Rig Veda Sukta 59
Mandala 1Sukta 597 Mantras

Sukta 59

Sukta 1.59

Rishi

Bharadvāja Bārhaspatya (traditional for RV 1.59)

Devata

Agni Vaiśvānara

Chandas

Triṣṭubh (11-syllable pādas, standard for many Agni hymns here)

यह सूक्त अग्नि को वैश्वानर—उस सार्वभौम अग्नि के रूप में स्तुत करता है जिसमें अन्य सभी अग्नियाँ आनन्दित होती हैं—और मानव बस्तियों की “नाभि” (केन्द्रीय बन्धन) के रूप में, जो लोगों को धर्मानुसार उचित क्रम में बाँधकर रखती है। इसमें अग्नि को प्रेरित होतृ कहा गया है, जो प्राचीन, महान स्तुतियों और हवियों को देवताओं तक पहुँचाता है, और भारद्वाज-वंश तथा समस्त जनों को बल, समृद्धि और सुव्यवस्थित जीवन प्रदान करता है।

Sanskrit recitationRig Veda 1.59

Mantras

Mantra 1

वया इदग्ने अग्नयस्ते अन्ये त्वे विश्वे अमृता मादयन्ते । वैश्वानर नाभिरसि क्षितीनां स्थूणेव जनाँ उपमिद्ययन्थ ॥

हे अग्ने, सचमुच तेरे ही भीतर अन्य सब अग्नियाँ—वे सब अमृत—आनन्द पाती हैं। हे वैश्वानर, तू क्षितियों (निवास-स्थानों/लोकों) की नाभि है; स्तम्भ के समान तू जनों को एकत्र थामता है और उन्हें मर्यादा व सम्यक् क्रम की ओर ले चलता है।

Mantra 2

मूर्धा दिवो नाभिरग्निः पृथिव्या अथाभवदरती रोदस्योः । तं त्वा देवासोऽजनयन्त देवं वैश्वानर ज्योतिरिदार्याय ॥

अग्नि दिव का मूर्धा और पृथ्वी की नाभि बना; तब वह दोनों लोकों के बीच अरति (सक्रिय प्रेरक) होकर स्थित हुआ। देवों ने तुझे, हे देव वैश्वानर, उत्पन्न किया—आर्य के लिए तू निश्चय ही ज्योति है।

Mantra 3

आ सूर्ये न रश्मयो ध्रुवासो वैश्वानरे दधिरेऽग्ना वसूनि । या पर्वतेष्वोषधीष्वप्सु या मानुषेष्वसि तस्य राजा ॥

जैसे सूर्य में स्थिर किरणें, वैसे ही वैश्वानर अग्नि में वसुओं (समस्त ऐश्वर्यों) के धन दृढ़ होकर स्थापित हैं। जो कुछ पर्वतों में, औषधियों में, जलों में, और जो कुछ मनुष्यों में है—उस समस्त का तू ही राजा है।

Mantra 4

बृहती इव सूनवे रोदसी गिरो होता मनुष्यो न दक्षः । स्वर्वते सत्यशुष्माय पूर्वीर्वैश्वानराय नृतमाय यह्वीः ॥

जैसे अपने पुत्र के लिए विशाल दो लोक (द्यावा-पृथिवी), वैसे ही वाणी प्रवाहित होती है—अग्नि होता, मनुष्य के समान दक्ष। स्वर्वान् (प्रकाश-लोक के स्वामी), सत्य-शुष्म (सच्चे बल) के लिए, प्राचीन, प्रबल, वेगवती स्तुतियाँ वैश्वानर—अत्यन्त नर-श्रेष्ठ नायक—की ओर उमड़ती हैं।

Mantra 5

दिवश्चित्ते बृहतो जातवेदो वैश्वानर प्र रिरिचे महित्वम् । राजा कृष्टीनामसि मानुषीणां युधा देवेभ्यो वरिवश्चकर्थ ॥

हे जातवेदस् वैश्वानर! विशाल द्युलोक से भी परे तक तेरा महत्त्व उमड़ पड़ा है। तू मनुष्यों की जातियों का राजा है; अपने युद्ध-बल से तूने देवों के लिए विस्तृत स्थान और निर्बाध मार्ग बना दिया है।

Mantra 6

प्र नू महित्वं वृषभस्य वोचं यं पूरवो वृत्रहणं सचन्ते । वैश्वानरो दस्युमग्निर्जघन्वाँ अधूनोत्काष्ठा अव शम्बरं भेत् ॥

अब मैं उस वृषभ (बलवान्) की महिमा का उच्चारण करता हूँ, जिसे पूरुजन वृत्र-हन् (विघ्न-विनाशक) मानकर अनुसरण करते हैं। वैश्वानर अग्नि ने दस्यु-बल को संहारकर बन्धनों/अवरोधों को झकझोर कर ढीला किया और शम्बर को तोड़ डाला।

Mantra 7

वैश्वानरो महिम्ना विश्वकृष्टिर्भरद्वाजेषु यजतो विभावा । शातवनेये शतिनीभिरग्निः पुरुणीथे जरते सूनृतावान् ॥

वैश्वानर अपनी महिमा से समस्त जनों का रचयिता, भरद्वाजों के यज्ञों में वन्दनीय, व्यापक-दीप्तिमान है। शत-वन (शत-लाभ) की प्राप्ति में अपनी शत-शक्तियों सहित अग्नि अनेक नीतियों/नेतृत्वों में स्थिर रहता (दीर्घकाल तक टिकता) है—सूनृता (सत्य-मंगल वाणी) से सम्पन्न।

Frequently Asked Questions

Vaiśvānara is Agni as the universal fire shared by all people—present in homes, in sacrifice, and as a cosmic power that holds communities together.

It means Agni is the central bond of settled life: the hearth and ritual fire around which order, unity, and right measure (ṛta) are established.

It can be recited during lighting a lamp or tending a sacred fire, with a simple ghee offering, to invoke clarity, inner strength, and harmony in the household or community.

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