
Sukta 10.20
Vāta / the inspiriting Breath (as carrier of bhadra)
यह सूक्त वाता—प्रेरक प्राण/वायु—से प्रार्थना के साथ आरम्भ होता है कि वह उपासकों में ‘भद्र’ अर्थात् शुभ प्रेरणा का संचार करे, जो मन को उचित रीति से प्रवृत्त करे। तत्पश्चात् यह अग्नि की ओर मुड़ता है, जो यज्ञ का सुरक्षित पथ और शान्ति है; और अंत में कवि प्रेरित वाणी का अर्पण करता है, जो पोषण, बल तथा अस्तित्व में स्थिर निवास की कामना करती है।
Mantra 1
भद्रं नो अपि वातय मनः ॥
हम पर—हमारे भीतर तक—भद्रता का श्वास प्रवाहित हो; कल्याणकारी वायु की सद्प्रेरणा से हमारा मन प्रेरित हो।
Mantra 2
अग्निमीळे भुजां यविष्ठं शासा मित्रं दुर्धरीतुम् । यस्य धर्मन्त्स्वरेनीः सपर्यन्ति मातुरूधः ॥
मैं अग्नि की स्तुति करता हूँ—भोगों का वह वहनकर्ता, सबसे युवा; शासनकर्ता, मित्र, जिसे सहना कठिन है। जिसके दृढ़ धर्मों की सेवा स्वरेणी (दीप्त शक्तियाँ) करती हैं, जैसे वे माता के ऊध का सेवन करती हैं—पोषक परिपूर्णता को खींचकर हमारे वर्धन हेतु।
Mantra 3
यमासा कृपनीळं भासाकेतुं वर्धयन्ति । भ्राजते श्रेणिदन् ॥
जिसे यज्ञमुख (आहुति के मुख) बढ़ाते हैं—अग्नि, जो सूक्ष्म में नीड करता है, जिसका केतु प्रकाश है; वह दीप्त होता है, हमारी शक्तियों को श्रेणिबद्ध (सुसंयोजित) करता हुआ।
Mantra 4
अर्यो विशां गातुरेति प्र यदानड्दिवो अन्तान् । कविरभ्रं दीद्यानः ॥
वह आर्य—जनसमुदायों के पथों का पथ-प्रदर्शक—आगे बढ़ता है; जब वह द्युलोक के अन्तों तक फैलता/पहुंचता है, तब कवि (ऋषि) भीतर से दीप्त मेघ-सा दमक उठता है।
Mantra 5
जुषद्धव्या मानुषस्योर्ध्वस्तस्थावृभ्वा यज्ञे । मिन्वन्त्सद्म पुर एति ॥
मानव के हव्यों में तृप्त होकर वह यज्ञ में ऋभु-बल से ऊर्ध्व खड़ा हुआ है; सद्म (गृह/आश्रय) को बढ़ाता हुआ वह पुरः—अग्रभाग में—चलता है।
Mantra 6
स हि क्षेमो हविर्यज्ञः श्रुष्टीदस्य गातुरेति । अग्निं देवा वाशीमन्तम् ॥
वही क्षेम है, वही हविर्यज्ञ है; उसकी श्रुति-सेवा (श्रुष्टि) से पथ प्राप्त होता है। देवगण वाशीमान्—विजयी नाद धारण करने वाले—अग्नि की ओर गमन करते हैं।
Mantra 7
यज्ञासाहं दुव इषेऽग्निं पूर्वस्य शेवस्य । अद्रेः सूनुमायुमाहुः ॥
मैं यज्ञ में जय पाने वाले, प्राचीन कल्याणमय अग्नि की सेवा (दुवः) चाहता हूँ। उसे दृढ़ शिला (अद्रि) का पुत्र—आयु (जीवन-शक्ति) स्वयं—कहते हैं।
Mantra 8
नरो ये के चास्मदा विश्वेत्ते वाम आ स्युः । अग्निं हविषा वर्धन्तः ॥
हमारे पास जो भी नर आते हैं—वे सब तुम्हारी मैत्री और सौहार्द में प्रवेश करें; हवि से अग्नि को बढ़ाते हुए। इस प्रकार समष्टि-जीवन अग्नि में एकत्र होता है।
Mantra 9
कृष्णः श्वेतोऽरुषो यामो अस्य ब्रध्न ऋज्र उत शोणो यशस्वान् । हिरण्यरूपं जनिता जजान ॥
कृष्ण, श्वेत और अरुण—ये उसकी गतियाँ हैं; भूरा, सीधा, और लाल भी—यशस्वी। हिरण्य-रूप शक्ति को जनिता ने जन्म दिया—अग्नि का बहुरंगी तेज प्रकट हुआ।
Mantra 10
एवा ते अग्ने विमदो मनीषामूर्जो नपादमृतेभिः सजोषाः । गिर आ वक्षत्सुमतीरियान इषमूर्जं सुक्षितिं विश्वमाभाः ॥
हे अग्नि! इस प्रकार विमद ने—हे ऊर्जाओं के पुत्र—अमृतों के साथ एक ही सामंजस्य में तुम्हारे लिए यह मनीषा (प्रेरित बुद्धि) अर्पित की। आगे बढ़ते हुए उसने सुमति को वहन करने वाली वाणी को तुम्हारे पास पहुँचाया; उसने हमारे लिए समग्र—इष (प्रेरणा), ऊर्ज (पोषक बल) और विश्व-व्यापी सु-क्षिति (सुरक्षित निवास)—को प्रकाशित किया।
It asks Vāta (the inspiriting Wind/Breath) to bring bhadra—auspicious, right inspiration—into us so the mind moves in a wholesome direction, and it seeks Agni’s guidance for peace and a clear path.
Vāta represents the incoming current of inspiration and vitality, while Agni represents the ordered sacrificial fire that makes that inspiration effective—turning it into a stable path, protection (kṣema), and blessings.
It asks for iṣa (impulse/provision), ūrj (sustaining strength), and sukṣiti (secure dwelling or well-being), understood as both outer prosperity and inner steadiness.
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