Rig Veda Sukta 89
Mandala 1Sukta 8910 Mantras

Sukta 89

Sukta 1.89

Rishi

Gautama (traditional for RV 1.89)

Devata

Viśve Devāḥ (All the Gods)

Chandas

Jagatī (probable; RV 1.89 is commonly Jagatī)

यह सूक्त विश्वेदेवों के प्रति व्यापक मंगलाशीर्वाद है। इसमें चारों दिशाओं से शुभ संकल्प (भद्राः क्रतवः) आने का आह्वान किया गया है और देवताओं से प्रार्थना है कि वे उपासक के प्राणबल और समृद्धि की रक्षा करें तथा उन्हें निरंतर बढ़ाएँ। यह रक्षात्मक ‘स्वस्ति’ सूत्रों को एक सार्वभौमिक दृष्टि के साथ पिरोता है, जिसमें अदिति को देवों, लोकों और स्वयं जन्म की सर्वव्यापी आधार-भूमि के रूप में प्रतिपादित किया गया है।

Mantras

Mantra 1

आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः । देवा नो यथा सदमिद्वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवेदिवे ॥

चारों दिशाओं से हमारे पास भद्र क्रतवः—शुभ संकल्प-शक्तियाँ—आएँ; जो अदब्ध (अवंचनीय), अपरीत (अपराजेय) हों, और जो बंद को उन्मोचित करने वाले हों। देव हमारे लिए सदा वृद्धि के हेतु हों; दिवे-दिवे वे हमारे प्राण-बल के रक्षक हों, जो कभी च्युत न हों।

Mantra 2

देवानां भद्रा सुमतिॠजूयतां देवानां रातिरभि नो नि वर्तताम् । देवानां सख्यमुप सेदिमा वयं देवा न आयुः प्र तिरन्तु जीवसे ॥

देवों की भद्रा सुमति हमें ऋजु-मार्ग पर प्रवृत्त करे; देवों की राति (दान/अनुग्रह) हमारी ओर मुड़े और हममें निवास करे। हम देवों के सख्य के निकट आए हैं; देव हमारे आयुः को जीवित रहने के लिए आगे बढ़ाएँ—क्षय से परे।

Mantra 3

तान्पूर्वया निविदा हूमहे वयं भगं मित्रमदितिं दक्षमस्रिधम् । अर्यमणं वरुणं सोममश्विना सरस्वती नः सुभगा मयस्करत् ॥

हम प्राचीन निविद् (आह्वान) से उन देव-शक्तियों का आह्वान करते हैं—भग, मित्र, अदिति और अच्युत-निश्चययुक्त दक्ष; तथा अर्यमन्, वरुण, सोम, अश्विनौ—और सरस्वती हमारे लिए सुभगा होकर कल्याण और सुख-रस उत्पन्न करें।

Mantra 4

तन्नो वातो मयोभु वातु भेषजं तन्माता पृथिवी तत्पिता द्यौः । तद्ग्रावाणः सोमसुतो मयोभुवस्तदश्विना शृणुतं धिष्ण्या युवम् ॥

वात, जो मयोभू है, वह हमारे लिए वह भेषज-रूप मधुरता प्रवाहित करे; माता पृथिवी और पिता द्यौः वही वरदान हमारे भीतर स्थापित करें। सोम-पाषाण और निचोड़ा हुआ सोम—मयोभू—उसे उपस्थित करें; और हे धिष्ण्य अश्विनौ, तुम दोनों उसे सुनो (हमारी प्रार्थना ग्रहण करो)।

Mantra 5

तमीशानं जगतस्तस्थुषस्पतिं धियंजिन्वमवसे हूमहे वयम् । पूषा नो यथा वेदसामसद्वृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये ॥

जो चलने-फिरने और स्थिर रहने वाले समस्त जगत् का ईशान, तस्थुषस्पति (स्थावरों का स्वामी) है, जो धियं (दृष्टि-चिन्तन) को जिंवता/प्रेरित करता है—उस प्रभु को हम सहायता के लिए आह्वान करते हैं। पूषन् हमारे लिए—ताकि हम वृद्धि पाएं—वेदसा (यथार्थ ज्ञान) का जाग्रतकर्ता, रक्षिता और पायुः (पालक-रक्षक), अदब्ध (अच्युत/अपराजेय), स्वस्ति के लिए हो।

Mantra 6

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥

हमारे लिए स्वस्ति (कल्याण) हो—वृद्धश्रवा इन्द्र हमें स्वस्ति प्रदान करें; विश्ववेदाः पूषा हमें स्वस्ति दें। अरिष्टनेमि तार्क्ष्य हमें स्वस्ति दें; बृहस्पति हमारे भीतर स्वस्ति को स्थापित करें।

Mantra 7

पृषदश्वा मरुतः पृश्निमातरः शुभंयावानो विदथेषु जग्मयः । अग्निजिह्वा मनवः सूरचक्षसो विश्वे नो देवा अवसा गमन्निह ॥

चितकबरे अश्वों वाले, पृश्नि-माता मरुत, जो शुभ गति से चलते और विदथों (यज्ञ-सभाओं) में आते हैं—वे यहाँ आएँ। अग्नि-जिह्वा, सूर्य-चक्षु मनव (मनु के वंशज)—और समस्त देव—अपनी सहायता (अवस) सहित हमारे पास यहाँ आएँ।

Mantra 8

भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥

हे देवो, हम अपने कानों से कल्याणमय ही सुनें; हे यजत्रो, हम अपनी आँखों से कल्याणमय ही देखें। स्थिर अंगों और स्वस्थ तनुओं से स्तुति करते हुए, देव-हित (देवों द्वारा नियत) आयु को हम पूर्ण विस्तार तक प्राप्त करें।

Mantra 9

शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्रा नश्चक्रा जरसं तनूनाम् । पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः ॥

हे देवो! हमारे निकट सौ शरद्-ऋतुएँ (वर्ष) आएँ—जहाँ आपने हमारे देहधारी अस्तित्व की परिपक्व पूर्णता रची है; जहाँ पुत्र ही पिता बनते हैं। हमारे आयु-मार्ग के मध्य में हमारी प्राण-शक्ति को कोई आघात न पहुँचे।

Mantra 10

अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः । विश्वे देवा अदितिः पञ्च जना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम् ॥

अदिति ही द्यौ (स्वर्ग) है, अदिति ही अन्तरिक्ष है; अदिति ही माता है—वही पिता है, वही पुत्र है। समस्त देव अदिति ही हैं; पंच जन भी अदिति ही हैं। जो जन्मा है वह भी अदिति है, और जन्म देने की क्रिया-शक्ति भी अदिति ही है।

Frequently Asked Questions

It asks all the gods to send auspicious intentions and to protect the worshipper day by day, giving steady growth, safety, and well-being (svasti).

It is a clear svasti (well-being) prayer naming Indra, Pūṣan, Tārkṣya, and Bṛhaspati, so it became a handy benediction for beginnings, rituals, and travel.

It presents Aditi as boundlessness itself—the cosmic mother-principle in which heaven, the midworld, the gods, beings, and even the power of birth are contained and supported.

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