Rig Veda Sukta 37
Mandala 1Sukta 3715 Mantras

Sukta 37

Sukta 1.37

Rishi

Kaṇva (Kaṇva lineage)

Devata

Maruts

Chandas

Gāyatrī (probable for opening of hymn; short 3-pāda structure typical)

यह सूक्त मरुतों—तूफ़ानी गण—की सजीव स्तुति है, जिनकी अजेय वेग-धारा, दीप्त रथ और भयावह सामर्थ्य से पृथ्वी तक काँप उठती है। कण्व ऋषि उन्हें उनकी सुव्यवस्थित शक्ति के साथ आने का आह्वान करते हैं, ताकि यजमानों में बल, हर्ष और ऋत के अनुकूल अग्रसर होने वाली प्रेरणा जागे। अंत में मरुतों के साथ सख्य-भाव की पुष्टि होती है और उनकी उल्लासपूर्ण महिमा से पोषित, पूर्ण आयु तक जीने की कामना प्रकट की जाती है।

Mantras

Mantra 1

क्रीळं वः शर्धो मारुतमनर्वाणं रथेशुभम् । कण्वा अभि प्र गायत ॥

हे कण्वो! मरुतों के उस गण का स्तवन-गान करो—जो बल-लीला में क्रीडामय, अजेय, और रथों पर शोभायमान है।

Mantra 2

ये पृषतीभिॠष्टिभिः साकं वाशीभिरञ्जिभिः । अजायन्त स्वभानवः ॥

वे जो चितकबरे अश्वों और भालों के साथ, साथ ही चमकते आभूषणों और गूँजती हुंकारों के साथ जन्मे—स्वयंज्योति, स्वभाव-दीप्त शक्तियाँ—वे ही मरुत हैं।

Mantra 3

इहेव शृण्व एषां कशा हस्तेषु यद्वदान् । नि यामञ्चित्रमृञ्जते ॥

यहीं उनके स्वर सुनाई देते हैं—हाथों में कोड़े चटकते हैं जब वे बोलते हैं। अपने गमन में वे एक विचित्र, अद्भुत व्यवस्था स्थापित करते हैं।

Mantra 4

प्र वः शर्धाय घृष्वये त्वेषद्युम्नाय शुष्मिणे । देवत्तं ब्रह्म गायत ॥

हे (मरुतों के) गण! तुम्हारे लिए—दीप्तिमान, वेगपूर्ण तेज से युक्त, बलशाली—देवदत्त ब्रह्म-वाणी का गान करो, ताकि वह दिव्य स्तुति हमारे भीतर उनकी शक्तियों को जगा दे।

Mantra 5

प्र शंसा गोष्वघ्न्यं क्रीळं यच्छर्धो मारुतम् । जम्भे रसस्य वावृधे ॥

मरुत-शर्ध का घोष करो—जो अग्न्य (अहिंसनीय) गौओं के बीच कल्याणकारी, क्रीड़ामय है; वह रस के मुख में ही बढ़ता है—आनन्द और बल के सार का पान करता हुआ।

Mantra 6

को वो वर्षिष्ठ आ नरो दिवश्च ग्मश्च धूतयः । यत्सीमन्तं न धूनुथ ॥

हे नर (मरुत-गण के वीरों)! तुममें कौन सर्वाधिक प्रबल है—जो दिव से और पृथ्वी के पथों से आए हो—जब तुम सीमाओं को मानो कुछ भी न हों, ऐसे झकझोर देते हो?

Mantra 7

नि वो यामाय मानुषो दध्र उग्राय मन्यवे । जिहीत पर्वतो गिरिः ॥

तुम्हारे गमन-पथ के लिए मनुष्य तुम्हारे उग्र मन्यु (क्रोध-शक्ति) का आधार रखता है। तुम्हारे अग्रसर वेग के दबाव से पर्वत और गिरि भी मानो झुककर हिल उठते हैं।

Mantra 8

येषामज्मेषु पृथिवी जुजुर्वाँ इव विश्पतिः । भिया यामेषु रेजते ॥

जिनके वेगवान धावों में पृथ्वी स्वयं थके हुए गृहपति की भाँति काँप उठती है; उनके यामों में वह भय से थरथराती है—इतना प्रबल है उनका सुव्यवस्थित आवेग।

Mantra 9

स्थिरं हि जानमेषां वयो मातुर्निरेतवे । यत्सीमनु द्विता शवः ॥

इन शक्तियों का जन्म निश्चय ही स्थिर है; इनका यौवन-बल माता से निकलकर प्रवाहित होता है। क्योंकि इनका शौर्य उन्हें बार-बार अनुगमन करता है—अग्रगमन में मानो दुगुना होता जाता है।

Mantra 10

उदु त्ये सूनवो गिरः काष्ठा अज्मेष्वत्नत । वाश्रा अभिज्ञु यातवे ॥

ऊर्ध्व उठती हैं वे युवतर वाणियाँ—स्तुतिगीत—जो गतिपथों पर काष्ठा (मार्ग-चिह्न) की भाँति तनी हुई हैं; और वाश्र (प्रबल) मरुत-शक्तियाँ, अपने ज्ञान में सुनिश्चित, अपने नियत प्रस्थान की ओर अग्रसर होती हैं।

Mantra 11

त्यं चिद्घा दीर्घं पृथुं मिहो नपातममृध्रम् । प्र च्यावयन्ति यामभिः ॥

उस दीर्घ और विस्तीर्ण ‘मिहः-नपात्’—कुहासे/धुंध की संतान—को भी, जो अमृध्र (अक्षत, अविनाशी) है, वे अपने यामों (गमन-प्रयाणों) से चलाते, हिलाते और आगे ढकेलते हैं; मरुत-शक्तियाँ अंधकार के विशाल क्षेत्र को सरकाकर मार्ग दे देती हैं।

Mantra 12

मरुतो यद्ध वो बलं जनाँ अचुच्यवीतन । गिरीँरचुच्यवीतन ॥

हे मरुतो, जब तुम्हारा बल छूट पड़ता है, तब तुम जनों को उनकी जड़ता से हिला देते हो; तुम पर्वतों को भी हिला देते हो—इतनी अजेय है तुम्हारी शक्ति की प्रेरणा।

Mantra 13

यद्ध यान्ति मरुतः सं ह ब्रुवतेऽध्वन्ना । शृणोति कश्चिदेषाम् ॥

जब मरुत् चलते हैं और पथ पर एक साथ वाणी करते हैं, तो निश्चय ही कोई उन्हें सुन लेता है।

Mantra 14

प्र यात शीभमाशुभिः सन्ति कण्वेषु वो दुवः । तत्रो षु मादयाध्वै ॥

अपने वेगवानों के साथ शीघ्र प्रस्थान करो; कण्वों के बीच तुम्हारे लिए स्तुति-दान और सेवा-कर्म उपस्थित हैं। वहीं—हाँ, वहीं—आनन्द करो।

Mantra 15

अस्ति हि ष्मा मदाय वः स्मसि ष्मा वयमेषाम् । विश्वं चिदायुर्जीवसे ॥

क्योंकि निश्चय ही तुम्हारे लिए हर्ष का स्थान है; और हम भी इन्हीं शक्तियों के अपने हैं—सम्पूर्ण आयु-पर्यन्त जीवन के लिए।

Frequently Asked Questions

The Maruts are a host of storm-deities—youthful, radiant, and powerful—who move together in disciplined companies, bringing wind, thunder, and rain, and protecting the worshipper.

It invites the Maruts to come with their irresistible energy, describes their awe-inspiring movement that shakes the world, and asks that their strength and joy support the worshipper throughout life.

It can be recited as an invocation for courage, momentum, and protection—especially with a simple fire offering (ghee) or a focused prayer for clearing obstacles and energizing right action.

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