
Sukta 1.121
Hiraṇyastūpa Āṅgirasa (traditional attribution for RV 1.121, subject to recensional tradition)
Ka (Prajāpati / the Unknown God; hymn framed as inquiry into the Creator)
Triṣṭubh (dominant for RV 1.121)
ऋग्वेद 1.121 एक चिंतनशील सृष्टि-स्तोत्र है, जो प्रश्नों के माध्यम से जगत् की उत्पत्ति की ओर बढ़ता है और “क” (“कौन?”) कहकर संबोधित उस गुप्त प्रभु के चारों ओर घूमता है। यह स्रष्टा की धारण-शक्ति की स्तुति करता है—जो जीवन, प्राण और ऋत/व्यवस्था का दाता है—और इस जिज्ञासा को ही उपासना में बदलकर संरक्षण तथा समृद्धि की प्रार्थना करता है।
Mantra 1
कदित्था नॄँ: पात्रं देवयतां श्रवद्गिरो अङ्गिरसां तुरण्यन् । प्र यदानड्विश आ हर्म्यस्योरु क्रंसते अध्वरे यजत्रः ॥
वह देव-याजक मनुष्यों का पात्र कैसे बनता है—जो अङ्गिरसों की श्रुतिगीत-वाणी को सुनता है और शीघ्रता से दौड़ता है? जब वह आगे बढ़ता है, तब वह जनों को भी अग्रसर करता है; यज्ञ में यजनीय वह गृह-प्रदेश में उरु (विस्तृत) पग भरता है।
Mantra 2
स्तम्भीद्ध द्यां स धरुणं प्रुषायदृभुर्वाजाय द्रविणं नरो गोः । अनु स्वजां महिषश्चक्षत व्रां मेनामश्वस्य परि मातरं गोः ॥
उसने द्यौ को स्तम्भित किया और धरण (आधार) स्थापित किया; ऋभु ने वाज (समृद्धि) के लिए द्रविण (धन) निचोड़ा—गो के पुरुष ने। महिष ने स्वज (स्वयं-जन्मे) को देखा; उसने विस्तृत-कर्मिणी मेना को देखा—उसने गो की माता को, अश्विनी (घोड़ी) के गूढ़ स्रोत को, चारों ओर से घेर लिया।
Mantra 3
नक्षद्धवमरुणीः पूर्व्यं राट् तुरो विशामङ्गिरसामनु द्यून् । तक्षद्वज्रं नियुतं तस्तम्भद्द्यां चतुष्पदे नर्याय द्विपादे ॥
उसने अरुणी की प्राचीन ह्वान (पुकार) का प्रत्युत्तर दिया—वह राजा, जनों के लिए त्वरित, अङ्गिरसों के दिनों का अनुगामी। उसने नियुत (जुता हुआ) वज्र गढ़ा; उसने द्यौ को चतुष्पद के लिए और नर्य (मनुष्य) द्विपद के लिए स्तम्भित किया।
Mantra 4
अस्य मदे स्वर्यं दा ऋतायापीवृतमुस्रियाणामनीकम् । यद्ध प्रसर्गे त्रिककुम्निवर्तदप द्रुहो मानुषस्य दुरो वः ॥
इस (तेरे) बल के इस मद में, ऋत के लिए स्वर्ग्य, दीप्तिमान प्रकाश प्रदान कर—उष्रिया (दीप्त गौओं/किरणों) का वह मुख, जो रोका गया था और ढँक दिया गया था। क्योंकि जब अग्र-प्रसर्ग में त्रिककुम् (तीन-शिखरी शक्ति) (अवरोध को) पलट देती है, तब वह मनुष्य की द्रुह (कपट/द्रोह) को दूर हटा देती है और (बन्द) द्वारों को खोल देती है।
Mantra 5
तुभ्यं पयो यत्पितरावनीतां राधः सुरेतस्तुरणे भुरण्यू । शुचि यत्ते रेक्ण आयजन्त सबर्दुघायाः पय उस्रियायाः ॥
तेरे लिए वह पोषक पयः (दूध) और वह राधः (समृद्धि), जो दोनों पितरों ने लाकर दी—सुरेतस् (शुद्ध/उत्तम वीर्य), उस तु॒रण (शीघ्र) ऊर्जा के लिए जो हमें पार ले जाती है। और जो शुचि (उज्ज्वल) रेक्ण (धन/वैभव) उन्होंने तुझे अर्पित किए—सबर्दुघा (प्रचुर-दुग्धा) उस्रिया (दीप्त गौ/किरण) का पयः, अर्थात् प्रकाशमय पोषण-धारा।
Mantra 6
अध प्र जज्ञे तरणिर्ममत्तु प्र रोच्यस्या उषसो न सूरः । इन्दुर्येभिराष्ट स्वेदुहव्यैः स्रुवेण सिञ्चञ्जरणाभि धाम ॥
तब वह त॒रणि (पार ले जाने वाली) शक्ति जन्म लेती है; वह अपने ही सामर्थ्य से मत्त हो उठे; वह उषा पर सूर्य की भाँति प्रकाशित होती है। इन्दु (सोम) स्वयंदुहव्य (स्वतः खिंच आने वाली आहुतियों) के साथ, स्रुव (करछुल) से उँडेलता हुआ, अस्तित्व के स्थापित धामों/आसनों को सींच देता है।
Mantra 7
स्विध्मा यद्वनधितिरपस्यात्सूरो अध्वरे परि रोधना गोः । यद्ध प्रभासि कृत्व्याँ अनु द्यूननर्विशे पश्विषे तुराय ॥
जब सु-प्रज्वलित समिधा (स्विध्मा) अपनी सेवा-क्रिया (अपस्यात्) को सिद्ध करती है, तब यज्ञ में सूर्य गौ (गोः) के रोधन—उसके बाड़े/आवरण—के चारों ओर परिक्रमा करता है। और जब तू प्रकट होकर चमकता है, दिन-प्रतिदिन कृत्व्य (रचनेवाला श्रम) के अनुक्रम का अनुसरण करते हुए, तू अविच्छिन्न वृद्धि और पशुओं/धनों की त्वरित प्राप्ति (तुराय) के लिए आता है।
Mantra 8
अष्टा महो दिव आदो हरी इह द्युम्नासाहमभि योधान उत्सम् । हरिं यत्ते मन्दिनं दुक्षन्वृधे गोरभसमद्रिभिर्वाताप्यम् ॥
तूने दिव्य महत्त्व (महो दिवः) का आस्वादन किया है; यहाँ तू अपने दोनों हरि (हरी)—दो ताम्र/हरित बल—को उस उद्गम (उत्सम्) के लिए युद्ध में लगाता है जो द्युम्नों (तेजों) को जीतता है। जब वे तेरे लिए मन्दिन हरि—आनन्द-बल—को दुहते हैं, वृद्धि के लिए, प्रकाश-ग्रहण में वेगवान, अद्रि (पत्थरों) से पेरित, वायु-प्रेरित होकर।
Mantra 9
त्वमायसं प्रति वर्तयो गोर्दिवो अश्मानमुपनीतमृभ्वा । कुत्साय यत्र पुरुहूत वन्वञ्छुष्णमनन्तैः परियासि वधैः ॥
हे बलवान (ऋभ्वा), तू गौ (गोः) के सामने से आयस (लोहे) का अवरोध लौटा देता है; दिवः का वह अश्मान (स्वर्गीय शिला) जो नीचे लाया गया था, उसे भी। और जहाँ, हे पुरुहूत (बहु-आहूत), कुत्स के लिए तू पीछा करता हुआ, अनन्त वधों (अन्तैः वधैः) से शुष्ण के चारों ओर घूमता है—जब तक वह रुकावट टूट न जाए।
Mantra 10
पुरा यत्सूरस्तमसो अपीतेस्तमद्रिवः फलिगं हेतिमस्य । शुष्णस्य चित्परिहितं यदोजो दिवस्परि सुग्रथितं तदादः ॥
पूर्वकाल में, जब सूर्य अन्धकार के निगलने से छिप गया था, हे अद्रिवः (शिला-धारी), तूने उसकी भटकती हुई अस्त्र-हेति को गिराकर चूर कर दिया। और शुष्ण का वह बल भी, जो चारों ओर से—स्वर्ग के परे तक—दृढ़ ग्रन्थि की भाँति बाँध दिया गया था, उसे तूने तब छीन लिया और खोलकर तोड़ दिया।
Mantra 11
अनु त्वा मही पाजसी अचक्रे द्यावाक्षामा मदतामिन्द्र कर्मन् । त्वं वृत्रमाशयानं सिरासु महो वज्रेण सिष्वपो वराहुम् ॥
तेरे पीछे-पीछे महती तेजस्वी शक्तियाँ चक्रवत् प्रवृत्त हुईं; हे इन्द्र, तेरे कर्म में द्यावा-क्षामा (द्यौ और पृथ्वी) हर्षित होते हैं। तूने सिराओं (नाड़ियों/प्रवाह-मार्गों) में शयित वृत्र—उस महावरााह को—वज्र से मारा, और अवरुद्ध मार्गों को खोल दिया।
Mantra 12
त्वमिन्द्र नर्यो याँ अवो नॄन्तिष्ठा वातस्य सुयुजो वहिष्ठान् । यं ते काव्य उशना मन्दिनं दाद्वृत्रहणं पार्यं ततक्ष वज्रम् ॥
हे इन्द्र, तू नर्यों (मानवों/वीरों) के लिए उन सहायों के साथ खड़ा रहता है जो वीर्यवान हैं—सुसंयोजित, वायु के समान श्रेष्ठ वहनकर्ता। जो मन्दिन (आनन्ददायक) शक्ति तेरे लिए कवि उशना काव्य ने दी, उसी को उसने दूर तक पहुँचने वाले वृत्रहण वज्र के रूप में गढ़ा।
Mantra 13
त्वं सूरो हरितो रामयो नॄन्भरच्चक्रमेतशो नायमिन्द्र । प्रास्य पारं नवतिं नाव्यानामपि कर्तमवर्तयोऽयज्यून् ॥
हे इन्द्र! तू सूर्य के समान अपनी हरित (स्वर्णिम) शक्तियों से मनुष्यों को आनन्दित करता है; और तू चक्र को वैसे धारण करता है जैसे वेगवान अश्व उसे वहन करता है। तूने उन्हें पार के तट तक पहुँचा दिया—नौगम्य (नाव्या) नब्बे धाराओं के पार—और जो यज्ञ नहीं करते, उन अयज्युओं के गर्त को तूने दूर हटा दिया।
Mantra 14
त्वं नो अस्या इन्द्र दुर्हणायाः पाहि वज्रिवो दुरितादभीके । प्र नो वाजान्रथ्यो अश्वबुध्यानिषे यन्धि श्रवसे सूनृतायै ॥
हे वज्रिवन् इन्द्र! इस दुर्धर्ष दुःख से और निकट उपस्थित दुरित (वक्र त्रुटि-गति) से हमारी रक्षा कर। हमारे लिए वाज—बल-सम्पदाएँ—आगे बढ़ा दे: रथ्य (यात्रा-योग्य) और अश्व-बुध्य (अश्वों-से जाग्रत), हमारे पोषण के लिए, यशस्वी श्रवस् के लिए, और सूनृता (सत्य-मधुर वाणी) के लिए।
Mantra 15
मा सा ते अस्मत्सुमतिर्वि दसद्वाजप्रमहः समिषो वरन्त । आ नो भज मघवन्गोष्वर्यो मंहिष्ठास्ते सधमादः स्याम ॥
हे वाज-प्रमहा (सम्पदाओं के महान दाता)! हमारी ओर से तेरी सुमति (कल्याणकारी कृपा) विच्छिन्न न हो; वृद्धि की धाराएँ (समिषः) हमें चुनकर हमारे पास एकत्र हों। हे मघवन्! गोषु-अर्यः—दीप्तिमान गौओं/किरणों के धन—में हमें सहभागी कर; हम तेरे सधमाद (सामूहिक आनन्द) में तेरे सर्वाधिक समृद्ध सहचर हों।
“Ka” means “Who?” The hymn uses a sacred question to point to the Creator beyond ordinary names—Prajāpati as the hidden source and lord of all.
It is both. It reflects on creation and cosmic order, and it also functions as a yajña prayer asking for protection, prosperity, and steady divine favor.
It can be recited in a fire offering or as contemplative japa, focusing on gratitude for life and order, and ending with a clear petition for well-being, strength, and right direction.
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