
Sukta 10.52
Agni/Hotṛ persona (self-reflective hymn on becoming Hotṛ)
Viśve Devāḥ (All-Gods), with Agni as ritual agent implied
Trishtubh (probable; requires metrical verification)
यह संक्षिप्त सूक्त होतृ-दीक्षा का आत्मचिन्तनात्मक आख्यान है, जिसमें अग्नि (पुरोहित-स्वरूप वाणी) विश्वे देवाः से यज्ञ-मार्ग की शुद्ध विधि, अपना नियत भाग, और आहुति को ठीक प्रकार से पहुँचाने की रीति सिखाने की प्रार्थना करता है। तब देवगण उसे ‘हव्यवाह’—आहुति-वाहक—के रूप में स्थापित करते हैं, जो बाधाओं को पार कर सके और नियत, क्रमबद्ध मापों से यज्ञ का सम्यक् विन्यास करे; और अंत में बिछे हुए बर्हिस पर उसे होतृ-पद पर प्रतिष्ठित किया जाता है।
Mantra 1
विश्वे देवाः शास्तन मा यथेह होता वृतो मनवै यन्निषद्य । प्र मे ब्रूत भागधेयं यथा वो येन पथा हव्यमा वो वहानि ॥
हे विश्वदेवो! मुझे ऐसा उपदेश दो कि यहाँ—जब मैं मनुष्य के लिए वृत होता बनकर बैठूँ—मैं जान सकूँ। मुझे स्पष्ट कहो कि तुम्हारा भागधेय मुझे कैसे मिले; और वह पथ भी, जिस पथ से मैं तुम्हारा हव्य तुम्हारे पास वहन करूँ।
Mantra 2
अहं होता न्यसीदं यजीयान्विश्वे देवा मरुतो मा जुनन्ति । अहरहरश्विनाध्वर्यवं वां ब्रह्मा समिद्भवति साहुतिर्वाम् ॥
मैं होता (होतृ) बैठ गया हूँ—यज्ञ के लिए अधिक योग्य; विश्वेदेव और मरुत मुझे प्रेरित करते हैं। हे अश्विनौ, दिन-प्रतिदिन तुम्हारे लिए अध्वर्यु-कर्म वाणी में समिधा बनता है; और वही समिधा तुम्हारी सत्य आहुति बनती है।
Mantra 3
अयं यो होता किरु स यमस्य कमप्यूहे यत्समञ्जन्ति देवाः । अहरहर्जायते मासिमास्यथा देवा दधिरे हव्यवाहम् ॥
यह होता—वह कौन है? मैं यम के रहस्य को भी मन में टटोलता हूँ; क्योंकि देव उसे अभिषिक्त कर सजाते हैं। वह दिन-प्रतिदिन, मास-मास जन्म लेता है; इसी प्रकार देवों ने हव्यवाह (आहुति-वाहक) को स्थापित किया।
Mantra 4
मां देवा दधिरे हव्यवाहमपम्लुक्तं बहु कृच्छ्रा चरन्तम् । अग्निर्विद्वान्यज्ञं नः कल्पयाति पञ्चयामं त्रिवृतं सप्ततन्तुम् ॥
देवों ने मुझे हव्यवाह (आहुति-वाहक) ठहराया—अच्युत, अनेक कठिनाइयों में विचरता हुआ। यज्ञ-विद् अग्नि हमारे लिए यज्ञ को रचता है—पंचयाम, त्रिवृत, सप्ततन्तु—सुव्यवस्थित चेतना-कर्म।
Mantra 5
आ वो यक्ष्यमृतत्वं सुवीरं यथा वो देवा वरिवः कराणि । आ बाह्वोर्वज्रमिन्द्रस्य धेयामथेमा विश्वाः पृतना जयाति ॥
मैं तुम्हारे लिए अमृतत्व और सुवीर्य (श्रेष्ठ वीर-बल) हेतु यज्ञ करूँ, ताकि, हे देवो, मैं तुम्हारे लिए अपने भीतर विस्तृत अवकाश (वरिवः) कर सकूँ। मैं अपनी भुजाओं में इन्द्र के वज्र-बल को धारण करूँ; तब ये समस्त पृतनाएँ—हर संघर्ष—जीती जाएँ, जहाँ प्रकाश को प्रतिरोधी तम से विजय पानी है।
Mantra 6
त्रीणि शता त्री सहस्राण्यग्निं त्रिंशच्च देवा नव चासपर्यन् । औक्षन्घृतैरस्तृणन्बर्हिरस्मा आदिद्धोतारं न्यसादयन्त ॥
तीन सौ, तीन सहस्र, और तीस तथा नौ—देवों ने अग्नि की सेवा की। उन्होंने उसे घृत (दीप्त शुद्ध रस) से अभिषिक्त किया, उसके लिए बर्हि (पवित्र आसन) बिछाया; तब उन्होंने होत्र को बैठाया—कर्म-क्षेत्र में पुरोहित-अग्नि को दृढ़तापूर्वक स्थापित किया।
It is about Agni, speaking like a priest, asking the All-Gods to teach him the correct way to perform the sacrifice and then being established as the Hotṛ who carries offerings to the gods.
Because the hymn treats the sacrifice as something governed by the whole divine order; the “All-Gods” represent the complete set of powers that authorize and perfect the rite, with Agni acting as their ritual agent.
It describes the yajña as an ordered structure with multiple coordinated layers and continuities—ritual measures on the surface, and a deeper idea that the sacrifice must be properly arranged to work effectively.
Read Rig Veda in the Vedapath app
Scan the QR code to open this directly in the app, with audio, word-by-word meanings, and more.