Rig Veda Sukta 62
Mandala 10Sukta 6211 Mantras

Sukta 62

Sukta 10.62

Rishi

Angirasa tradition (hymn addressed to the Angirases as a collective of seer-powers)

Devata

Angirasaḥ (often linked with Indra’s work of finding the cows; here directly invoked)

Chandas

Triṣṭubh (probable)

यह सूक्त अङ्गिरसों का आवाहन करता है—ऋषि-शक्तियों की एक सामूहिक परम्परा के रूप में—जिन्होंने यज्ञ और दक्षिणा के द्वारा इन्द्र की मैत्री तथा ‘अमृतत्व’ में भाग प्राप्त किया। इसमें अग्नि से उनके तेजस्वी जन्म का स्मरण है, नवग्व और दशग्व के रूप में उनकी प्रसिद्ध संगति का भी, और उनसे प्रार्थना की जाती है कि वे मानव यजमान को ‘थाम लें’—दाता मनु की रक्षा करें, दक्षिणा को शीघ्र फलवती करें, और आयु का विस्तार करें, ताकि समुदाय वाज (समृद्धि, विजयी शक्ति) को प्राप्त करे।

Mantras

Mantra 1

ये यज्ञेन दक्षिणया समक्ता इन्द्रस्य सख्यममृतत्वमानश । तेभ्यो भद्रमङ्गिरसो वो अस्तु प्रति गृभ्णीत मानवं सुमेधसः ॥

जो यज्ञ और दक्षिणा से अभिषिक्त हैं, जिन्होंने इन्द्र की सख्यता और अमृतत्व की अवस्था प्राप्त की है—उनके लिए कल्याण हो, हे अङ्गिरसो, तुम्हारा हो। हे सुमेधस (सुप्रज्ञ), प्रत्युपहार रूप में मनुष्य को ग्रहण करो, उसे अपने वश में लो।

Mantra 2

य उदाजन्पितरो गोमयं वस्वृतेनाभिन्दन्परिवत्सरे वलम् । दीर्घायुत्वमङ्गिरसो वो अस्तु प्रति गृभ्णीत मानवं सुमेधसः ॥

हे पितृगण! तुमने गो-सम्पत्ति रूप धन को उदित किया; ऋत (सत्य-नियम) के द्वारा वर्ष-चक्र में वल (आवरण) को भेदकर खोल दिया। हे अङ्गिरसों! तुम्हें दीर्घायु प्राप्त हो; हे सुमेधसों! प्रतिदान रूप में इस मानव को ग्रहण करो।

Mantra 3

य ऋतेन सूर्यमारोहयन्दिव्यप्रथयन्पृथिवीं मातरं वि । सुप्रजास्त्वमङ्गिरसो वो अस्तु प्रति गृभ्णीत मानवं सुमेधसः ॥

तुमने ऋत (सत्य-नियम) के द्वारा सूर्य को उसके आरोहण पर स्थापित किया; माता पृथ्वी को उसकी व्यापकता में विस्तृत किया। हे अङ्गिरसों! तुम्हें सुप्रजास्त्व (सु-संतति) प्राप्त हो; हे सुमेधसों! प्रतिदान रूप में इस मानव को ग्रहण करो।

Mantra 4

अयं नाभा वदति वल्गु वो गृहे देवपुत्रा ऋषयस्तच्छृणोतन । सुब्रह्मण्यमङ्गिरसो वो अस्तु प्रति गृभ्णीत मानवं सुमेधसः ॥

यह नभा तुम्हारे गृह में मधुर, उज्ज्वल वाणी बोलता है; हे देवपुत्र ऋषियों! उसे सुनो। हे अङ्गिरसों! तुम्हें सुब्रह्मण्य (पवित्र वाणी की शुभ, पुष्टिदायक शक्ति) प्राप्त हो; हे सुमेधसों! प्रतिदान रूप में इस मानव को ग्रहण करो।

Mantra 5

विरूपास इदृषयस्त इद्गम्भीरवेपसः । ते अङ्गिरसः सूनवस्ते अग्नेः परि जज्ञिरे ॥

वे ऋषि निश्चय ही बहुरूप हैं, और अपनी अंतः-ध्वनि की गहन कम्पन-शक्ति से युक्त हैं। वे अङ्गिरस हैं, उनके पुत्र—अग्नि से, चारों ओर से, उत्पन्न हुए।

Mantra 6

ये अग्नेः परि जज्ञिरे विरूपासो दिवस्परि । नवग्वो नु दशग्वो अङ्गिरस्तमो सचा देवेषु मंहते ॥

जो अग्नि से उत्पन्न हुए—बहुरूप—विस्तीर्ण द्युलोक से; कभी नवग्व, कभी दशग्व—जो सारतः सर्वाधिक अङ्गिरस है, वह देवों के बीच संगति में महान होता है।

Mantra 7

इन्द्रेण युजा निः सृजन्त वाघतो व्रजं गोमन्तमश्विनम् । सहस्रं मे ददतो अष्टकर्ण्यः श्रवो देवेष्वक्रत ॥

इन्द्र के साथ युक्त होकर, स्तोता बाहर की ओर गोमन्त, अश्विन—किरणों और शीघ्र शक्तियों से समृद्ध—व्रज को मुक्त करते हैं। मुझे सहस्रगुण दान करते हुए, अष्टकर्ण्यः ने देवों में मेरे लिए श्रवण-यश रचा।

Mantra 8

प्र नूनं जायतामयं मनुस्तोक्मेव रोहतु । यः सहस्रं शताश्वं सद्यो दानाय मंहते ॥

अब निश्चय ही यह मनु प्रकट होकर जन्म ले; वह टोक्म (अंकुर) की भाँति दृढ़ होकर बढ़े। जो सहस्र-गुण और शत-अश्व (शत तीव्र शक्तियों) को, दान के लिए, तत्क्षण बढ़ाता है।

Mantra 9

न तमश्नोति कश्चन दिव इव सान्वारभम् । सावर्ण्यस्य दक्षिणा वि सिन्धुरिव पप्रथे ॥

उस ऊँचाई तक कोई भी नहीं पहुँचता—जैसे कोई स्वर्ग के शिखर को पकड़ना चाहे। सावर्‍ण्य की दक्षिणा (दान-शक्ति) बाढ़ के नदी-प्रवाह की भाँति व्यापक होकर फैल गई है।

Mantra 10

उत दासा परिविषे स्मद्दिष्टी गोपरीणसा । यदुस्तुर्वश्च मामहे ॥

और जो दास (विरोधी शक्तियाँ) आक्रमण में हमें घेरते हैं, वे हमारी नियोजित दृष्टि और रक्षक-बल से परास्त हो जाती हैं; इस प्रकार हम यदु और तुर्वश (प्रतिरोधी विन्यासों) पर विजय पाते हैं।

Mantra 11

सहस्रदा ग्रामणीर्मा रिषन्मनुः सूर्येणास्य यतमानैतु दक्षिणा । सावर्णेर्देवाः प्र तिरन्त्वायुर्यस्मिन्नश्रान्ता असनाम वाजम् ॥

हज़ार-दान करने वाले जन-नायक—यह मनु—अहिंसित रहे; उसकी दक्षिणा सूर्य के साथ प्रयत्न करती हुई आगे बढ़े। सावर्ण्य के देव उसके आयु-प्राण का विस्तार करें, जिसमें हम अश्रान्त होकर वाज (बल-समृद्धि) को प्राप्त करें।

Frequently Asked Questions

They are a collective of ancient seer-priests, portrayed as born from Agni and working with Indra. In the hymn they represent powerful mantra and ritual forces that help humans win light, wealth, and spiritual attainment.

Dakṣiṇā is both the concrete offering to priests and a sacred “giving-power” that completes the sacrifice. The hymn treats right-giving as a force that aligns the rite with truth (Sūrya) and brings protection, prosperity, and lasting vitality.

That the patron-leader Manu not be harmed, that his dakṣiṇā move forward in the light of the Sun, and that the gods extend his life so the community may unweariedly win vāja—plenitude and victorious strength.

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