
Sukta 1.57
Vasiṣṭha Maitrāvaruṇi
Indra
Triṣṭubh
यह छह-ऋचा त्रिष्टुभ सूक्त इन्द्र की स्तुति करता है—उन्हें अपरिमेय दाता कहा गया है, जिनकी ‘कठिन-से-धारण होने वाली’ उदारता सब प्राणियों के लिए प्रवाहित होती है। इसमें उनके निर्णायक विजय-कर्म का स्मरण है: वज्र से महान् पर्वत को चीरकर उन्होंने रोके हुए जल को मुक्त किया और इस प्रकार जगत का पोषण किया। कवि समुदाय को इन्द्र पर आश्रित बताता है और उनसे प्रार्थना करता है कि वे उनकी वाणी स्वीकारें तथा उनके जीवन और बल को समर्थ करें।
Mantra 1
प्र मंहिष्ठाय बृहते बृहद्रये सत्यशुष्माय तवसे मतिं भरे । अपामिव प्रवणे यस्य दुर्धरं राधो विश्वायु शवसे अपावृतम् ॥
मैं अपनी मति (विचार/स्तुति) उस परम-उदार, महान्, विशाल-धन के धारक, सत्य-शुष्म (सच्चे पराक्रम) वाले, बलवान् के लिए अर्पित करता हूँ। ढलान पर बहते जल की भाँति, जिसका दुर्धर (कठिन-से-धारणीय) राधस् (दान/समृद्धि) विश्वायु (सबके जीवन) के लिए, स्थायी शौर्य-बल के लिए, खुलकर प्रवाहित हो उठा है।
Mantra 2
अध ते विश्वमनु हासदिष्टय आपो निम्नेव सवना हविष्मतः । यत्पर्वते न समशीत हर्यत इन्द्रस्य वज्रः श्नथिता हिरण्ययः ॥
तब यज्ञ के अनुष्ठान में समस्त (जन/देव) तुम्हारे पीछे चले; हविष्मान् यजमान के सवनों (सोम-निष्पेषण) की ओर जल निम्न स्थान की ओर जैसे दौड़ते हैं वैसे ही आए। जब हर्यत (मनोरम) इन्द्र का हिरण्यय (स्वर्णमय) वज्र पर्वत पर भी न ठहरा, अपितु उसे चूर-चूर कर विदीर्ण कर गया।
Mantra 3
अस्मै भीमाय नमसा समध्वर उषो न शुभ्र आ भरा पनीयसे । यस्य धाम श्रवसे नामेन्द्रियं ज्योतिरकारि हरितो नायसे ॥
इस भीम (भयानक-पराक्रमी) के लिए यज्ञ में नमस्कार सहित समिधा/हविः अर्पित करो; उषा के समान उज्ज्वल, पनीय (प्रिय/पूज्य) अर्पण ले आओ। जिसका धाम श्रवस् (यश) के लिए है; जिसका नाम ऐन्द्रिय (अधिपत्य-शक्ति) है; नय (अग्रसरता) के लिए ज्योति रची गई है—जैसे हरित (हरितवर्ण) अश्व यात्रा हेतु जुते हों।
Mantra 4
इमे त इन्द्र ते वयं पुरुष्टुत ये त्वारभ्य चरामसि प्रभूवसो । नहि त्वदन्यो गिर्वणो गिरः सघत्क्षोणीरिव प्रति नो हर्य तद्वचः ॥
ये ये इन्द्र, ये हम—पुरुष्टुत (बहु-स्तुत्य)—तेरे ही हैं; हे प्रभूवसो, तेरा आश्रय लेकर हम तेरे प्रभुत्व में विचरते हैं। हे गिर्वण (स्तुति-प्रिय), तुझसे अन्य कोई हमारी गिरः (स्तुतियाँ) पृथ्वी की भाँति भार सहकर धारण नहीं कर सकता; अतः हमारे इस वचन को स्वीकार कर।
Mantra 5
भूरि त इन्द्र वीर्यं तव स्मस्यस्य स्तोतुर्मघवन्काममा पृण । अनु ते द्यौर्बृहती वीर्यं मम इयं च ते पृथिवी नेम ओजसे ॥
हे इन्द्र, तेरा वीर्य (पराक्रम) अत्यन्त प्रचुर है; हम तो तेरे ही हैं। हे मघवन्, इस स्तोता की कामना पूर्ण कर। तेरे पराक्रम के अनुगमन में यह विशाल द्यौः (स्वर्ग) और यह पृथ्वी भी तेरे ओज के लिए मर्यादा में चलती हैं।
Mantra 6
त्वं तमिन्द्र पर्वतं महामुरुं वज्रेण वज्रिन्पर्वशश्चकर्तिथ । अवासृजो निवृताः सर्तवा अपः सत्रा विश्वं दधिषे केवलं सहः ॥
हे इन्द्र, हे वज्रिन्, तूने उस महान्, विस्तीर्ण पर्वत को वज्र से चीर दिया, उसके संधि-स्थानों को तोड़ डाला। तूने रोकी हुई जलधाराओं को नीचे की ओर छोड़ दिया कि वे प्रवाहित हों; और तू अपने एकाकी, संहत सहस् (बल) से सर्वत्र इस समस्त जगत् को धारण करता है।
It praises Indra as the great giver and obstacle-breaker, recalling how he split the mountain with the thunderbolt and released the blocked waters—symbolizing restored flow of life and prosperity.
In Vedic imagery, ‘waters’ stand for rain, fertility, inspiration, and abundance. Indra releasing them means removing constraints so life can flourish again.
It can be recited as a strength-and-obstacle-removal prayer—especially before important work—asking for clear energy, steady support, and the unhindered flow of resources and understanding.
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