
Sukta 1.86
Gotama Rāhūgaṇa (traditional for RV 1.86)
Marutās
Gāyatrī (compact 3×8 style; hymn 1.86 is commonly in Gāyatrī/related meters)
यह सूक्त मरुतों का आह्वान करता है—वे पराक्रमी, स्वर्ग में विचरने वाले रक्षक हैं, जो मार्गों को विस्तृत करते हैं, उपासक की रक्षा करते हैं और प्रयत्नशील जनों को संभालते हैं। ऋषि उनके प्रति अपनी दीर्घकालीन भक्ति का स्मरण करता है और उनकी सक्रिय सहायता माँगता है—गुप्त अंधकार को दूर भगाने तथा प्रकाशमय स्पष्टता को प्रबल करने के लिए। समग्रतः यह रक्षा, सामूहिक बल और बाधक शक्तियों पर प्रकाश की विजय के लिए प्रार्थना है।
Mantra 1
मरुतो यस्य हि क्षये पाथा दिवो विमहसः । स सुगोपातमो जनः ॥
हे मरुतो, जिसके निवास में स्वर्ग के पथ विस्तृत हो जाते हैं—वह मनुष्यों में सर्वाधिक सु-रक्षित (सु-गोपातम) होता है।
Mantra 2
यज्ञैर्वा यज्ञवाहसो विप्रस्य वा मतीनाम् । मरुतः शृणुता हवम् ॥
यज्ञों के द्वारा, हे यज्ञवाहसो, अथवा ऋषि की प्रेरित मति (मतीनाम्) के द्वारा—हे मरुतो, हमारे हव (आह्वान) को सुनो।
Mantra 3
उत वा यस्य वाजिनोऽनु विप्रमतक्षत । स गन्ता गोमति व्रजे ॥
और वह भी—जिसके वाजिन् (बलवान) विप्र (ऋषि) को आगे की ओर गढ़ते/प्रेरित करते हैं—वह गो-समृद्ध व्रज (गोठ/बाड़ा) में, तेजस्वी लाभों के परिक्षेत्र में, पहुँचता है।
Mantra 4
अस्य वीरस्य बर्हिषि सुतः सोमो दिविष्टिषु । उक्थं मदश्च शस्यते ॥
इस वीर के बर्हिष् (यज्ञ-तृण) पर, दिव्य संघर्षों में निचोड़ा हुआ सोम स्थापित किया जाता है; उक्थ (स्तुति-गान) और मद (आनन्द-उन्माद) का घोष किया जाता है।
Mantra 5
अस्य श्रोषन्त्वा भुवो विश्वा यश्चर्षणीरभि । सूरं चित्सस्रुषीरिषः ॥
इस पुकार को सब लोक सुनें—वह जो जनों की ओर अग्रसर होता है; और भीतर के वीर-सूर्य की ओर, आनन्द की प्रेरणाएँ भी वेग से प्रवाहित होती हैं।
Mantra 6
पूर्वीभिर्हि ददाशिम शरद्भिर्मरुतो वयम् । अवोभिश्चर्षणीनाम् ॥
क्योंकि, हे मरुतो, अनेक पूर्व ऋतुओं के साथ हमने स्वयं को (इस कर्म में) अर्पित किया है; और तुम्हारे अवो (रक्षण) से तुम संघर्षशील जनों—मानवी शक्तियों—को संभालते हो।
Mantra 7
सुभगः स प्रयज्यवो मरुतो अस्तु मर्त्यः । यस्य प्रयांसि पर्षथ ॥
हे मरुतो! वह मर्त्य सु॒भाग्यवान् है जो यज्ञ में अग्रसर रहता है; जिसके गमन और प्रगति को तुम सुरक्षित पार करा देते हो।
Mantra 8
शशमानस्य वा नरः स्वेदस्य सत्यशवसः । विदा कामस्य वेनतः ॥
हे नर-वीरो, सत्य-शवसः! चाहे अपने ही ताप में परिश्रम करने वाले साधक के लिए, चाहे आनन्द के अन्वेषी के लिए—तुम्हारे ज्ञान से वह वाञ्छित कामना की सिद्धि प्राप्त करे।
Mantra 9
यूयं तत्सत्यशवस आविष्कर्त महित्वना । विध्यता विद्युता रक्षः ॥
हे सत्य-शवसः शक्तियो! अपने महत्त्व से उसे प्रकट करो; विद्युत् से उस रक्षस्—भक्षक अन्धकार—को विदीर्ण करो जो मार्ग रोकता है।
Mantra 10
गूहता गुह्यं तमो वि यात विश्वमत्रिणम् । ज्योतिष्कर्ता यदुश्मसि ॥
गुप्त अन्धकार को छिपा दो; समस्त भक्षक तमस् को दूर हटा दो। हम ज्योति के कर्ता बनें—क्योंकि उसी को हम उत्कट भाव से चाहते हैं।
They are a host of storm and wind deities, youthful and radiant, who protect the worshipper, shake away obstacles, and bring clarity like a cleared sky.
The hymn asks the Maruts to grant the best protection, to open safe and auspicious ‘paths,’ to uphold the community, and to drive away hidden darkness so light and clarity prevail.
On the outer level it fits the Maruts clearing storm-darkness; on the inner level it means removing obscurity and confusion so insight, right direction, and spiritual brightness arise.
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