
Sukta 1.151
Mitra-Varuṇa (dual) (probable from dual forms and Mitra mention)
यह सूक्त मित्र और वरुण की स्तुति करता है—प्रिय युगल अधिपति, जो ऋत (ब्रह्माण्डीय व्यवस्था) को धारण करते हैं और जन्म से ही प्राणियों की रक्षा करते हैं। वे द्रष्टा के वचन का उत्तर संरक्षण और वृद्धि देकर देते हैं। उनकी शक्ति ‘विस्तृत द्वार’ खोलती है, शुद्ध और पोषक धाराएँ प्रवाहित करती है, और उषा तथा सूर्यप्रकाश को प्रकट रूप में खींच लाती है; अंत में उनके अतुलनीय देवत्व और उदार दान की घोषणा की जाती है।
Mantra 1
मित्रं न यं शिम्या गोषु गव्यवः स्वाध्यो विदथे अप्सु जीजनन् । अरेजेतां रोदसी पाजसा गिरा प्रति प्रियं यजतं जनुषामवः ॥
मित्र के समान—जिसे गो-सम्पदा के साधक, स्वाध्य (स्व-नियम) से, विदथ (यज्ञ-सभा) में, अप्सु (जल-तत्त्व) में, अपने श्रम से जन्म देते हैं—वैसे ही दोनों लोक (रोदसी) तेज से कम्पित हो उठते हैं। वाणी द्वारा वे प्रिय और यज्य युगल को प्रत्युत्तर देते हैं—जो जन्म से ही प्राणियों के रक्षक (अवः) हैं।
Mantra 2
यद्ध त्यद्वां पुरुमीळ्हस्य सोमिनः प्र मित्रासो न दधिरे स्वाभुवः । अध क्रतुं विदतं गातुमर्चत उत श्रुतं वृषणा पस्त्यावतः ॥
जब वे सोम-निचोड़ने वाले, पुरुमीळ्ह (बहु-प्रशंसित) अनुग्रह की कामना करते हुए, मित्रों की भाँति, स्वयंसिद्ध होकर, तुम्हारे कर्म-बल को आगे रखते हैं—तब वे तुम्हारे क्रतु (संकल्प-शक्ति) का स्तवन करते हैं और गमन-पथ को पा लेते हैं। और हे वृषणौ (दो वीर), तुम उन्हें श्रुत (श्रवण-योग्य/प्रसिद्ध) करते हो और उनके अपने गृह-आश्रय (पस्त्या) में स्थिर करते हो।
Mantra 3
आ वां भूषन्क्षितयो जन्म रोदस्योः प्रवाच्यं वृषणा दक्षसे महे । यदीमृताय भरथो यदर्वते प्र होत्रया शिम्या वीथो अध्वरम् ॥
हे वृषणा (दो पराक्रमी), जन्म से ही दोनों लोकों (रोदसी) में स्थित प्रजाएँ तुम्हारे पास भूषण सहित और वह वाणी लेकर आती हैं जो उच्चरित होनी चाहिए—तुम्हारी महती दक्षता और सामर्थ्य के लिए। जब तुम उसे ऋत (सत्य-नियम) के लिए वहन करते हो, जब अश्ववत् शीघ्रगामी के लिए—तब होत्र (याज्ञिक-क्रिया) से और शिम्या (परिश्रम/उद्यम) से तुम अध्वर (यज्ञ) को आगे बढ़ाते हो।
Mantra 4
प्र सा क्षितिरसुर या महि प्रिय ऋतावानावृतमा घोषथो बृहत् । युवं दिवो बृहतो दक्षमाभुवं गां न धुर्युप युञ्जाथे अपः ॥
यह महती और प्रिय क्षिति (सत्ता/अधिकार), हे असुर-शक्तियों, तुम ऋतवान होकर ‘वृहत्’—विस्तीर्ण ऋत—के रूप में घोषित करते हो। तुम दोनों विस्तृत द्यौ (आकाश) की महान दक्षता बन गए हो; और तुम आपः (जल-धाराएँ) को, जैसे धुर्य गौ (जुए में जुती बैल/गाय) को, जुए पर जोड़ते हो—धाराओं को कर्म के अधीन कर देते हो।
Mantra 5
मही अत्र महिना वारमृण्वथोऽरेणवस्तुज आ सद्मन्धेनवः । स्वरन्ति ता उपरताति सूर्यमा निम्रुच उषसस्तक्ववीरिव ॥
यहाँ, अपनी महिमा से तुम विशाल द्वार खोलते हो; निर्मल, प्रेरक धाराएँ पोषक गौओं की भाँति सद्म (आसन/निवास) की ओर आती हैं। वे सूर्य की ओर ऊपर गूँजती हैं; और उषाएँ तीव्रगामी पक्षियों-सी निम्रुच् (अवरोहण) के साथ प्रकट होती हुई हमारे क्षेत्र में प्रकाश का अवतरण लाती हैं।
Mantra 6
आ वामृताय केशिनीरनूषत मित्र यत्र वरुण गातुमर्चथः । अव त्मना सृजतं पिन्वतं धियो युवं विप्रस्य मन्मनामिरज्यथः ॥
ऋत (सत्य-नियम) के लिए, केशिनी—दीप्त-केशवाली प्रेरणाशक्तियाँ—तुम्हारी ओर गान करती हैं, हे मित्र; जहाँ, हे वरुण, तुम मार्ग का स्तवन करते हो। अपने ही स्वभाव से हमारी धियों (विचार-प्रेरणाओं) को मुक्त करो और पुष्ट करो; तुम दोनों विप्र के मन्मन् (अंतर्मन की रचनाओं) में अनुरक्त होते हो।
Mantra 7
यो वां यज्ञैः शशमानो ह दाशति कविर्होता यजति मन्मसाधनः । उपाह तं गच्छथो वीथो अध्वरमच्छा गिरः सुमतिं गन्तमस्मयू ॥
जो यज्ञों द्वारा बल पाकर तुम्हें दान देता है—वह कवि, होता, मन्मसाधन (अंतर्वाणी-सिद्ध) होकर यजन करता है। उसी के पास तुम दोनों जाते हो; अध्वर की वीथ (यात्रा-पथ) पर, स्तुतियों की ओर आओ—हम, तुम्हें चाहने वालों के लिए, अपनी सुमति (उज्ज्वल सद्भावना) सहित पहुँचो।
Mantra 8
युवां यज्ञैः प्रथमा गोभिरञ्जत ऋतावाना मनसो न प्रयुक्तिषु । भरन्ति वां मन्मना संयता गिरोऽदृप्यता मनसा रेवदाशाथे ॥
तुम दोनों को यज्ञों से और गो-रश्मियों (प्रकाश-किरणों) से सबसे पहले अभिषिक्त किया जाता है—ऋत के धारक—जैसे मन अपने उचित योजनों में (सही जुती हुई प्रवृत्तियों में) रहता है। संयत स्तुतियाँ तुम्हारे पास अंतर्मन की रचनाएँ (मन्म) ले आती हैं; अविद्या-उन्माद और भ्रान्ति से रहित मन से तुम समृद्ध, दीप्तिमान पूर्णता प्रदान करते हो।
Mantra 9
रेवद्वयो दधाथे रेवदाशाथे नरा मायाभिरितऊति माहिनम् । न वां द्यावोऽहभिर्नोत सिन्धवो न देवत्वं पणयो नानशुर्मघम् ॥
तुम समृद्ध प्राण-बल को स्थापित करते हो; हे दोनो नरों, अपनी माया-शक्तियों (सुज्ञ रचना-शक्तियों) और निकट सहायताओं से तुम समृद्ध सिद्धि प्रदान करते हो। न तो दिनों सहित द्यौ (आकाश) ने, न नदियों ने, तुम्हारे देवत्व को पा लिया; और न ही अंधकार के पण्यु (व्यापारी) तुम्हारी दान-सम्पदा को जीत सके।
They are twin Vedic lords invoked together: Mitra represents friendship and agreement, and Varuṇa represents vast moral law and restraint. Together they protect beings and uphold cosmic order (ṛta).
It is a poetic image for removing obstruction and allowing the flow of life and light—pure streams, dawn, and the sun’s radiance—into the world and into the worshipper’s path.
The paṇis symbolize forces that hoard, obscure, or oppose the right order. The hymn declares that such forces cannot obtain Mitra-Varuṇa’s divine status or their generous gifts.
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