Rig Veda Sukta 35
Mandala 10Sukta 3514 Mantras

Sukta 35

Sukta 10.35

Rishi

Unknown/varied attributions in tradition for RV 10.35; commonly associated with dawn/fire imagery (check specific Anukramaṇī for exact seer)

Devata

Agni (plural Agnayaḥ) with Indra-force; Ushas; Dyāvāpṛthivī; Apas (a composite invocation)

Chandas

Triṣṭubh (likely; hymn opening in a common triṣṭubh cadence)

यह सूक्त उषाकाल में जाग्रत होने वाली पवित्र अग्नियों—अग्नि के बहुरूपों—का अभिवादन करता है, जो इन्द्र-सदृश शक्ति से युक्त होकर प्रकाश, ऋत (व्यवस्था) और दिन में सुरक्षित गमन प्रदान करती हैं। आगे यह आह्वान को विश्व-आधारों (उषस्, द्यावापृथिवी, आपः) तक विस्तृत करता है और प्रार्थना करता है कि ‘ऋत का दिव्य वचन’ उपासक को परिपूर्ण करे तथा देवों की रक्षात्मक छत्रछाया में निर्भयता और समृद्धि उदित हों।

Mantras

Mantra 1

अबुध्रमु त्य इन्द्रवन्तो अग्नयो ज्योतिर्भरन्त उषसो व्युष्टिषु । मही द्यावापृथिवी चेततामपोऽद्या देवानामव आ वृणीमहे ॥

वे जाग उठे हैं—इन्द्र-बल से सम्पन्न वे अग्नि—उषा के प्रस्फुटनों में प्रकाश धारण करते हुए। महती द्यावा-पृथिवी चेतें; और आपः भी। आज हम देवों के अव का वरण करते हैं, ताकि अन्तर-दिवस उदित हो।

Mantra 2

दिवस्पृथिव्योरव आ वृणीमहे मातॄन्त्सिन्धून्पर्वताञ्छर्यणावतः । अनागास्त्वं सूर्यमुषासमीमहे भद्रं सोमः सुवानो अद्या कृणोतु नः ॥

द्यावा-पृथिवी से हम अपने लिए रक्षक अव का वरण करते हैं; और धारण करने वाली माताओं को भी पुकारते हैं—सिन्धुओं को, तथा गति-बल से सम्पन्न पर्वतों को। हे अनागस्, हम सूर्य और उषस् का आह्वान करते हैं; आज सुवान सोम हमारे लिए भद्र (कल्याण) रचे।

Mantra 3

द्यावा नो अद्य पृथिवी अनागसो मही त्रायेतां सुविताय मातरा । उषा उच्छन्त्यप बाधतामघं स्वस्त्यग्निं समिधानमीमहे ॥

आज द्यावा और पृथिवी—अनागस्, महती माताएँ—सुविताय, सद्गति के लिए, हमारी रक्षा करें। उदय होती उषा अघ को दूर हटाए; स्वस्ति के लिए हम समिध्यमान अग्नि का आह्वान करते हैं।

Mantra 4

इयं न उस्रा प्रथमा सुदेव्यं रेवत्सनिभ्यो रेवती व्युच्छतु । आरे मन्युं दुर्विदत्रस्य धीमहि स्वस्त्यग्निं समिधानमीमहे ॥

यह प्रथम दीप्तिमती उषा हमारे लिए सुदेव्य—शुभ दैवी क्रिया—के साथ उदित हो; जो विजय-प्राप्त करने वालों के लिए समृद्धि-सम्पन्न (रेवती) हो। दुरविदत्र—दोष-खोजी शक्ति—के क्रोध को हम दूर कर दें। स्वस्ति के लिए हम भीतर प्रज्वलित होते अग्नि को खोजते-पूजते हैं।

Mantra 5

प्र याः सिस्रते सूर्यस्य रश्मिभिर्ज्योतिर्भरन्तीरुषसो व्युष्टिषु । भद्रा नो अद्य श्रवसे व्युच्छत स्वस्त्यग्निं समिधानमीमहे ॥

जो उषाएँ अपने उदयों में सूर्य की किरणों के साथ आगे बढ़ती हैं, प्रकाश को धारण करती हैं—वे आज हमारे लिए श्रवस्—श्रवण-योग्य कीर्ति और अंतःप्रसिद्धि—के लिए भद्रा होकर उदित हों। स्वस्ति के लिए हम भीतर प्रज्वलित होते अग्नि को खोजते-पूजते हैं।

Mantra 6

अनमीवा उषस आ चरन्तु न उदग्नयो जिहतां ज्योतिषा बृहत् । आयुक्षातामश्विना तूतुजिं रथं स्वस्त्यग्निं समिधानमीमहे ॥

अनीवा—रोगरहित—उषाएँ हमारे पास आएँ; अग्नयः—अग्नियाँ—महान् ज्योति से उछल उठें। अश्विनौ अपने तूतुजि—वेग-प्रेरक—रथ को युक्त करें। स्वस्ति के लिए हम भीतर प्रज्वलित होते अग्नि को खोजते-पूजते हैं।

Mantra 7

श्रेष्ठं नो अद्य सवितर्वरेण्यं भागमा सुव स हि रत्नधा असि । रायो जनित्रीं धिषणामुप ब्रुवे स्वस्त्यग्निं समिधानमीमहे ॥

हे सवितर! आज हमारे लिए श्रेष्ठ, वरणीय भाग को प्रकट कर; क्योंकि तू ही रत्नधारक है। मैं रयि-जननी धिषणा को समीप बुलाता/बुलाती हूँ। स्वस्ति के लिए हम भीतर प्रज्वलित होते अग्नि का आह्वान करते हैं।

Mantra 8

पिपर्तु मा तदृतस्य प्रवाचनं देवानां यन्मनुष्या अमन्महि । विश्वा इदुस्राः स्पळुदेति सूर्यः स्वस्त्यग्निं समिधानमीमहे ॥

ऋत का वह प्रवचन मुझे परिपूर्ण करे—देवों का वह वचन, जिसे हम मनुष्य समझ पाए हैं। सूर्य के प्रस्थान करते ही समस्त उज्ज्वल ज्योतियाँ स्पष्ट रूप से उदित होती हैं। स्वस्ति के लिए हम भीतर प्रज्वलित होते अग्नि का आह्वान करते हैं।

Mantra 9

अद्वेषो अद्य बर्हिषः स्तरीमणि ग्राव्णां योगे मन्मनः साध ईमहे । आदित्यानां शर्मणि स्था भुरण्यसि स्वस्त्यग्निं समिधानमीमहे ॥

आज अद्वेष से, सुविस्तृत बर्हिष् के आसन पर, ग्राव्णों के संयोग में, स्थिर मन से हम यज्ञकर्म की सिद्धि चाहते हैं। आदित्यों के शरण में तू स्थित रह और आगे बढ़। स्वस्ति के लिए हम भीतर प्रज्वलित होते अग्नि का आह्वान करते हैं।

Mantra 10

आ नो बर्हिः सधमादे बृहद्दिवि देवाँ ईळे सादया सप्त होतॄन् । इन्द्रं मित्रं वरुणं सातये भगं स्वस्त्यग्निं समिधानमीमहे ॥

हमारे पास यह विस्तृत बर्हिस् (यज्ञ-आसन) सामूहिक आनन्द के सदमाद में आए। विशाल दिवि में मैं देवों की स्तुति करता हूँ—सप्त होतृों को आसन दो। सिद्धि-जय के लिए इन्द्र, मित्र, वरुण और भग को (यहाँ) लाओ। स्वस्ति के लिए हम भीतर प्रज्वलित होते अग्नि को साधते हैं।

Mantra 11

त आदित्या आ गता सर्वतातये वृधे नो यज्ञमवता सजोषसः । बृहस्पतिं पूषणमश्विना भगं स्वस्त्यग्निं समिधानमीमहे ॥

हे आदित्यगण, हमारी सर्वताति—सम्पूर्ण कुशलता के लिए आओ; हमारी वृद्धि के लिए एकमन होकर यज्ञ की रक्षा करो। (साथ ही) बृहस्पति, पूषण, अश्विनौ और भग (को भी) लाओ। स्वस्ति के लिए हम भीतर प्रज्वलित होते अग्नि को साधते हैं।

Mantra 12

तन्नो देवा यच्छत सुप्रवाचनं छर्दिरादित्याः सुभरं नृपाय्यम् । पश्वे तोकाय तनयाय जीवसे स्वस्त्यग्निं समिधानमीमहे ॥

हे देवो, हमें वह सुप्रवाचन—सुन्दर वाणी प्रदान करो; आदित्यों का वह छर्दि—आश्रय, जो सु-भर (सहज धारणीय) और नृपाय्य (अन्तः-राज्य की रक्षा के योग्य) हो। पशु-सम्पदा के लिए, तोक के लिए, तनय के लिए, और जीवित रहने की शक्ति के लिए—स्वस्ति हेतु हम भीतर प्रज्वलित होते अग्नि को साधते हैं।

Mantra 13

विश्वे अद्य मरुतो विश्व ऊती विश्वे भवन्त्वग्नयः समिद्धाः । विश्वे नो देवा अवसा गमन्तु विश्वमस्तु द्रविणं वाजो अस्मे ॥

आज सब मरुत् हमारे लिए सर्वव्यापी सहायता बनें; सब अग्नियाँ सम्यक् प्रज्वलित हों। सब देव हमारे पास अपने अवस (रक्षा-कृपा) के साथ आएँ; और हमारे भीतर समग्र द्रविण (सम्पदा) तथा वाज (बल-पराक्रम) हो।

Mantra 14

यं देवासोऽवथ वाजसातौ यं त्रायध्वे यं पिपृथात्यंहः । यो वो गोपीथे न भयस्य वेद ते स्याम देववीतये तुरासः ॥

हे देवो, वाजसाति (विजय-समृद्धि) में जिसे तुम सहारा देते हो, जिसे तुम बचाते हो, जिसे तुम अंहस् (कष्ट-दुःख) के पार ले जाते हो—जो तुम्हारे गोपीथ (संरक्षण) में भय को नहीं जानता—हे त्वरित शक्तियो, हम भी वैसे ही हों, देववीति (देवों के आगमन/आनन्द) के योग्य।

Frequently Asked Questions

The plural can point to multiple ritual fires and also to Agni’s many forms—household flame, sacrificial fire, and the inner fire of inspiration—awakening together at dawn to bring light and order.

It means the utterance or expression born of Ṛta (cosmic truth/order). The hymn asks that this truthful, divinely grounded speech fill the worshiper so thought, word, and action align with the right course of the day.

It fits a dawn practice: light a lamp or fire, offer a small ghee oblation (or a symbolic offering), recite the verses as a prayer for clarity, truthful speech, purification, and protection, and begin the day with a commitment to Ṛta-like integrity.

Read Rig Veda in the Vedapath app

Scan the QR code to open this directly in the app, with audio, word-by-word meanings, and more.

Continue reading in the Vedapath app

Open in App