
Sukta 10.36
Viśvedevāḥ (enumerative invocation of many deities/powers)
Jagatī or Triṣṭubh (uncertain; requires metrical verification due to long enumerations)
यह सूक्त एक विस्तृत ‘विश्वेदेवाः’ आह्वान है, जो उषा और रात्रि, द्यावा–पृथिवी, आदित्य, इन्द्र, मरुत, आपः आदि अनेक ब्रह्माण्डीय शक्तियों को एक ही संरक्षण और ऋत (सही व्यवस्था) के क्षेत्र में एकत्र करता है। गणनात्मक स्तुति और प्रार्थना के क्रम में यह यज्ञ, प्राणबल तथा जीवन-यात्रा में सुरक्षित गमन के लिए देव-‘अवः’ (सहायता/रक्षा) की याचना करता है। अंत में यह दिशाओं सहित सर्वव्यापी रूप से सविता से ‘सर्वताति’ (समग्रता/पूर्ण कल्याण) को प्रेरित करने और दीर्घायु प्रदान करने की प्रार्थना पर समाप्त होता है।
Mantra 1
उषासानक्ता बृहती सुपेशसा द्यावाक्षामा वरुणो मित्रो अर्यमा । इन्द्रं हुवे मरुतः पर्वताँ अप आदित्यान्द्यावापृथिवी अपः स्वः ॥
उषा और रात्रि को मैं पुकारता हूँ—विस्तीर्ण, सुन्दर-रूपिणी; द्यावा-क्षामा (द्यौः-पृथिवी), वरुण, मित्र, अर्यमा को। इन्द्र को मैं पुकारता हूँ, मरुतों को, पर्वतों को, आपः (जल) को, आदित्यों को; और द्यावा-पृथिवी, आपः, स्वः (दीप्तिमान लोक) को—ये विश्वशक्तियाँ हमारे भीतर हमारे बनने की समग्र ऋत-व्यवस्था के रूप में एकत्र हों।
Mantra 2
द्यौश्च नः पृथिवी च प्रचेतस ऋतावरी रक्षतामंहसो रिषः । मा दुर्विदत्रा निॠतिर्न ईशत तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे ॥
द्यौः और पृथिवी—प्रचेतस्, ऋत की रक्षिका—हमारी रक्षा करें, हमें अंहस (संकट) और रिषः (हानि) से बचाएँ। दुर्-विधान करने वाली निरृति हम पर अधिकार न करे। देवों का वही अवः (संरक्षण) हम आज वरण करते हैं।
Mantra 3
विश्वस्मान्नो अदितिः पात्वंहसो माता मित्रस्य वरुणस्य रेवतः । स्वर्वज्ज्योतिरवृकं नशीमहि तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे ॥
अदिति—मित्र की माता और रेवत् वरुण की जननी—हमारी सर्व प्रकार के अंहस (संकट) से रक्षा करे। हम स्वर्वत् ज्योति—अवृक (अ-भक्षक), अ-ग्रासी प्रकाश—को प्राप्त करें। देवों का वही अवः (संरक्षण) हम आज वरण करते हैं।
Mantra 4
ग्रावा वदन्नप रक्षांसि सेधतु दुष्ष्वप्न्यं निॠतिं विश्वमत्रिणम् । आदित्यं शर्म मरुतामशीमहि तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे ॥
ध्वनित होता ग्रावा (सोम-पीषण-शिला) रक्षांसि को दूर हटाए; दुṣṣ्वप्न्य (दुष्ट स्वप्न), निरृति और समस्त अत्रिण (भक्षक) को रोके। हम आदित्यों का शर्म (शांति) और मरुतों का आश्रय-आनन्द प्राप्त करें। देवों का वही अवः (संरक्षण) हम आज वरण करते हैं।
Mantra 5
एन्द्रो बर्हिः सीदतु पिन्वतामिळा बृहस्पतिः सामभिॠक्वो अर्चतु । सुप्रकेतं जीवसे मन्म धीमहि तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे ॥
इन्द्र पवित्र बर्हि (यज्ञासन) पर विराजें; इळा परिपूर्ण हो। वाणी के ऋषि बृहस्पति साम-गानों सहित स्तुति करें। जीवन-रक्षा हेतु हम सुस्पष्ट-प्रेरक प्रज्ञा में अपना मन धारण करते हैं। देवों का वही अवः (रक्षण) हम आज वरण करते हैं।
Mantra 6
दिविस्पृशं यज्ञमस्माकमश्विना जीराध्वरं कृणुतं सुम्नमिष्टये । प्राचीनरश्मिमाहुतं घृतेन तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे ॥
हे अश्विनौ, हमारा यज्ञ दिवि-स्पृश (स्वर्ग-स्पर्शी) बनाओ; अध्वर को शीघ्रगामी करो—इष्टि के लिए कल्याण-प्रसाद बनाओ। घृत से आहुति अर्पित है, जो प्राचीन-रश्मि (अग्रगामी किरणों) को धारण करती है; देवों का वही अवः (रक्षण) हम आज वरण करते हैं।
Mantra 7
उप ह्वये सुहवं मारुतं गणं पावकमृष्वं सख्याय शम्भुवम् । रायस्पोषं सौश्रवसाय धीमहि तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे ॥
मैं सुहव (सहज आह्वेय) मरुत-गण को पुकारता हूँ—पावक, ऊर्ध्व, सख्य के लिए और शम्भु (कल्याणकारी) के लिए। रयस्-पोष (रायस की वृद्धि—अन्तर-समृद्धि) पर हम अपना मन धारण करते हैं, सौश्रवस (विस्तृत, स्थिर सुयश) के लिए। देवों का वही अवः (रक्षण) हम आज वरण करते हैं।
Mantra 8
अपां पेरुं जीवधन्यं भरामहे देवाव्यं सुहवमध्वरश्रियम् । सुरश्मिं सोममिन्द्रियं यमीमहि तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे ॥
हम अपां के उस ‘पार’ को आगे लाते हैं—जीवन-पोषक, देव-गति के योग्य—सहज आह्वेय, यज्ञ-श्री से युक्त। हम उस सुरश्मि सोम को, इन्द्रिय बल को, अपने साथ योजित करना चाहते हैं; देवों की वही रक्षात्मक सहायता हम आज चुनते हैं।
Mantra 9
सनेम तत्सुसनिता सनित्वभिर्वयं जीवा जीवपुत्रा अनागसः । ब्रह्मद्विषो विष्वगेनो भरेरत तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे ॥
सत्-लाभ की उन शक्तियों से हम वही सुलभ-सिद्धि प्राप्त करें—हम स्वयं जीवित रहें, जीवित पुत्रों से युक्त हों, निरपराध हों। ब्रह्म-द्वेषी, वक्र-गामी, अपना पाप दूर ले जाएँ; देवों की वही रक्षात्मक सहायता हम आज चुनते हैं।
Mantra 10
ये स्था मनोर्यज्ञियास्ते शृणोतन यद्वो देवा ईमहे तद्ददातन । जैत्रं क्रतुं रयिमद्वीरवद्यशस्तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे ॥
हे देवो, जो शक्तिरूप तुम मन में यज्ञ-योग्य होकर स्थित हैं—हमारी सुनो। जो हम तुमसे याचते हैं, वह प्रदान करो: जयकारी क्रतु, रयि की पूर्णता, वीर-बल और प्रकाशमान यश। देवों की वही रक्षात्मक सहायता हम आज चुनते हैं।
Mantra 11
महदद्य महतामा वृणीमहेऽवो देवानां बृहतामनर्वणाम् । यथा वसु वीरजातं नशामहै तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे ॥
आज हम महानों में महान, विशाल और अच्युत-गति देवों की महान रक्षा-शक्ति (अवः) का वरण करते हैं, ताकि हम सत्य कल्याण—वीर्य-सम्पन्न, शक्तियों के वीर-जन्म से समृद्ध—को प्राप्त करें। वही देवों की रक्षक सहायता हम आज चुनते हैं।
Mantra 12
महो अग्नेः समिधानस्य शर्मण्यनागा मित्रे वरुणे स्वस्तये । श्रेष्ठे स्याम सवितुः सवीमनि तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे ॥
अन्तः प्रज्वलित अग्नि के महान आश्रय में हम निरपराध रहें; मित्र-वरुण में हमारे स्वस्ति के लिए। सविता की सत्य प्रेरणा में हम श्रेष्ठ अवस्था को प्राप्त हों। वही देवों की रक्षक सहायता हम आज चुनते हैं।
Mantra 13
ये सवितुः सत्यसवस्य विश्वे मित्रस्य व्रते वरुणस्य देवाः । ते सौभगं वीरवद्गोमदप्नो दधातन द्रविणं चित्रमस्मे ॥
हे देवो! तुम सब, जो सत्य-सव (सत्य प्रेरणा) वाले सविता के हो, मित्र के व्रत में, वरुण के नियम में—हममें सौभाग्य स्थापित करो: वीर्य-सम्पन्न, गोमद् (प्रकाश-किरणों से समृद्ध), और अप्नस् (सिद्धि/प्राप्ति) से युक्त। हमारे लिए विचित्र-वर्ण (बहुरंगी) धन-निधि भी धारण करो।
Mantra 14
सविता पश्चातात्सविता पुरस्तात्सवितोत्तरात्तात्सविताधरात्तात् । सविता नः सुवतु सर्वतातिं सविता नो रासतां दीर्घमायुः ॥
सविता पीछे से, सविता आगे से; सविता उत्तर दिशा से, सविता अधो दिशा से। सविता हमारे लिए सर्वतः-समृद्धि को प्रेरित करे; सविता हमें दीर्घ आयु प्रदान करे।
Viśvedevāḥ means “All the Gods.” In this hymn it refers to a gathered assembly of many divine powers—such as Dawn and Night, Heaven and Earth, Varuṇa, Mitra, Aryaman, Indra, the Maruts, the Waters—invoked together for complete protection and support.
The hymn aims at total well-being and ritual success, so it calls the whole cosmic order: different deities represent different functions (law, vitality, rain, light, stability). By invoking them together, the worshipper asks for a unified, all-sided help (avaḥ).
The last verse asks Savitar to protect and guide from every direction—behind, in front, above/north, and below—so that nothing is left uncovered. It ends with two practical blessings: sarvatāti (complete well-being) and dīrgham āyuḥ (long life).
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