
Sukta 10.110
Agni Jātavedas
यह सूक्त प्रज्वलित गृह्य अग्नि—अग्नि जातवेदस्—को केंद्र में रखता है, जो होतृ और दिव्य दूत बनकर मनुष्यों की आहुति और संकल्प को देवों तक पहुँचाते हैं। इसमें यज्ञ को ऋत के अनुसार सुव्यवस्थित गति के रूप में निरूपित किया गया है, जहाँ उषा और रात्रि जैसी परस्पर पूरक शक्तियाँ कर्मकाण्ड की लय को सहारा देती हैं; और अंत में स्वाहा से संस्कृत आहुति प्रस्तुत होती है, जिससे देवगण उसका भाग ग्रहण करें।
Mantra 1
समिद्धो अद्य मनुषो दुरोणे देवो देवान्यजसि जातवेदः । आ च वह मित्रमहश्चिकित्वान्त्वं दूतः कविरसि प्रचेताः ॥
आज मनुष्य के गृह में समिद्ध होकर, हे जातवेदस्, तू देवस्वरूप होकर देवों के लिए यजन करता है। महिमा के मित्र को भी यहाँ ले आ; क्योंकि तू दूत है, कवि-ऋषि है, प्रचेताः—जाग्रत्-ज्ञानी—जो हमारी अभिलाषा को ऊपर ले जाता है।
Mantra 2
तनूनपात्पथ ऋतस्य यानान्मध्वा समञ्जन्त्स्वदया सुजिह्व । मन्मानि धीभिरुत यज्ञमृन्धन्देवत्रा च कृणुह्यध्वरं नः ॥
हे तनूनपात्, ऋत के पथों पर जो आगे बढ़ते हैं, उन्हें मधु से अभ्यञ्जित करके मधुर कर—हे सुजिह्व। धियों के द्वारा हमारे मन्मानों को दृढ़ कर, और हमारे यज्ञ को देवत्रा—देवों की ओर—अध्वर रूप में, अविघ्न और सत्य, बना दे।
Mantra 3
आजुह्वान ईड्यो वन्द्यश्चा याह्यग्ने वसुभिः सजोषाः । त्वं देवानामसि यह्व होता स एनान्यक्षीषितो यजीयान् ॥
हे अग्ने, आजुह्वान—स्रुवा से आहूत—ईड्य और वन्द्य, वसुओं के साथ एकभाव से यहाँ आ। तू देवों का यह्व होतृ है; तब अपनी प्रेरणा से इन सबको यज—हे यजीयान्, जो यजन करने में सर्वाधिक समर्थ है।
Mantra 4
प्राचीनं बर्हिः प्रदिशा पृथिव्या वस्तोरस्या वृज्यते अग्रे अह्नाम् । व्यु प्रथते वितरं वरीयो देवेभ्यो अदितये स्योनम् ॥
पृथ्वी की दिशा के अनुसार पूर्वाभिमुख पवित्र बर्हि (यज्ञ-आसन) बिछाया जाता है—दिनों के अग्रभाग, उषाकाल के मुख पर। वह फैलता है, और भी विस्तृत, और भी कल्याणकारी—देवों के लिए, तथा अदिति (अनन्ता) के लिए, सुखद और शान्तिमय आधार बनकर।
Mantra 5
व्यचस्वतीरुर्विया वि श्रयन्तां पतिभ्यो न जनयः शुम्भमानाः । देवीर्द्वारो बृहतीर्विश्वमिन्वा देवेभ्यो भवत सुप्रायणाः ॥
विस्तृत और दीप्तिमती द्वार-देवियाँ खुलकर फैलें—मानो स्वामियों के लिए सजी हुई स्त्रियाँ। हे दिव्य द्वारो, महान और विश्व-प्रवर्तक, देवों के लिए सुगम प्रवेश और शुभ प्रस्थान बनो।
Mantra 6
आ सुष्वयन्ती यजते उपाके उषासानक्ता सदतां नि योनौ । दिव्ये योषणे बृहती सुरुक्मे अधि श्रियं शुक्रपिशं दधाने ॥
यज्ञ के समीप से उसे जगाती हुई उषा और रात्रि—अपने ही योनि, अपने सामंजस्य-आश्रय में आकर बैठें। दिव्य योषणा-क्षेत्र में, विशाल और सुवर्णाभूषित, वे हमारे भीतर ज्योतिर्मय शोभा और उज्ज्वल रूप वाली श्री को धारण करें।
Mantra 7
दैव्या होतारा प्रथमा सुवाचा मिमाना यज्ञं मनुषो यजध्यै । प्रचोदयन्ता विदथेषु कारू प्राचीनं ज्योतिः प्रदिशा दिशन्ता ॥
दैवी होतृगण—सुवाणी में प्रथम—मनुष्य के यजन हेतु यज्ञ का माप-निर्धारण करते हैं। वे विदथों (सभाओं) में कवि-कारु को प्रेरित करते, अग्रगामी ज्योति को प्रकट करते और उसकी दिशाएँ नियत करते हैं।
Mantra 8
आ नो यज्ञं भारती तूयमेत्विळा मनुष्वदिह चेतयन्ती । तिस्रो देवीर्बर्हिरेदं स्योनं सरस्वती स्वपसः सदन्तु ॥
भारती शीघ्र हमारे यज्ञ में आए; इळा—मनुष्याभिमुख—यहाँ हमें चेताए। इस सुखद बर्हि-आसन पर तीन देवियाँ—सरस्वती आदि—स्वकर्म-सम्पन्न होकर आसीन हों।
Mantra 9
य इमे द्यावापृथिवी जनित्री रूपैरपिंशद्भुवनानि विश्वा । तमद्य होतरिषितो यजीयान्देवं त्वष्टारमिह यक्षि विद्वान् ॥
जिसने द्यावा-पृथिवी—दो जनित्री—के साथ रूपों द्वारा समस्त भुवनों को रचा, उस देव त्वष्टा को आज, हे होतृ, ऋषि-प्रेरित और विद्वान होकर, यहाँ यज—उसके लिए यज्ञ कर।
Mantra 10
उपावसृज त्मन्या समञ्जन्देवानां पाथ ऋतुथा हवींषि । वनस्पतिः शमिता देवो अग्निः स्वदन्तु हव्यं मधुना घृतेन ॥
अन्तःस्वरूप से छोड़ो, मुक्त करो; और सम्यक् संयोजन करते हुए देवों के पथ को ऋतु के अनुसार हवियों से सजाओ। वनस्पति—समिधाता—और देव अग्नि, मधु और घृत से हव्य को स्वादिष्ट करें।
Mantra 11
सद्यो जातो व्यमिमीत यज्ञमग्निर्देवानामभवत्पुरोगाः । अस्य होतुः प्रदिश्यृतस्य वाचि स्वाहाकृतं हविरदन्तु देवाः ॥
तत्क्षण जन्मा अग्नि ने यज्ञ को नाप-तौल कर व्यवस्थित किया और देवों का पुरोगामी हुआ। इस होतृ के निर्देश-वचन में, ऋत की वाणी में, स्वाहा से सिद्ध किया हुआ हव्य देवगण भक्षण करें।
Agni Jātavedas is the main deity—fire as the divine priest and messenger who carries offerings and prayers from humans to the gods.
They represent the sacrificial rhythm of time—dawn and twilight—supporting the rite’s proper order and helping ‘awaken’ and seat the sacrifice in harmony.
Svāhā is the consecrating exclamation that completes an offering; it marks the oblation as properly prepared so the gods may accept and partake of it.
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