Rig Veda Sukta 18
Mandala 1Sukta 189 Mantras

Sukta 18

Sukta 1.18

Rishi

Kakṣīvant Dairghatamasa (traditionally for RV 1.18)

Devata

Brahmaṇaspati

Chandas

Gāyatrī (probable for RV 1.18 opening; short compact verse typical of gāyatrī)

यह सूक्त पवित्र वाणी और याज्ञिक सामर्थ्य के स्वामी ब्रह्मणस्पति का आह्वान करता है कि वे सोम को “स्वर्णिम” करें और ऋषि को प्रेरित वाणी तथा प्रभावी यज्ञ के लिए योग्य बनाएं। यह सोम, इन्द्र और धर्मदायिनी शक्ति दक्षिणा सहित पाप, भ्रान्ति और संकुचन से रक्षा की प्रार्थना करता है, ताकि अनुष्ठान स्तुति का प्रकाशमान, स्वर्ग-सदृश निवास बन जाए।

Sanskrit recitationRig Veda 1.18

Mantras

Mantra 1

सोमानं स्वरणं कृणुहि ब्रह्मणस्पते । कक्षीवन्तं य औशिजः ॥

हे ब्रह्मणस्पते! सोम को स्वर्ण-सा दीप्तिमान कर—चेतना का प्रकाश बना। और उशिज का वंशज कक्षीवन्त को प्रेरित वाणी के कर्म हेतु योग्य और तेजस्वी कर।

Mantra 2

यो रेवान्यो अमीवहा वसुवित्पुष्टिवर्धनः । स नः सिषक्तु यस्तुरः ॥

जो तेजस्वी समृद्धि से युक्त है, जो अमीव (अन्तर-रोग/क्लेश) का हन्ता है, जो वसु का सच्चा वित् (खोजनेवाला) और पुष्टि-वर्धन करनेवाला है—वह त्वरित (तुर) शक्ति हमसे जुड़ जाए और हमें आगे प्रवृत्त करे।

Mantra 3

मा नः शंसो अररुषो धूर्तिः प्रणङ्मर्त्यस्य । रक्षा णो ब्रह्मणस्पते ॥

हम पर शत्रु का शंस (दुष्प्रचार/घोष) और अररुष (क्रोधी) धूर्ति—मर्त्य की छल-आघात—न पड़े। हे ब्रह्मणस्पति, हमारी रक्षा करो।

Mantra 4

स घा वीरो न रिष्यति यमिन्द्रो ब्रह्मणस्पतिः । सोमो हिनोति मर्त्यम् ॥

वह वीर निश्चय ही नष्ट नहीं होता—जिसे इन्द्र और ब्रह्मणस्पति प्रेरित करते हैं; और सोम भी मर्त्य को आगे हिनोति (उत्साहित/प्रेरित) करता है। बल, सत्य-वाक् और आनन्द एक हों तो मर्त्य विजय की ओर धकेला जाता है।

Mantra 5

त्वं तं ब्रह्मणस्पते सोम इन्द्रश्च मर्त्यम् । दक्षिणा पात्वंहसः ॥

हे ब्रह्मणस्पते! तुम—सोम और इन्द्र के साथ—उस मर्त्य की रक्षा करो, उसे अंहस (पाप/दोष) की संकुचनकारी ग्रंथि से बचाओ। और दक्षिणा—सत्-दान की शक्ति—उसे सन्मार्ग के यथार्थ विनिमय में स्थापित करके उसकी रक्षा करे।

Mantra 6

सदसस्पतिमद्भुतं प्रियमिन्द्रस्य काम्यम् । सनिं मेधामयासिषम् ॥

मैंने सभा के अद्भुत स्वामी को—जो इन्द्र को प्रिय और वांछनीय है—प्राप्त करने का यत्न किया है, ताकि वह हमें मेधा का लाभ दे: वह गठित बुद्धि जो सत्य को धारण करती और क्रम में रखती है।

Mantra 7

यस्मादृते न सिध्यति यज्ञो विपश्चितश्चन । स धीनां योगमिन्वति ॥

जिसके बिना यज्ञ सिद्ध नहीं होता—स्पष्टदर्शी ऋषि के लिए भी—वही धियों के योग को बढ़ाता है; वही हमारी धि को ऋत-व्यवस्था के साथ यथायोग्य युक्त करता है।

Mantra 8

आदृध्नोति हविष्कृतिं प्राञ्चं कृणोत्यध्वरम् । होत्रा देवेषु गच्छति ॥

वह हवि-तैयारी (हविष्कृति) को दृढ़ और पूर्ण करता है; वह अध्वर (यज्ञ-पथ) को आगे की ओर प्रवृत्त करता है। होतृ-शक्ति से वह देवों के बीच गमन करता है—मनुष्य-वाणी और देव-श्रवण के बीच उचित मार्ग स्थापित करता हुआ।

Mantra 9

नराशंसं सुधृष्टममपश्यं सप्रथस्तमम् । दिवो न सद्ममखसम् ॥

मैंने नराशंस को देखा है—अत्यन्त सुदृढ़, अत्यन्त व्यापक; जैसे दिव्य सद्म (स्वर्गीय गृह) यज्ञ के लिए—एक देव-निवास, जहाँ हवि हमारे भीतर प्रकाशमय धाम बन जाती है।

Frequently Asked Questions

Brahmaṇaspati is the lord of sacred speech and priestly power. The hymn asks him to make the prayer effective, remove obstacles, and ensure the sacrifice succeeds.

It means making Soma radiant and fit for offering—both as a physical libation and as a symbol of clarified, luminous awareness that supports true speech and right action.

Indra represents victorious force that helps overcome resistance, while Dakṣiṇā represents the right gift and right exchange that stabilizes the ritual. Together they protect the sacrificer from error and misfortune.

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