
Sukta 10.10
Dialogic hymn (Yama–Yamī tradition); powers implied include Agni (as Pituḥ Napāt) and cosmic order
यह संवादात्मक सूक्त प्रसिद्ध यम–यमी संवाद को प्रस्तुत करता है, जिसमें यमी मानव-संतति की निरन्तरता के लिए संयोग का आग्रह करती है, जबकि यम संयम और ऋत (ब्रह्माण्डीय व्यवस्था) के अनुरूप आचरण पर दृढ़ रहता है। यह सूक्त कामना और नियम के बीच के तनाव को नाटकीय रूप से उभारता है और दिखाता है कि सामाजिक तथा विश्व-व्यापी मर्यादाएँ सचेत चयन और आत्मसंयम के द्वारा स्थापित होती हैं। अंत में यम, यमी को कहीं अन्यत्र शुभ और विधिसम्मत संयोग की ओर प्रवृत्त करता है, और उल्लंघन के बजाय सामंजस्य (संविद्) पर बल देता है।
Mantra 1
ओ चित्सखायं सख्या ववृत्यां तिरः पुरू चिदर्णवं जगन्वान् । पितुर्नपातमा दधीत वेधा अधि क्षमि प्रतरं दीध्यानः ॥
ओ मित्र! सख्य के द्वारा सखा की खोज करता हुआ वह अनेक बाढ़ों/प्रवाहों को भी पार कर गया। वेधा (ज्ञाता) पिता के पुत्र को स्थापित करता है; पृथ्वी पर उसे अग्रगामी प्रकाश के रूप में प्रज्वलित करता हुआ।
Mantra 2
न ते सखा सख्यं वष्ट्येतत्सलक्ष्मा यद्विषुरूपा भवाति । महस्पुत्रासो असुरस्य वीरा दिवो धर्तार उर्विया परि ख्यन् ॥
तुम्हारा सखा इस प्रकार की सख्य नहीं चाहता—यह एक-सा चिह्न—जब वह विभक्त रूप हो जाता है। असुर के महाबली पुत्र, वीर, स्वर्ग के धारक हैं; वे उर्वी (विस्तीर्ण) पृथ्वी के चारों ओर दूर-दूर तक दृष्टि डालते हैं।
Mantra 3
उशन्ति घा ते अमृतास एतदेकस्य चित्त्यजसं मर्त्यस्य । नि ते मनो मनसि धाय्यस्मे जन्युः पतिस्तन्वमा विविश्याः ॥
अमर (देव) निश्चय ही यही चाहते हैं—एक मर्त्य के बंधन/सीमा के त्याग को भी (वे स्वीकारते हैं)। अपना मन मेरे मन में स्थापित कर; पति/पत्नी-भाव से मेरी देहधारी सत्ता में प्रवेश कर।
Mantra 4
न यत्पुरा चकृमा कद्ध नूनमृता वदन्तो अनृतं रपेम । गन्धर्वो अप्स्वप्या च योषा सा नो नाभिः परमं जामि तन्नौ ॥
यदि हमने पहले कभी कुछ किया भी हो, तो अब सत्य बोलते हुए हम असत्य में क्यों गिरें? जलों में स्थित गन्धर्व और जलमयी कन्या—वही हमारी नाभि है, हमारा परम जामि (निकटतम स्वजन-सम्बन्ध); वही हमारे बीच का वह बन्धन है।
Mantra 5
गर्भे नु नौ जनिता दम्पती कर्देवस्त्वष्टा सविता विश्वरूपः । नकिरस्य प्र मिनन्ति व्रतानि वेद नावस्य पृथिवी उत द्यौः ॥
गर्भ में ही हमारे जनक—युगल रूप से—कौन देव थे? देव त्वष्टा, सविता, विश्वरूप। उसके व्रतों (नियमों) का कोई उल्लंघन नहीं करता; उसे पृथ्वी और द्यौ (आकाश) जानते हैं—और हम भी जानते हैं।
Mantra 6
को अस्य वेद प्रथमस्याह्नः क ईं ददर्श क इह प्र वोचत् । बृहन्मित्रस्य वरुणस्य धाम कदु ब्रव आहनो वीच्या नॄन् ॥
इस प्रथम दिवस को कौन जानता है? किसने उसे देखा, और यहाँ कौन उसका उद्घोष कर सकता है? मित्र और वरुण का धाम विशाल है—हे आहन् (वधकर्ता), तुम निर्णायक वाणी से मनुष्यों को अलग करने की बात कैसे कहोगे?
Mantra 7
यमस्य मा यम्यं काम आगन्त्समाने योनौ सहशेय्याय । जायेव पत्ये तन्वं रिरिच्यां वि चिद्वृहेव रथ्येव चक्रा ॥
यम के लिए—अपने यम्य (जुड़वाँ) की ओर—मुझ पर कामना आ पड़ी है, कि हम एक ही योनि में, साथ शयन करें। जैसे पत्नी पति के लिए अपना तन अर्पित करती है, वैसे ही मैं अपना देह-भाव समर्पित कर दूँ; और जैसे रथ के पथ में फँसा चक्र उखड़कर अलग हो जाता है, वैसे ही (बंधन) को तोड़ दे।
Mantra 8
न तिष्ठन्ति न नि मिषन्त्येते देवानां स्पश इह ये चरन्ति । अन्येन मदाहनो याहि तूयं तेन वि वृह रथ्येव चक्रा ॥
देवों के ये स्पश—जो यहाँ विचरते हैं—न ठहरते हैं, न पलक झपकाते हैं। हे मद-हन्ता, तू शीघ्र किसी अन्य मार्ग से चला जा; उसी से अपने को छुड़ा ले—जैसे रथ की लीक से चक्र उखड़कर अलग हो जाता है।
Mantra 9
रात्रीभिरस्मा अहभिर्दशस्येत्सूर्यस्य चक्षुर्मुहुरुन्मिमीयात् । दिवा पृथिव्या मिथुना सबन्धू यमीर्यमस्य बिभृयादजामि ॥
वह उसे रात्रियों और दिनों से सेवित करे; सूर्य का नेत्र बार-बार खुलता रहे। द्यावा और पृथिवी युगल हैं—संबंधी और संयुक्त; यमी, यम को धारण करे—अजामि (अविधि-संग) में नहीं, बल्कि जुड़वाँ-शक्ति को अव्यभिचार से धारण करने वाली होकर।
Mantra 10
आ घा ता गच्छानुत्तरा युगानि यत्र जामयः कृणवन्नजामि । उप बर्बृहि वृषभाय बाहुमन्यमिच्छस्व सुभगे पतिं मत् ॥
अब तू आगे, उत्तरवर्ती युगों की ओर जा, जहाँ स्वजन अजात—असमान गोत्र—को भी अपना बनाते हैं। वृषभ-सम बलवान के लिए अपनी भुजा उठाकर आगे बढ़; हे सुभगे, मुझसे नहीं—किसी अन्य पति को खोज।
Mantra 11
किं भ्रातासद्यदनाथं भवाति किमु स्वसा यन्निॠतिर्निगच्छात् । काममूता बह्वेतद्रपामि तन्वा मे तन्वं सं पिपृग्धि ॥
यदि भ्राता ही अनाथ हो जाए तो वह क्या भ्राता? और यदि स्वसा पर निरृति (विनाश) आ पड़े तो वह क्या स्वसा? काम से प्रेरित होकर मैं यह बहुत कहता हूँ—हे देहवती, अपनी तनु से मेरी तनु को पूर्णता में जोड़ दे।
Mantra 12
न वा उ ते तन्वा तन्वं सं पपृच्यां पापमाहुर्यः स्वसारं निगच्छात् । अन्येन मत्प्रमुदः कल्पयस्व न ते भ्राता सुभगे वष्ट्येतत् ॥
मैं तेरे साथ तनु से तनु का संयोग नहीं करूँगा; जो स्वसा के पास जाता है, उसे पाप कहते हैं। मुझसे भिन्न किसी अन्य के साथ अपना प्रमुद (आनन्द) रच; हे सुभगे, तेरा भ्राता यह नहीं चाहता।
Mantra 13
बतो बतासि यम नैव ते मनो हृदयं चाविदाम । अन्या किल त्वां कक्ष्येव युक्तं परि ष्वजाते लिबुजेव वृक्षम् ॥
हाय, हाय, हे यम! सचमुच मैं न तेरे मन को जान पाई, न हृदय को। कोई दूसरी ही तुझे परि-आलिंगन करती है—जैसे जुए में जुते हुए को पट्टा; जैसे लिपटी हुई लता वृक्ष को।
Mantra 14
अन्यमू षु त्वं यम्यन्य उ त्वां परि ष्वजाते लिबुजेव वृक्षम् । तस्य वा त्वं मन इच्छा स वा तवाधा कृणुष्व संविदं सुभद्राम् ॥
हे यमी, तू किसी और को ही चाह; और कोई तुझे परि-आलिंगन करे—जैसे लता वृक्ष को। उसी के लिए मन से इच्छा कर; और वह भी तेरे लिए—तब तुम दोनों शुभ, सौभाग्यदायी सं-विद् (समझौता/समन्वय) स्थापित करो।
It is a dialogue where Yamī urges Yama to unite with her, and Yama refuses because it would break ṛta (right order). The hymn teaches that desire must be guided by law and harmony.
They are the devānāṃ spaśaḥ—figures of divine surveillance. In meaning, they represent conscience and the idea that actions are seen and carry moral consequences.
Because Yama’s solution is not repression but redirection: desire should find an auspicious, lawful form. The closing emphasizes “subhadrā saṃvid”—a fortunate, harmonious agreement aligned with ṛta.
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