
Sukta 10.147
Indra (implied by adri-vaḥ) / Manyu as Indra’s wrath-power
यह संक्षिप्त सूक्त इन्द्र की स्तुति उसके ‘मन्यु’ के माध्यम से करता है—उसकी प्रथमजन्मा क्रोध-शक्ति, जिसने वृत्र का संहार किया और रोके गए जलों को मुक्त किया, जिससे द्यावा-पृथिवी तक काँप उठे। फिर यह सामाजिक और यज्ञीय क्षेत्र की ओर मुड़कर इन्द्र से प्रार्थना करता है कि वह उदार दाताओं की सुनें और कृपालु पिता की भाँति उपासकों का स्थान, धन, रक्षा तथा न्यायपूर्ण बाँट को बढ़ाएँ।
Mantra 1
श्रत्ते दधामि प्रथमाय मन्यवेऽहन्यद्वृत्रं नर्यं विवेरपः । उभे यत्त्वा भवतो रोदसी अनु रेजते शुष्मात्पृथिवी चिदद्रिवः ॥
मैं तुम्हारी प्रथमज मन्यु-शक्ति में श्रद्धा रखता हूँ: जब तुमने नर-प्रतिद्वन्द्वी आवरणकर्ता वृत्र को मारा, तब तुमने जलों को खोल दिया। जब तुम क्रियाशील होते हो, तब दोनों रोदसी—द्यौ और पृथिवी—तुम्हारे पीछे काँप उठती हैं; हे अद्रिवन् (शिला-धारी), तुम्हारे शुष्म से पृथिवी तक थरथरा उठती है।
Mantra 2
त्वं मायाभिरनवद्य मायिनं श्रवस्यता मनसा वृत्रमर्दयः । त्वामिन्नरो वृणते गविष्टिषु त्वां विश्वासु हव्यास्विष्टिषु ॥
हे अनवद्य! तू अपनी मायाओं (शक्तियों) से, यश-लोलुप मन से, माया-धारी कपटी वृत्र का मर्दन करता है। प्रकाश के लिए होने वाले संग्रामों (गविष्टि) में नर तुझे ही चुनते हैं; और समस्त हव्यों तथा इष्टियों (यज्ञकर्मों) में भी तुझे ही वरण करते हैं।
Mantra 3
ऐषु चाकन्धि पुरुहूत सूरिषु वृधासो ये मघवन्नानशुर्मघम् । अर्चन्ति तोके तनये परिष्टिषु मेधसाता वाजिनमह्रये धने ॥
हे पुरुहूत मघवन्! इन उदार दाताओं (सूरि) के बीच सावधान रह; वे जो, हे मघवन्, तेरी दान-विशालता (मघ) तक पहुँच चुके हैं। वे संतान और वंश में, चारों ओर की रक्षाओं में, तेरा स्तवन करते हैं; मेधा से विजयी होकर वे वाजिन् की पूर्णता और अहर्य—अग्राह्य धन का आह्वान करते हैं।
Mantra 4
स इन्नु रायः सुभृतस्य चाकनन्मदं यो अस्य रंह्यं चिकेतति । त्वावृधो मघवन्दाश्वध्वरो मक्षू स वाजं भरते धना नृभिः ॥
वही अब सुभृत रायः—सुसंवर्धित समृद्धि—के मद में रमण करता है, जो उसकी वेगवती शक्ति को पहचानता है। हे मघवन्! तुझे बढ़ाने वाला, दाश्व—यज्ञकर्ता, जिसका अध्वर (यज्ञ) तुझे पुष्ट करता है, शीघ्र ही नृभिः—वीर शक्तियों के सहारे—वाज (बल-पूर्णता) और धन-सम्पदा ले आता है।
Mantra 5
त्वं शर्धाय महिना गृणान उरु कृधि मघवञ्छग्धि रायः । त्वं नो मित्रो वरुणो न मायी पित्वो न दस्म दयसे विभक्ता ॥
हे मघवन्! अपनी महिमा से स्तुत, हमारे समुदाय के लिए तू विस्तार कर और धन-समृद्धि की पूर्णता प्रदान कर। तू हमारे लिए मित्र और वरुण के समान—व्यवस्था-शक्ति में प्रज्ञावान, छलरहित—हो जाता है; हे अद्भुत! उदार पिता की भाँति तू करुणा से भागों का विभाजन करता है।
Indra is the main deity, but the hymn highlights Manyu as Indra’s primal wrath-power—the force by which he defeats Vṛtra and releases the waters.
On the cosmic level it recalls Indra breaking Vṛtra’s obstruction so waters can flow; inwardly it points to breaking inner blocks so energy, clarity, and inspiration can move freely.
It asks Indra to act with orderly wisdom and fairness—“not a deceiver”—so prosperity is protected and distributed rightly, like a benevolent guardian and father.
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