Rig Veda Sukta 155
Mandala 10Sukta 1555 Mantras

Sukta 155

Sukta 10.155

Devata

Apotropaic expulsion (addressed to Arāyi/privation); auxiliary power Śirimbiṭha invoked

यह संक्षिप्त अपोत्प्राय (अपशकुन-निवारक) सूक्त अरायि—अभाव, शत्रुतापूर्ण दरिद्रता और दुर्भाग्य—का प्रबल निष्कासन है। उसे आज्ञा दी जाती है कि वह दूर, निर्जन स्थानों (पर्वत, नदी के परले तट) की ओर चली जाए। पीड़ा को हाँककर दूर करने और प्रहार करने वाली सहायक शक्ति ‘शिरिम्बिठ’ का आह्वान किया गया है। अंत में अग्नि और ‘गौ/प्रकाश’ के चारों ओर रक्षात्मक परिधि का दृढ़ प्रतिज्ञान है—कि यह सुरक्षित घेरा अजेय है।

Mantras

Mantra 1

अरायि काणे विकटे गिरिं गच्छ सदान्वे । शिरिम्बिठस्य सत्वभिस्तेभिष्ट्वा चातयामसि ॥

हे अरायि (शत्रु-रूप अभाव), हे काणे, हे विकटे, हे सदा अनुगामी—तू पर्वत की ओर चला जा। शिरिम्बिठ के प्रेरक बलों से, उन्हीं के द्वारा, हम तुझे यहाँ से दूर हटा देते हैं।

Mantra 2

चत्तो इतश्चत्तामुतः सर्वा भ्रूणान्यारुषी । अराय्यं ब्रह्मणस्पते तीक्ष्णशृण्गोदृषन्निहि ॥

‘यहाँ से हटा, वहाँ से भी हटा’—ऐसे ही सब लाल-लाल भ्रूण-चिन्ताएँ (आकुलताएँ) बिखर जाएँ। हे ब्रह्मणस्पति, तीक्ष्ण-शृंग और तीक्ष्ण-दृष्टि होकर, इस अराय्य (अभाव) को नीचे बैठा कर प्रहार कर।

Mantra 3

अदो यद्दारु प्लवते सिन्धोः पारे अपूरुषम् । तदा रभस्व दुर्हणो तेन गच्छ परस्तरम् ॥

जो लकड़ी का लट्ठा वहाँ नदी के परे तट पर तैर रहा है—मनुष्य से अछूता—उसे पकड़ ले, हे दुर्हण (दुर्जेय) जन; और उसी के सहारे परे, उस पार, चला जा।

Mantra 4

यद्ध प्राचीरजगन्तोरो मण्डूरधाणिकीः । हता इन्द्रस्य शत्रवः सर्वे बुद्बुदयाशवः ॥

जब वे अग्रगामी शक्तियाँ भीतर के क्षेत्र—हृदय-प्रदेश—में धँसती हुई आ पहुँचीं, तब इन्द्र के सब शत्रु आहत होकर गिर पड़े—झाग-से बुलबुलों के समान, केवल अपनी फेन-गति में शीघ्र।

Mantra 5

परीमे गामनेषत पर्यग्निमहृषत । देवेष्वक्रत श्रवः क इमाँ आ दधर्षति ॥

इन्होंने प्रकाश-गौ (अन्तर्यामी गो) को चारों ओर से घेरकर आगे बढ़ाया; इन्होंने अग्नि को भी परितः घेरकर आनन्दित किया। देवों के बीच इन्होंने आत्मा का श्रवः—श्रवणीय यश—रचा; अब इन्हें कौन धृष्टता से आक्रान्त कर सकता है?

Frequently Asked Questions

Arāyi is not a beneficent deity here but the personified force of privation—poverty, lack, and hostile misfortune—addressed directly and commanded to leave.

Mountains and the far shore are symbolic “outside” zones. Sending Arāyi there means pushing misfortune beyond the community’s boundary, out of reach and influence.

Śirimbiṭha is invoked as an auxiliary power whose ‘satva’ (driving forces) can smite and propel the affliction away, strengthening the expulsion and making it effective.

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