
Sukta 1.178
Indra
Trishtubh (probable; requires metrical verification)
यह संक्षिप्त इन्द्र-सूक्त देव की “तत्पर श्रवण-शक्ति” (श्रुष्टि) को लक्ष्य करके सीधी प्रार्थना है। कवि इन्द्र से निवेदन करता है कि उपासक की बढ़ती अभिलाषा की उपेक्षा न करें और सर्वव्यापी धन तथा बल प्रदान करें। इन्द्र की स्तुति युद्ध-विजेता और गायक की पुकार को ध्यान से सुनने वाले के रूप में की गई है—जो उदार यजमान के लिए रथ को आगे बढ़ाते हैं और अपने भक्तों की रक्षा गर्वीले शत्रुओं से करते हैं। इस स्तोत्र का प्रयोजन व्यावहारिक और भक्तिमय है: स्तुति और अर्पण के द्वारा संरक्षण, विजय और स्थायी समृद्धि प्राप्त करना।
Mantra 1
यद्ध स्या त इन्द्र श्रुष्टिरस्ति यया बभूथ जरितृभ्य ऊती । मा नः कामं महयन्तमा धग्विश्वा ते अश्यां पर्याप आयोः ॥
यदि, हे इन्द्र, तेरे पास वह तत्पर श्रवण है—जिससे तू स्तोताओं के लिए सहायता बना है—तो हमारे बढ़ते हुए कामना-भाव को दूर न कर। हे आयुः (जीवन-शक्ति), मैं तेरे समस्त धन-वैभव को, चारों ओर से घेरकर, प्राप्त करूँ।
Mantra 2
न घा राजेन्द्र आ दभन्नो या नु स्वसारा कृणवन्त योनौ । आपश्चिदस्मै सुतुका अवेषन्गमन्न इन्द्रः सख्या वयश्च ॥
निश्चय ही राजन् इन्द्र हमें छलते नहीं—वे जो बहिनी-शक्तियों को उनके ही योनि-गर्भ में एक कर देते हैं। उनके लिए तो आपः (जल-देवताएँ) भी सुखद विश्राम पा लेती हैं; इन्द्र सख्य-भाव के साथ और जीवन-बल (वयस्) सहित हमारे पास आएँ।
Mantra 3
जेता नृभिरिन्द्रः पृत्सु शूरः श्रोता हवं नाधमानस्य कारोः । प्रभर्ता रथं दाशुष उपाक उद्यन्ता गिरो यदि च त्मना भूत् ॥
नरों के साथ युद्धों में इन्द्र—शूर—विजेता हैं; वे परिश्रमरत गायक (कारु) की पुकार (हव) सुनते हैं। निकट उपस्थित दाता के लिए वे रथ को आगे बढ़ाते हैं—जब स्तुतियाँ उठती हैं, यदि वे अपने स्व-बल (त्मना) से वैसे हो उठें।
Mantra 4
एवा नृभिरिन्द्रः सुश्रवस्या प्रखादः पृक्षो अभि मित्रिणो भूत् । समर्य इषः स्तवते विवाचि सत्राकरो यजमानस्य शंसः ॥
इसी प्रकार नरों में स्थित शक्तियों के साथ इन्द्र सुश्रवस्य—उज्ज्वल कीर्ति—के अग्रगामी भेदक बनते हैं; वे मित्रिणः—मैत्रीपूर्ण शक्तियों—के सम्मुख होते हैं। समर में बल की प्रेरणाएँ (इषः) विविध वाणी में स्तुत होती हैं; यजमान का शंस—प्रशंसन—सत्राकृत्, सीधा और अविच्छिन्न करने वाला, बनता है।
Mantra 5
त्वया वयं मघवन्निन्द्र शत्रूनभि ष्याम महतो मन्यमानान् । त्वं त्राता त्वमु नो वृधे भूर्विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम् ॥
हे मघवन् इन्द्र! तेरे साथ हम उन शत्रुओं का सामना करें और उन्हें पार कर जाएँ, जो अपने को महान मानते हैं। तू ही रक्षक है; हमारे वर्धन के लिए हो। हम उस प्रेरक वेग को, उस विजयी अग्रगति को, और उस चिर-दानु (स्थायी दान देने वाले) को प्राप्त करें, जो संघर्ष-समूह (वृजन) को जीतने वाला है।
The poet asks Indra to listen quickly, not to disregard the worshipper’s growing aspiration, and to grant protection, victory over enemies, and wide, lasting prosperity.
Because Indra is portrayed as responding to sincere invocation—he hears the singer’s cry in need and turns that praise into practical help such as strength, victory, and support.
It can be recited as a focused prayer before difficult tasks or conflicts, asking for courage, clarity, and protection—symbolically ‘overcoming proud enemies’ both outside and within.
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