Rig Veda Sukta 92
Mandala 1Sukta 9218 Mantras

Sukta 92

Sukta 1.92

Rishi

Gautama (Gautama Rahūgaṇa tradition) / Gotamas (per internal evidence in 1.92.7)

Devata

Uṣas (Dawn)

Chandas

Triṣṭubh (probable for RV 1.92; verse-length and cadence consistent)

ऋग्वेद 1.92 उषा का स्तोत्र है, जो उषस् को सदा नूतन होने वाली शक्ति के रूप में महिमामंडित करता है—वह प्रकाश का “ध्वज” उठाती है, अरुण गौओं की भाँति किरणों को मुक्त करती है और जगत को गति में प्रवृत्त करती है। कवि उसकी अचूक पुनरावृत्ति, उसकी शोभा और उपकारक स्वभाव की प्रशंसा करता है, तथा अंधकार और वैर-शत्रुता को दूर कर आयु बढ़ाने की उसकी क्षमता का वर्णन करता है। स्तोत्र आगे यज्ञकर्म की सिद्धि की ओर मुड़ता है और अंत में उषाकाल में जाग्रत सोमपान-शक्तियों को आमंत्रित करता है कि वे देवताओं को हवि-आहुति के लिए ले आएँ।

Mantras

Mantra 1

एता उ त्या उषसः केतुमक्रत पूर्वे अर्धे रजसो भानुमञ्जते । निष्कृण्वाना आयुधानीव धृष्णवः प्रति गावोऽरुषीर्यन्ति मातरः ॥

ये उषसः—उषा-शक्तियाँ—जागरण का केतु रचती हैं; रजस के पूर्वार्ध में वे भानु—दीप्ति—का अभ्यञ्जन करती हैं। धृष्ट योद्धाओं-सी आयुध धारण कर उसे प्रकट करती हुई, अरुण मातृ-गाएँ—रश्मियाँ—हमारी ओर अग्रसर होती हैं।

Mantra 2

उदपप्तन्नरुणा भानवो वृथा स्वायुजो अरुषीर्गा अयुक्षत । अक्रन्नुषासो वयुनानि पूर्वथा रुशन्तं भानुमरुषीरशिश्रयुः ॥

ऊर्ध्व को उछल पड़ीं अरुण (लालिमा-युक्त) प्रभाएँ—स्वेच्छा से; स्वयंजुत, अरुष (लाल) किरणों ने तेजस्वी गौओं (प्रकाश-रश्मियों) को जोत दिया। उषाएँ पूर्ववत् अपने विधान/कर्म-विधान रचती हैं; अरुषियाँ उस चमकते भानु (दीप्ति) के निकट सटकर उसी में आश्रय लेती हैं।

Mantra 3

अर्चन्ति नारीरपसो न विष्टिभिः समानेन योजनेना परावतः । इषं वहन्तीः सुकृते सुदानवे विश्वेदह यजमानाय सुन्वते ॥

दीप्तिमती नारियाँ (उषाएँ) गान करती हैं—कर्मठ कारीगरों की भाँति, अपने दलों सहित; एक ही युग्मन से परावत् (दूर पार) से आती हुई। वे सुकृत (सत्कर्मी) सुदानव (उदार दाता) के लिए वृद्धि की इष (प्रेरणा/पोषण) वहन करती हैं—हाँ, यह सब यजमान, सोम-निष्पेषक (सुन्वत) के लिए।

Mantra 4

अधि पेशांसि वपते नृतूरिवापोर्णुते वक्ष उस्रेव बर्जहम् । ज्योतिर्विश्वस्मै भुवनाय कृण्वती गावो न व्रजं व्युषा आवर्तमः ॥

वह नर्तकी की भाँति अपने सौन्दर्य-रूप धारण करती है; उ॒स्रा (दीप्तिमती) के समान अपना वक्ष (उरः) खोलती है, मानो तेज प्रकट हो। समस्त भुवनों के लिए ज्योति रचती हुई उषा अन्धकार को फैलाकर खोल देती है—जैसे गौएँ व्रज (गोठ) को खोलती हैं, वैसे ही बन्द पड़ी शक्तियों को मुक्त गमन में प्रवाहित करती है।

Mantra 5

प्रत्यर्ची रुशदस्या अदर्शि वि तिष्ठते बाधते कृष्णमभ्वम् । स्वरुं न पेशो विदथेष्वञ्जञ्चित्रं दिवो दुहिता भानुमश्रेत् ॥

उसकी प्रत्युत्तर देने वाली, दीप्त ज्वाला प्रकट होती है; वह आगे खड़ी होकर कृष्ण-तम, उस विशाल अन्धकार को दूर हटा देती है। सुगढ़ रूप के समान वह सभाओं/विदथों में अपने सौन्दर्य का लेपन करती है; दिवः-दुहिता उषा अद्भुत भानु (दीप्ति) तक पहुँचती है।

Mantra 6

अतारिष्म तमसस्पारमस्योषा उच्छन्ती वयुना कृणोति । श्रिये छन्दो न स्मयते विभाती सुप्रतीका सौमनसायाजीगः ॥

हम इस तमस् के पार उतर गए; उषा उदित होकर वयुन (ऋत के अनुसार उचित विधान/कर्म-व्यवस्था) रचती है। वह विभा से चमकती हुई, श्री के लिए छन्द की भाँति मुस्कराती है; सु-प्रतीका (सुन्दर मुखवाली) होकर उसने हमें सौमनस्य—आत्म-प्रसन्नता—में जगा दिया है।

Mantra 7

भास्वती नेत्री सूनृतानां दिवः स्तवे दुहिता गोतमेभिः । प्रजावतो नृवतो अश्वबुध्यानुषो गोअग्राँ उप मासि वाजान् ॥

भास्वती, सूनृताओं (सत्य-प्रेरित वाणी/सद्वचन) की नेत्री, दिवः की दुहिता का गोतमों द्वारा स्तवन होता है। हे उषा, प्रजावान और नृवत (वीर-सम्पन्न) जनों के लिए—अश्व-बुध्य (अश्व-शक्ति को जगाने वाली) होकर—प्रथम गो-अग्राँ (प्रकाश-गवों से अग्र) और वाज (समृद्धि/बल) की पूर्णताओं सहित हमारे निकट आ।

Mantra 8

उषस्तमश्यां यशसं सुवीरं दासप्रवर्गं रयिमश्वबुध्यम् । सुदंससा श्रवसा या विभासि वाजप्रसूता सुभगे बृहन्तम् ॥

हे उषा, मैं उस यशस्वी, सु-वीर (वीरों से समृद्ध) धन-राशि को प्राप्त करूँ—जो दासत्व का विनाश करे और अश्व-शक्ति को जगाए। हे सुदंसा (सु-कर्मिणी), अपने श्रवस् (कीर्ति) से तू प्रकाशित होती है; हे सुभगे, वाजों को प्रसूत करने वाली, वह बृहन्त (महान्) वैभव हमें प्रदान कर।

Mantra 9

विश्वानि देवी भुवनाभिचक्ष्या प्रतीची चक्षुरुर्विया वि भाति । विश्वं जीवं चरसे बोधयन्ती विश्वस्य वाचमविदन्मनायोः ॥

समस्त भुवनों को देखती हुई देवी, विस्तृत दृष्टि से हमारी ओर प्रत्यंचा होकर प्रकाशित होती है। वह समस्त जीवों की गति को चलने हेतु जगाती है; और वह दोनों मनों के लिए—समस्त के लिए—वाक् (वाणी) को खोज निकालती है, जिससे वाणी और बोध का सामंजस्य हो।

Mantra 10

पुनःपुनर्जायमाना पुराणी समानं वर्णमभि शुम्भमाना । श्वघ्नीव कृत्नुर्विज आमिनाना मर्तस्य देवी जरयन्त्यायुः ॥

बार-बार जन्म लेती हुई वह पुराणी, उसी वर्ण (रूप-दीप्ति) को धारण कर अपने को सँवारती है। श्वघ्नी के समान वह शत्रु-विभाजनों को तोड़ती, उन्हें क्षीण करती है; और देवी मर्त्य के आयु को बढ़ाती है—चेतना के प्रकाश को नूतन करती हुई।

Mantra 11

व्यूर्ण्वती दिवो अन्ताँ अबोध्यप स्वसारं सनुतर्युयोति । प्रमिनती मनुष्या युगानि योषा जारस्य चक्षसा वि भाति ॥

दिव के दूरस्थ छोरों को उघाड़ती हुई जागरण-देवी उषा उठ खड़ी हुई; वह अपनी बहन (रात्रि) को मार्ग से हटा देती है। मनुष्यों के जड़ युगों को तोड़ती हुई, वह तेजस्विनी योषा अपने जार (प्रिय) की चेतना-भरी दृष्टि से—उस जाग्रत चक्षु से जो उसे बुलाता है—प्रकाशित होती है।

Mantra 12

पशून्न चित्रा सुभगा प्रथाना सिन्धुर्न क्षोद उर्विया व्यश्वैत् । अमिनती दैव्यानि व्रतानि सूर्यस्य चेति रश्मिभिर्दृशाना ॥

किरणों की गोपालिनी-सी, बहुरंगी, सौभाग्यवती उषा विस्तृत होती जाती है; प्रचण्ड प्रवाह वाली नदी-सी वह विशालता में उमड़ पड़ती है। वह दैवी व्रतों का उल्लंघन नहीं करती; सूर्य की रश्मियों में दृष्टिगोचर होकर, ऋत के अनुरूप वह अग्रसर होती है।

Mantra 13

उषस्तच्चित्रमा भरास्मभ्यं वाजिनीवति । येन तोकं च तनयं च धामहे ॥

हे उषा, वह चित्र-दीप्त वरदान हमारे लिए ले आ, हे वाजिनीवति (बल-समृद्ध)! जिसके द्वारा हम संतान और वंश को स्थापित करें—जिसके द्वारा हम अपने विकासों को सत्-धाम में प्रतिष्ठित करें।

Mantra 14

उषो अद्येह गोमत्यश्वावति विभावरि । रेवदस्मे व्युच्छ सूनृतावति ॥

हे उषा, आज यहीं हमारे लिए गो-समृद्धि और अश्व-समृद्धि सहित, हे विभावरि, उदित हो। हे सूनृतावति, हमारे लिए रेवत् (ऐश्वर्ययुक्त) होकर प्रकाश फैलाकर प्रकट हो।

Mantra 15

युक्ष्वा हि वाजिनीवत्यश्वाँ अद्यारुणाँ उषः । अथा नो विश्वा सौभगान्या वह ॥

हे वाजिनीवति उषा, आज अपने अरुण अश्वों को युक्त कर। फिर हमारे पास सब सौभाग्य—समस्त कल्याण-शक्तियाँ—ले आ।

Mantra 16

अश्विना वर्तिरस्मदा गोमद्दस्रा हिरण्यवत् । अर्वाग्रथं समनसा नि यच्छतम् ॥

हे दस्र अश्विनौ, गोमद् और हिरण्यवत् समृद्धि सहित अपना मार्ग हमारी ओर मोड़ो। एकचित्त होकर अपना रथ हमारे निकट लाओ और यहाँ स्थापित करो।

Mantra 17

यावित्था श्लोकमा दिवो ज्योतिर्जनाय चक्रथुः । आ न ऊर्जं वहतमश्विना युवम् ॥

हे अश्विनौ! जैसे तुमने मनुष्यों के लिए दिव्य ज्योति—स्वर्ग से आया प्रकाश—और उज्ज्वल यश रचा है, वैसे ही हमारे लिए भी पोषण देने वाली ऊर्ज़ा और आनंद वहन करो, हे युवां।

Mantra 18

एह देवा मयोभुवा दस्रा हिरण्यवर्तनी । उषर्बुधो वहन्तु सोमपीतये ॥

यहाँ आओ, हे देवो—मयोभू, आनंद-स्वरूप; हे दस्र, स्वर्ण-पथों वाले! उषा से जागे हुए बल तुम्हें सोमपान के लिए यहाँ ले आएँ, ताकि हमारे भीतर आनंद प्रतिष्ठित हो।

Frequently Asked Questions

The hymn primarily praises Uṣas (Dawn), describing her light, beauty, and daily renewal. The closing also includes an invitation to dawn-awakened divine powers for soma-drinking.

It highlights a Vedic paradox: Dawn is timeless in her role (ancient), yet she appears freshly each day (born again). This expresses cosmic regularity and personal renewal at the start of every day.

It is well-suited for dawn recitation to cultivate clarity, motivation, and protection for the day. Traditionally it aligns with morning offerings (like ghee into fire or a simple water/milk offering) and a prayer for health and long life.

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