
Sukta 10.122
Vasiṣṭha (as indicated by later verse 10.122.8 mentioning Vasiṣṭhas; traditional attribution of the hymn to Vasiṣṭha-lineage)
Agni
Jagatī (likely; 10.122 commonly in Jagatī—needs manuscript confirmation)
यह सूक्त अग्नि की स्तुति करता है—गृह का शुभ, अहिंसक “अतिथि” और अनिवार्य होतृ, जो मनुष्यों और देवताओं के बीच हवि तथा आशीषों का वहन करता है। इसमें प्रार्थना है कि अग्नि धन और प्राणशक्ति की प्रचुर “धाराएँ” मुक्त करे, यजमान के घर में प्रज्वलित होकर शुद्ध हो, और यजमानों के लिए स्थायी कल्याण तथा वृद्धि सुनिश्चित करे। वसिष्ठ-वंश स्पष्ट रूप से इस आवाहन पर अपना अधिकार जताता है, जिससे यह स्तुति और संरक्षण की जीवित पारिवारिक परंपरा में स्थित होती है।
Mantra 1
वसुं न चित्रमहसं गृणीषे वामं शेवमतिथिमद्विषेण्यम् । स रासते शुरुधो विश्वधायसोऽग्निर्होता गृहपतिः सुवीर्यम् ॥
मैं अग्नि की स्तुति करता हूँ—वसु (धन) के समान समृद्ध, बहुविध तेज से चित्रित; कल्याणकारी, वांछनीय, अतिथि—जो द्वेषरहित है। वह सर्व प्रकार से पूर्णता की वेगवती धाराएँ प्रदान करता है—अग्नि, होता (यज्ञ-पुरोहित), गृहपति, जो सुवीर्य (श्रेष्ठ वीर्य-शक्ति) देता है।
Mantra 2
जुषाणो अग्ने प्रति हर्य मे वचो विश्वानि विद्वान्वयुनानि सुक्रतो । घृतनिर्णिग्ब्रह्मणे गातुमेरय तव देवा अजनयन्ननु व्रतम् ॥
हे अग्नि, प्रसन्न होकर मेरे वचन को स्वीकार करो; हे सुक्रतो, तुम समस्त उपायों/विधानों को जानने वाले हो। घृत-दीप्ति से आवृत होकर ब्रह्म (पवित्र स्तुति) के लिए मार्ग प्रवर्तित करो; क्योंकि देवगण तुम्हारे व्रत (नियम/कर्म-विधान) के अनुसार उत्पन्न हुए।
Mantra 3
सप्त धामानि परियन्नमर्त्यो दाशद्दाशुषे सुकृते मामहस्व । सुवीरेण रयिणाग्ने स्वाभुवा यस्त आनट् समिधा तं जुषस्व ॥
सात धामों के चारों ओर विचरने वाले अमर्त्य अग्नि, जो दाता है और जिसने सत्कर्म किया है, उस दाशुष को दान दो; हमें महिमामय करो। हे स्वाभुव, सुवीर्ययुक्त रयि के साथ, जो समिधा लेकर तुम्हारे पास पहुँचा है, उसे स्वीकार करो।
Mantra 4
यज्ञस्य केतुं प्रथमं पुरोहितं हविष्मन्त ईळते सप्त वाजिनम् । शृण्वन्तमग्निं घृतपृष्ठमुक्षणं पृणन्तं देवं पृणते सुवीर्यम् ॥
यज्ञ के केतु—प्रथम और पुरोहित, अग्रस्थापित—उस सात-वाजिन अग्नि की हविष्मान् जन आराधना करते हैं। हमारी पुकार सुनने वाले, घृत-पृष्ठ, बलवान वृषभ—भरने वाले देव अग्नि—वह भरने वाले यजमान को सुवीर्य से परिपूर्ण करता है।
Mantra 5
त्वं दूतः प्रथमो वरेण्यः स हूयमानो अमृताय मत्स्व । त्वां मर्जयन्मरुतो दाशुषो गृहे त्वां स्तोमेभिर्भृगवो वि रुरुचुः ॥
तुम प्रथम दूत हो, वरणीय (श्रेष्ठ) हो; बुलाए जाने पर अमरत्व के लिए आनन्दित हो। दाता के घर में मरुत् तुम्हें परिशुद्ध करते हैं; भृगु स्तोत्रों द्वारा तुम्हें दीप्त कर देते हैं।
Mantra 6
इषं दुहन्त्सुदुघां विश्वधायसं यज्ञप्रिये यजमानाय सुक्रतो । अग्ने घृतस्नुस्त्रिॠतानि दीद्यद्वर्तिर्यज्ञं परियन्त्सुक्रतूयसे ॥
हे यज्ञप्रिय, हे सुक्रतु! यजमान के लिए तुम सर्वत्र पोषण—सुदुघा, विश्वधायस समृद्धि—दोहते हो। हे अग्ने, घृतस्नुत! त्रिविध ऋतों को दीप्त करते हुए, तुम यज्ञ के चारों ओर मार्ग-रूप से परिक्रमा करते हो, ताकि संकल्प (क्रतु) पूर्णतः सिद्ध हो।
Mantra 7
त्वामिदस्या उषसो व्युष्टिषु दूतं कृण्वाना अयजन्त मानुषाः । त्वां देवा महयाय्याय वावृधुराज्यमग्ने निमृजन्तो अध्वरे ॥
इसी जगत् की उषाओं के व्युष्टि-क्षणों में मनुष्यों ने तुम्हें दूत बनाकर यजन किया है। देवों ने तुम्हें महान् अग्रगमन के लिए बढ़ाया है, हे अग्ने; अध्वर में घृत से अभिषेक करते हुए तुम्हें राज्य (अधिपत्य) प्रदान किया है।
Mantra 8
नि त्वा वसिष्ठा अह्वन्त वाजिनं गृणन्तो अग्ने विदथेषु वेधसः । रायस्पोषं यजमानेषु धारय यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥
हे अग्नि, वसिष्ठों ने तुम्हें—वाजिन् (समृद्धि-विजेता)—विदथों में वेधस् (ऋषि-प्रज्ञ) होकर स्तुति करते हुए पुकारा है। यजमानों में रयि (धन-समृद्धि) की पुष्टि को धारण करो; और तुम—स्वस्तिभिः (कल्याण-शक्तियों) से—हमारी सदा रक्षा करो।
It praises Agni as the household fire and sacrificial priest who carries offerings to the gods and brings back prosperity, strength, and protection for the worshippers.
Because Agni is ritually welcomed into the home as the sacred fire; once kindled, he presides over the household rite like an honored guest and guardian of the family’s welfare.
It asks Agni to maintain growth of wealth among the sacrificers and to guard them continually with svasti—steady well-being and safety.
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