Rig Veda Sukta 42
Mandala 1Sukta 4210 Mantras

Sukta 42

Sukta 1.42

Devata

Pūṣan

यह सूक्त पूषन् के प्रति एक यात्रा-प्रार्थना है, जिसमें उपासक उनसे निवेदन करता है कि वे मार्ग में आगे-आगे चलें, दुःख और संकट को दूर करें, तथा इच्छित गन्तव्य तक सुरक्षित पहुँचाएँ। इसमें पूषन् के संरक्षण में सुयशस्वी समृद्धि—जो धर्मपूर्वक अर्जित हो और धर्मपूर्वक भोगी जाए—की भी याचना है। अंत में विवाद नहीं, बल्कि शांतिपूर्ण स्तुति का भाव है, और स्थायी धन-सम्पदा की प्रार्थना की गई है।

Mantras

Mantra 1

सं पूषन्नध्वनस्तिर व्यंहो विमुचो नपात् । सक्ष्वा देव प्र णस्पुरः ॥

हे पूषन्, हमारे लिए मार्ग को समतल कर; हे विमोचन-नपात, दुःख-व्यथा को दूर कर। हे देव, हमारे आगे-आगे चल, हमारे सहचर-नेता बन।

Mantra 2

यो नः पूषन्नघो वृको दुःशेव आदिदेशति । अप स्म तं पथो जहि ॥

हे पूषन्, जो अहितकारी वृक (भेड़िया) हमें दुर्गति की ओर संकेत करता है—उसको हमारे लिए पथ से दूर कर, पथ से मार गिरा।

Mantra 3

अप त्यं परिपन्थिनं मुषीवाणं हुरश्चितम् । दूरमधि स्रुतेरज ॥

उस परिपन्थी को—जो चारों ओर से पथ रोकता है, जो हमारी संपदा का चोर है, जो अंध-चित्त विघ्नकर्ता है—हमारे मार्ग से हटाकर, हमारी सुमार्ग-धारा से परे, बहुत दूर धकेल दे।

Mantra 4

त्वं तस्य द्वयाविनोऽघशंसस्य कस्य चित् । पदाभि तिष्ठ तपुषिम् ॥

तू उस द्विविध-छल करने वाले—जो कोई भी हो—उस अमंगल-वक्ता, विपत्ति बुलाने वाले के विरुद्ध अपने चरण से उसके ऊपर खड़ा हो; उसकी दहकती शक्ति को दबा दे, उसे निष्प्रभ कर दे।

Mantra 5

आ तत्ते दस्र मन्तुमः पूषन्नवो वृणीमहे । येन पितॄनचोदयः ॥

हे अद्भुत पूषन्, हम तेरी उस रक्षक सहायता को, उस प्रेरित मन्तु (मार्गदर्शक बुद्धि) को अपने लिए चुनते हैं, जिसके द्वारा तूने पितृगण को चलाया—उन्हें सत्य पथ पर अग्रसर किया।

Mantra 6

अधा नो विश्वसौभग हिरण्यवाशीमत्तम । धनानि सुषणा कृधि ॥

तब, हे विश्व-सौभाग्यदाता, हे स्वर्ण-समृद्धि में परम धनी, हमारे लिए धन-रत्नों को सुसाध्य, सुसंपन्न कर दे—हम में सुखपूर्वक स्वामित्व और सम्यक् भोग की स्थापना कर।

Mantra 7

अति नः सश्चतो नय सुगा नः सुपथा कृणु । पूषन्निह क्रतुं विदः ॥

हमारे चिपकते बन्धनों के पार हमें ले चल; हमारे लिए सुगम गमन कर, हमारे लिए सुपथ बना। हे पूषन्, यहीं हमारे क्रतु (संकल्प/ऋत-प्रेरित बुद्धि) को जान और जाग्रत कर।

Mantra 8

अभि सूयवसं नय न नवज्वारो अध्वने । पूषन्निह क्रतुं विदः ॥

दीप्तिमय वृद्धि के सुयवस (उत्तम चरागाह) की ओर हमें ले चल; मार्ग में कोई नया ज्वर हमें न जकड़े। हे पूषन्, यहीं हमारे क्रतु को जान और उसे सम्यक् कर।

Mantra 9

शग्धि पूर्धि प्र यंसि च शिशीहि प्रास्युदरम् । पूषन्निह क्रतुं विदः ॥

हमें बल दे, हमें पूर्ण कर; प्रदान कर और बढ़ा; हमारी शक्तियों को तीक्ष्ण कर; और भीतर की भूख को तृप्त कर। हे पूषन्, यहीं हमारे क्रतु को जान और उसे सुव्यवस्थित कर।

Mantra 10

न पूषणं मेथामसि सूक्तैरभि गृणीमसि । वसूनि दस्ममीमहे ॥

हम पूषण से विवाद नहीं करते; सुगठित सूक्तों से हम उनका स्तवन करते हैं। उस अद्भुत (दस्म) से हम वसु—सच्चे धन—की याचना करते हैं।

Frequently Asked Questions

Pūṣan is the Vedic deity who guides people on roads and journeys, protects them from harm, and helps them reach their goal safely while granting well-being and prosperity.

Its main purpose is to ask for safe passage—Pūṣan going in front, clearing obstacles and distress—and to request stable, rightly gained wealth and good fortune.

It is traditionally suitable before starting a journey, at dawn, or as part of a simple fire offering or prayer when seeking protection, guidance, and successful outcomes without harm.

Read Rig Veda in the Vedapath app

Scan the QR code to open this directly in the app, with audio, word-by-word meanings, and more.

Continue reading in the Vedapath app

Open in App