
Sukta 1.28
Indra (with ritual implements personified in the frame)
यह सूक्त सोम-निष्पादन को एक जीवित, नादमय यज्ञकर्म के रूप में प्रस्तुत करता है। पेषण-शिला, उखल, पात्र और छलनी आदि उपकरणों का आवाहन किया जाता है कि वे जाग्रत होकर इन्द्र को जगाएँ और आहुति को प्रभावी बनाएं। कूटने और पेरने की श्रव्य लय को यह विजय-घोष के समान पवित्र ठहराता है, और अंत में सोम के सावधानीपूर्वक स्थानान्तरण तथा शोधन का वर्णन करता है, ताकि परिशोधित पेय देवता के लिए विधिपूर्वक प्रस्तुत किया जा सके।
Mantra 1
यत्र ग्रावा पृथुबुध्न ऊर्ध्वो भवति सोतवे । उलूखलसुतानामवेद्विन्द्र जल्गुलः ॥
जहाँ विस्तृत-आधार वाला ग्रावा (दबाने का पत्थर) सोम-निष्पादन के लिए सीधा उठ खड़ा होता है, वहाँ उलूखल में कूटने वालों का जल्गुल (कूटने की ध्वनि) इन्द्र को ज्ञात होता है—और हमारे भीतर उसकी शक्ति को जगा देता है।
Mantra 2
यत्र द्वाविव जघनाधिषवण्या कृता । उलूखलसुतानामवेद्विन्द्र जल्गुलः ॥
जहाँ दो पट्टे, मानो युग्म जंघाएँ, अधिषवण्या (दबाने की शय्या) के रूप में रखे जाते हैं, वहाँ उलूखलसुतानों का जल्गुल इन्द्र को ज्ञात होता है—उसकी विजयी ऊर्जा को पुकारता हुआ।
Mantra 3
यत्र नार्यपच्यवमुपच्यवं च शिक्षते । उलूखलसुतानामवेद्विन्द्र जल्गुलः ॥
जहाँ नारी अपच्यवम् और उपच्यवम्—नीचे-ऊपर की गतियाँ—सीखती है, वहाँ उलूखलसुतानों का जल्गुल इन्द्र को ज्ञात होता है—कौशल को शक्ति में रूपान्तरित करता हुआ।
Mantra 4
यत्र मन्थां विबध्नते रश्मीन्यमितवा इव । उलूखलसुतानामवेद्विन्द्र जल्गुलः ॥
जहाँ मन्थन-दण्ड को बाँधा जाता है और रस्सियों को वैसे ही साधा जाता है जैसे जुते हुए (अश्वों) को वश में किया जाता है—वहीं उलूखल-सेवकों की कूटने की झंकार इन्द्र को विदित होती है; अनुशासन ही शक्ति को युग्मित करता है।
Mantra 5
यच्चिद्धि त्वं गृहेगृह उलूखलक युज्यसे । इह द्युमत्तमं वद जयतामिव दुन्दुभिः ॥
हे छोटे उलूखल! चाहे तू घर-घर में काम में लाया जाए, फिर भी यहाँ अपना सबसे दीप्तिमान स्वर बोल—जैसे विजयियों का दुन्दुभि; ताकि अंतःस्थ जय की पुष्टि हो।
Mantra 6
उत स्म ते वनस्पते वातो वि वात्यग्रमित् । अथो इन्द्राय पातवे सुनु सोममुलूखल ॥
और सचमुच, हे वनस्पति-स्वामी! तेरे अग्रभाग पर भी वायु बहती है; तब, हे उलूखल! इन्द्र के पान हेतु सोम को सुना (निचोड़)—प्राण-वायु अर्पण को सहारा दे और बल उसमें प्रवेश करे।
Mantra 7
आयजी वाजसातमा ता ह्युच्चा विजर्भृतः । हरी इवान्धांसि बप्सता ॥
हे यज्ञार्ह (आयजी) दोनों, वाजसातमा—समृद्धि के परम विजेता! तुम ही ऊँचे उठाए गए हो और प्रवृत्त किए गए हो। इन्द्र के दो हरि अश्वों की भाँति तुम अन्धकारों को चबा-चबा कर नष्ट करते हो—हम में छिपी अस्पष्टता को तोड़ते हुए।
Mantra 8
ता नो अद्य वनस्पती ऋष्वावृष्वेभिः सोतृभिः । इन्द्राय मधुमत्सुतम् ॥
हे वनस्पती-स्वामी दोनों, आज बलवान सोतृ (रस-निष्पादक) दबाने वालों के साथ इन्द्र के लिए मधुमत् सोम को निचोड़ो—कि आनन्द की मधुरता हमारे भीतर के विजयी मनोबल को पोषित करे।
Mantra 9
उच्छिष्टं चम्वोर्भर सोमं पवित्र आ सृज । नि धेहि गोरधि त्वचि ॥
चम्वोः (कटोरों) में जो उच्छिष्ट शेष है उसे भर लाओ; सोम को पवित्र में उँडेलो। उसे गो-चर्म पर—गौ की त्वचा पर, उस दीप्त आवरण पर—स्थापित करो, ताकि आनन्द शुद्ध होकर प्रकाश-क्षेत्र में धारण हो।
It describes the Soma-pressing rite and treats the ritual tools—stone, mortar, bowls, and sieve—as sacred agents whose sound and action summon Indra and complete the offering.
In Vedic thought, correctly used ritual instruments carry intention and power; their rhythm and sound are a form of effective speech that helps the sacrifice succeed and draws the deity near.
The pavitra is the strainer/sieve that clarifies Soma. The hymn highlights pouring Soma through it and setting it on the cowhide so the drink becomes ritually pure and ready for offering.
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