Rig Veda Sukta 6
Mandala 1Sukta 610 Mantras

Sukta 6

Sukta 1.6

Rishi

Madhucchandas Vaiśvāmitra (traditional attribution for RV 1.1–1.11; for 1.6 commonly Vaiśvāmitra lineage)

Devata

Indra (with solar/rocanā imagery; the verse evokes the yoking of the radiant power in Indra’s cosmic action)

Chandas

Gāyatrī (3 pādas of 8 syllables; typical for early RV 1 hymns to Indra)

ऋग्वेद 1.6 गायत्‍री छन्द में इन्द्र का स्तोत्र है, जो इन्द्र की विजयी शक्ति को उस दीप्त, सौर ‘रोचना’ (प्रकाश-दीप्ति) से जोड़ता है जिसे ब्रह्माण्डीय कर्म के लिए जुताकर प्रवर्तित किया जाता है। कवि प्रेरित वाणी के द्वारा इन्द्र के समीप आते हैं और स्वर्ग, पृथ्वी तथा विस्तृत अन्तरिक्ष—सभी स्तरों से ‘साति’ (विजय/प्राप्ति) की याचना करते हैं, ताकि विजय-शक्ति उनके जीवन और यज्ञकर्म में सन्निहित हो जाए।

Mantras

Mantra 1

युञ्जन्ति ब्रध्नमरुषं चरन्तं परि तस्थुषः । रोचन्ते रोचना दिवि ॥

वे अरुण, दीप्तिमान ब्रध्न (तेजस्वी शक्ति) को, जो अपने परिक्रामी पथ में चलता है, युक्त करते हैं; उसके चारों ओर स्थिर शक्तियाँ स्थित रहती हैं। द्युलोक में प्रकाशमय लोक दीप्त हो उठते हैं।

Mantra 2

युञ्जन्त्यस्य काम्या हरी विपक्षसा रथे । शोणा धृष्णू नृवाहसा ॥

वे उसके लिए—मनोकाम्य—दो हरि (ताम्रवर्ण) अश्वों को रथ में जोतते हैं; वे व्यापक-पक्ष (विस्तृत-गति वाले), शोण (रक्तिम), धृष्णु (प्रबल) और नृवाहस (मनुष्य को वहन करने वाले) हैं।

Mantra 3

केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या अपेशसे । समुषद्भिरजायथाः ॥

अकेतव (जिसमें केतु नहीं) के लिए केतु (प्रकाश-चिह्न/विवेक) रचते हुए, और अपेशस (रूपहीन) के लिए पेशस् (सुन्दर रूप) प्रदान करते हुए—हे इन्द्र—तुम समुषद्भिः (उत्सुक/उदीयमान आकांक्षाओं) के साथ जन्मे।

Mantra 4

आदह स्वधामनु पुनर्गर्भत्वमेरिरे । दधाना नाम यज्ञियम् ॥

तब वे स्वधा (स्व-शक्ति) के अनुसार, फिर से गर्भत्व (अन्तर्भाव/उद्भव-स्थिति) की ओर प्रवृत्त हुए; यज्ञिय (यज्ञ के योग्य) नाम को धारण करते हुए।

Mantra 5

वीळु चिदारुजत्नुभिर्गुहा चिदिन्द्र वह्निभिः । अविन्द उस्रिया अनु ॥

हे इन्द्र! तू अपने प्रचण्ड बलों से दृढ़ जमी हुई बाधा को भी चीर देता है; और गुप्त गुहा में भी तू खोजकर क्रम से उष्रिया—दीप्तिमान रश्मियों (गौओं) को—अग्निमय वह्नियों के द्वारा प्रकट कर देता है।

Mantra 6

देवयन्तो यथा मतिमच्छा विदद्वसुं गिरः । महामनूषत श्रुतम् ॥

देव-यन्त—देव की खोज में लगे हुए—हमारे प्रेरित स्तोत्र-वचन उस जाग्रत मति की ओर सीधा बढ़ते हैं जो सत्य-धन को पा लेती है; उन्होंने ‘महान्’—विस्तारमय, श्रुत—सुप्रसिद्ध सत्य—का गान किया है।

Mantra 7

इन्द्रेण सं हि दृक्षसे संजग्मानो अबिभ्युषा । मन्दू समानवर्चसा ॥

इन्द्र के साथ ही तू संयुक्त रूप में दीखता है—अभिभ्युषा, न झुकने वाली (आत्म-शक्ति) के साथ संगत होकर; हे मन्दू! तू समान-वर्चसा—एक ही तेज में, सम-दीप्ति से—गतिमान होता है।

Mantra 8

अनवद्यैरभिद्युभिर्मखः सहस्वदर्चति । गणैरिन्द्रस्य काम्यैः ॥

अनवद्य, अभिद्युभि (स्वर्ग-प्रेरक) शक्तियों से युक्त मख (यज्ञ-बल) प्रचुर सामर्थ्य में स्तुति-गीत का उच्चारण करता है; इन्द्र के काम्य (इच्छित) गणों के साथ (जुड़ने और उन्नत होने की) कामना करता है।

Mantra 9

अतः परिज्मन्ना गहि दिवो वा रोचनादधि । समस्मिन्नृञ्जते गिरः ॥

अतः, हे परिज्मन् (सर्वत्र गमन करने वाले), इधर आ—या तो दिव के रोचन (दीप्तिमान) लोक से, या उसके ऊपर के प्रकाशमय प्रदेश से; इसी में (हमारे यज्ञ में) प्रेरित वाणियाँ (गिरः) समस्वर होकर तेरे लिए सजाई जाती हैं।

Mantra 10

इतो वा सातिमीमहे दिवो वा पार्थिवादधि । इन्द्रं महो वा रजसः ॥

इतो वा हम साती (विजय) की याचना करते हैं—या तो दिव के प्रकाशमय लोक से, या पार्थिव आधार से; अथवा महो रजसः (विशाल अन्तरिक्ष-लोकों) से हम इन्द्र को पुकारते हैं कि वह विजय को हमारे भीतर स्थापित करे।

Frequently Asked Questions

It praises Indra as the power of victory and illumination, using imagery of a radiant force being “yoked” and the heavenly light-realms (rocanā) shining. The hymn asks Indra to grant successful attainment (sāti) in life and ritual.

Rocanā points to luminous heavenly regions and the manifestation of light that accompanies Indra’s cosmic victories. Symbolically, it also suggests inner clarity that appears when obstacles are broken.

It can be recited as an Indra-stuti for strength, protection, and success—especially in morning worship or yajña contexts. The focus is on calling Indra’s victorious energy and aligning one’s thought and speech with that power.

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