन्मा) ने विषूचि—भिन्न दिशाओं में जाने वाले—अश्वों को जोता, ऋजीति (सीधी गति) वाली रशनाओं से उन्हें बाँधकर। वसुओं सहित सुजात मित्र ने देखा; पर्वों से बढ़ता हुआ वह समान ऋधि—एक ही सम्यक् अधिकार—की ओर प्रवृद्ध हुआ।
The hymn’s imagery best fits Agni: an immortal power among mortals, a consuming and transforming fire, and a divine knower (vicetā/pracetā). The last verse also brings in Mitra, highlighting harmony as the outcome.
On the cosmic level, Agni (or the divine Fire) is born within the worlds and then transforms them by his heat and power. In inner terms, awakened spiritual fire reshapes both our physical nature and our mind that originally ‘bore’ it.
The ‘horses’ symbolize scattered drives and energies. The hymn says the divine force disciplines and guides them with straight ‘reins’ so they move toward a common rightness, culminating in concord associated with Mitra.
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