
Sukta 1.182
Agastya Māna (traditional for this Aśvin cluster; confirm via Anukramaṇī for RV 1.182)
Aśvinau
Triṣṭubh
यह अश्विन-सूक्त युगल दिव्य वैद्यों को उनके शीघ्र रथ पर आगमन का आह्वान करता है, ताकि वे प्रेरित बुद्धि को प्राणवान करें और अपनी शुद्ध, दीप्तिमान सहायता से ‘सुकृत’—अर्थात् यथोचित/सही-करने वाली सिद्धि—प्रदान करें। इसमें उनके प्रसिद्ध उद्धार-कर्मों का स्मरण है—विशेषतः भयानक जल-मार्गों के पार तुग्र्य के पुत्र की रक्षा—और उसी स्मृत सहायता को वर्तमान याचना में बदलकर सोम-यज्ञ में पोषण, संकट पर विजय तथा स्थायी दानों की प्रार्थना की गई है।
Mantra 1
अभूदिदं वयुनमो षु भूषता रथो वृषण्वान्मदता मनीषिणः । धियंजिन्वा धिष्ण्या विश्पलावसू दिवो नपाता सुकृते शुचिव्रता ॥
यह सुव्यवस्थित बोध उत्पन्न हुआ है; अब इसे भूषित करो—तुम्हारा बलवान रथ आनन्दित हो, हे मनीषिणो (ज्ञानी)। धिया को प्राणित करते हुए, हे धिष्ण्य (दीप्त आसन की शक्तियो), हे विश्पलावसू (विस्तृत धन के स्वामी), हे दिवो नपाता (दिव्य पुत्रो), शुचिव्रता (शुद्ध व्रत वाले), सुकृत के लिए—सत्कर्म के निमित्त—आओ।
Mantra 2
इन्द्रतमा हि धिष्ण्या मरुत्तमा दस्रा दंसिष्ठा रथ्या रथीतमा । पूर्णं रथं वहेथे मध्व आचितं तेन दाश्वांसमुप याथो अश्विना ॥
हे अश्विनौ! तुम शक्ति में इन्द्र-सदृश, वेग में मरुत्-सदृश, तेजस्वी हो; अद्भुत-कर्मा, कर्मों में अति-निपुण, रथ-विद्या में श्रेष्ठ और रथ-स्वामी में सर्वोत्तम। तुम मधु-आनन्द से आचित पूर्ण रथ को वहन करते हो; उसी के साथ दानशील यजमान के समीप आओ।
Mantra 3
किमत्र दस्रा कृणुथः किमासाथे जनो यः कश्चिदहविर्महीयते । अति क्रमिष्टं जुरतं पणेरसुं ज्योतिर्विप्राय कृणुतं वचस्यवे ॥
हे दस्रौ (अद्भुत-कर्मा)! यहाँ तुम क्या करोगे, क्या प्राप्त करोगे, जब कोई मनुष्य बिना हवि के ही महिमा चाहता है? अन्धकार के पणी (व्यापारी/कपट-कर्ता) के प्राण को लाँघकर दबाओ, उसे क्षीण करो; विप्र के लिए—वचस्यु (सत्य-वाणी चाहने वाले) के लिए—ज्योति रचो।
Mantra 4
जम्भयतमभितो रायतः शुनो हतं मृधो विदथुस्तान्यश्विना । वाचंवाचं जरितू रत्निनीं कृतमुभा शंसं नासत्यावतं मम ॥
हे अश्विनौ! जो शत्रुबल चारों ओर से हम पर टूट पड़ता है, उसे हर दिशा से दबाकर चूर्ण करो; कलह के कुत्ते को मार गिराओ—ये तुम्हारे प्रसिद्ध कर्म हैं। गायक की प्रत्येक वाणी को रत्न-धारिणी बनाओ; हे नासत्यौ! मेरे दोनों—स्तुति और सत्य-प्रतिज्ञा—का पोषण करो।
Mantra 5
युवमेतं चक्रथुः सिन्धुषु प्लवमात्मन्वन्तं पक्षिणं तौग्र्याय कम् । येन देवत्रा मनसा निरूहथुः सुपप्तनी पेतथुः क्षोदसो महः ॥
तुम दोनों ने तौग्र्य के पुत्र के लिए नदियों में एक स्वयंधारित ‘प्लव’—पंखों वाला वहनकर्ता—रचा। उसी के द्वारा, देवोन्मुख मन से, तुमने उसे ऊपर उठाकर बाहर निकाला; सु-पंखों से युक्त होकर तुमने उसे महान् उफनते वेग/दबाव के पार पहुँचा दिया।
Mantra 6
अवविद्धं तौग्र्यमप्स्वन्तरनारम्भणे तमसि प्रविद्धम् । चतस्रो नावो जठलस्य जुष्टा उदश्विभ्यामिषिताः पारयन्ति ॥
तौग्र्य जलों के भीतर गिराया गया—आधार-रहित अन्धकार में धँसाया हुआ। जठल को प्रिय चार नावें, अश्विनों की प्रेरणा से प्रवर्तित होकर, उसे पार पहुँचाती हैं।
Mantra 7
कः स्विद्वृक्षो निःष्ठितो मध्ये अर्णसो यं तौग्र्यो नाधितः पर्यषस्वजत् । पर्णा मृगस्य पतरोरिवारभ उदश्विना ऊहथुः श्रोमताय कम् ॥
वह कौन-सा वृक्ष था जो बाढ़ के मध्य खड़ा था, जिसे पीड़ित तौग्र्य ने चारों ओर से जकड़ लिया? जैसे उड़ते मृग/पक्षी के दो पंखों को कोई थाम ले, वैसे ही, हे अश्विनो, तुमने उसे उठाकर बाहर निकाला—उसके रक्षण के लिए।
Mantra 8
तद्वां नरा नासत्यावनु ष्याद्यद्वां मानास उचथमवोचन् । अस्मादद्य सदसः सोम्यादा विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम् ॥
हे नरौ, हे नासत्यौ! जो कुछ तुम्हारे द्विविध सहायक अनुग्रह के विषय में बुद्धिमानों ने कहा है, वह तुम्हारे लिए सत्य हो। आज इस सोम-आसन से हम वांछित पोषण तथा विजयी अतिक्रमण को—दीर्घकाल तक टिकने वाले दानों सहित—प्राप्त करें।
The Aśvins (Nāsatyā) are twin Vedic deities known as swift riders and divine physicians. In this hymn they are praised as rescuers who quickly bring help, health, and safe passage.
It recalls how the Aśvins saved Tugrya’s son by providing a special conveyance—described as a ‘floater’ and ‘winged bearer’—to cross dangerous waters and escape overwhelming peril.
It asks that the Aśvins’ famed help become real “today” in the ritual: nourishment (iṣ), overcoming of hardship (vṛjana), and gifts that endure (jīradānu) from the Soma-seat.
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