
Sukta 10.140
Agni
Trishtubh (probable)
यह छह-ऋचा सूक्त अग्नि की स्तुति करता है—उन्हें व्यापक-दीप्त, सर्व-प्रकाशक शक्ति के रूप में, जिनकी किरणें और बल उपासक में विजयकारी समृद्धि (वाज) की स्थापना करते हैं। इसमें प्रार्थना है कि अग्नि जनसमुदाय में विस्तार करें, यजमान को धन और प्रभावी संकल्प-शक्ति (क्रतु) से समृद्ध करें, और यह प्रतिपादित करता है कि प्रत्येक युग में मनुष्य आशीर्वाद हेतु अग्नि को अग्रस्थ रखते हैं, उन्हें दिव्य, ऋत-धारी नेता के रूप में गाते हैं।
Mantra 1
अग्ने तव श्रवो वयो महि भ्राजन्ते अर्चयो विभावसो । बृहद्भानो शवसा वाजमुक्थ्यं दधासि दाशुषे कवे ॥
हे अग्नि! तेरा यश और तेरा वयः (पोषक बल) महान है; हे विभावसु, तेरी ज्वलित अर्चियाँ (किरणें) चमकती हैं। हे बृहद्भानु! तू अपने शौर्य-बल से दाशुष (यजमान/दाता) को उक्थ्य वाज—स्तुति-योग्य विजय-समृद्धि—प्रदान करता है, हे कवे (द्रष्टा)।
Mantra 2
पावकवर्चाः शुक्रवर्चा अनूनवर्चा उदियर्षि भानुना । पुत्रो मातरा विचरन्नुपावसि पृणक्षि रोदसी उभे ॥
पावक-वर्चस्, शुक्र-वर्चस्, अनून-वर्चस्—अविनाशी तेज से युक्त—तू अपनी भानु (किरण) से ऊपर उठता है। दो माताओं (द्यावा-पृथिवी) के बीच विचरने वाले पुत्र की भाँति तू सहायता हेतु समीप आता है; तू दोनों लोकों—रोदसी उभे, स्वर्ग और पृथ्वी—को पूर्ण करता है।
Mantra 3
ऊर्जो नपाज्जातवेदः सुशस्तिभिर्मन्दस्व धीतिभिर्हितः । त्वे इषः सं दधुर्भूरिवर्पसश्चित्रोतयो वामजाताः ॥
हे ऊर्जो नपात्, हे जातवेदस्! सुशस्ति (श्रेष्ठ स्तुतियों) से, और धीतियों (विचार-प्रेरित प्रार्थनाओं) से—जिनसे तू प्रतिष्ठित है—आनन्दित हो। तुझमें इषः (प्रेरणाएँ/आकांक्षाएँ) सम्यक् संचित होती हैं—बहुरूप, बहु-दीप्त, विचित्र-उपकारिणी—वाम (आनन्द/कल्याण) से उत्पन्न।
Mantra 4
इरज्यन्नग्ने प्रथयस्व जन्तुभिरस्मे रायो अमर्त्य । स दर्शतस्य वपुषो वि राजसि पृणक्षि सानसिं क्रतुम् ॥
हे अग्नि, अभिलाषा से दीप्त होकर, हे अमर्त्य, हमारे भीतर जनों/प्रजाओं के साथ अपने को विस्तृत कर, ताकि हमारे लिए रयि (समृद्धि) की पूर्णताएँ हों। तू अपने रूप की दर्शनीय शोभा से प्रकाशित होता है; तू सानसि (विजयदायी) क्रतु (संकल्प-शक्ति/कर्म-प्रज्ञा) को परिपूर्ण करता है।
Mantra 5
इष्कर्तारमध्वरस्य प्रचेतसं क्षयन्तं राधसो महः । रातिं वामस्य सुभगां महीमिषं दधासि सानसिं रयिम् ॥
तू अध्वर (यज्ञ) का इष्कर्ता—रचयिता—है; प्रचेतस् (दूरदर्शी) है; महत् राधस् (महान् दान/समृद्धि) में निवास करने वाला है। तू वाम (कल्याण/प्रिय) की सुभागा और महती राति (दान/अनुग्रह) को स्थापित करता है; तू महती इष (प्रेरक शक्ति/पोषक प्रेरणा) और सानसि रयि (विजयदायी समृद्धि) को धारण कराता है।
Mantra 6
ऋतावानं महिषं विश्वदर्शतमग्निं सुम्नाय दधिरे पुरो जनाः । श्रुत्कर्णं सप्रथस्तमं त्वा गिरा दैव्यं मानुषा युगा ॥
ऋतावान्, महिष, विश्वदर्शत—ऐसे अग्नि को जनों ने सुम्न (कल्याण-आनन्द) के लिए अग्रभाग में स्थापित किया है। हे श्रुत्कर्ण, हे सप्रथस्तम, मनुष्यों के युगों ने वाणी (गिरा) से तुझे—दैव्य—गाया है, तू जो व्यापक है और जाग्रत् कर्ण से सुनता है।
It praises Agni as the radiant divine fire who brings prosperity and victorious energy (vāja) and strengthens the worshipper’s effective will (kratu), while upholding Ṛta (cosmic order).
Because Agni is placed at the beginning of worship as the leading power of the rite—he receives offerings first and carries them to the gods, so he is established ‘puro’ (in front).
Vāja is victorious strength and plenitude that helps one succeed; kratu is the capable will or effective intelligence that makes the sacrifice and one’s work fruitful.
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