Rig Veda Sukta 11
Mandala 1Sukta 118 Mantras

Sukta 11

Sukta 1.11

Rishi

Traditionally: Madhucchandas Vaiśvāmitra for RV 1.11

Devata

Indra

Chandas

Triṣṭubh (RV 1.11 is predominantly Triṣṭubh)

ऋग्वेद 1.11 एक संक्षिप्त त्रिष्टुभ् सूक्त है, जो स्तुति द्वारा इन्द्र की महिमा का विस्तार करता है और उनके निर्णायक वीर कर्मों का स्मरण कराता है—विशेषतः वल की गुहा का उद्घाटन तथा दीप्तिमान “गौओं” (किरणें/सम्पदा) का विमोचन। यह इन्द्र की विजयी शक्ति, संरक्षण और प्रचुर दानों की याचना करता है, और यह प्रतिपादित करता है कि सत्य-मन वाले उपासकों द्वारा आहूत होने पर उनकी उदारता समस्त गणना से परे है।

Mantras

Mantra 1

इन्द्रं विश्वा अवीवृधन्त्समुद्रव्यचसं गिरः । रथीतमं रथीनां वाजानां सत्पतिं पतिम् ॥

समुद्र-व्यापक, सर्वत्र फैले हुए इन्द्र को सब स्तुतिगीतों ने बढ़ाया है। वह रथियों में परम रथी, वाजों (बल-समृद्धियों) का स्वामी, सत्-जन (ऋत के अनुयायी) का नायक—स्वामी है।

Mantra 2

सख्ये त इन्द्र वाजिनो मा भेम शवसस्पते । त्वामभि प्र णोनुमो जेतारमपराजितम् ॥

हे इन्द्र, वाजिनो (बल-समृद्धि चाहने वाले) हम तेरी सख्यता में भय नहीं करते, हे शवसस्-पते (पराक्रम के स्वामी)। हम तुझे पुकारते हुए आगे बढ़ते हैं—अपराजित जेता की ओर।

Mantra 3

पूर्वीरिन्द्रस्य रातयो न वि दस्यन्त्यूतयः । यदी वाजस्य गोमतः स्तोतृभ्यो मंहते मघम् ॥

इन्द्र के प्राचीन दान और उसकी ऊतियाँ (सहायताएँ) कभी नहीं चूकतीं। जब वह स्तोताओं को गोमत् वाज (किरण-समृद्ध बल) का मघ (दान-वैभव) देता है, तब वह महान् समृद्धि होती है।

Mantra 4

पुरां भिन्दुर्युवा कविरमितौजा अजायत । इन्द्रो विश्वस्य कर्मणो धर्ता वज्री पुरुष्टुतः ॥

किलों को भेदने वाला, युवा कवि, अपरिमित ओज वाला जन्मा—इन्द्र; समस्त कर्म का धारक, वज्रधारी, अनेक साधकों द्वारा स्तुत।

Mantra 5

त्वं वलस्य गोमतोऽपावरद्रिवो बिलम् । त्वां देवा अबिभ्युषस्तुज्यमानास आविषुः ॥

हे अद्रिवः (शिला-धारी), तूने वल के गोमय (किरण-समृद्ध) बिल को खोल दिया; भयभीत और दबे हुए देवों ने, तुझे प्रकट रूप में आगे लाया।

Mantra 6

तवाहं शूर रातिभिः प्रत्यायं सिन्धुमावदन् । उपातिष्ठन्त गिर्वणो विदुष्टे तस्य कारवः ॥

हे शूर, तेरी रतियों (दानों) से मैं फिर बहती सिन्धु की ओर लौटा और उसे घोषित किया; हे गिर्वणः (स्तुति-प्रिय), तेरे निकट गायक आ खड़े हुए—कर्म के कर्ता तेरी उस शक्ति को जानते हैं।

Mantra 7

मायाभिरिन्द्र मायिनं त्वं शुष्णमवातिरः । विदुष्टे तस्य मेधिरास्तेषां श्रवांस्युत्तिर ॥

हे इन्द्र! अपनी मायाओं (दिव्य कौशल-शक्तियों) से तूने मायावी शुष्ण को गिरा दिया। तेरे उस कर्म को मेधावी जन जानते हैं; उनके श्रवण को ऊँचा कर—उनकी प्रेरित कीर्ति और ग्रहण-शक्ति को उन्नत कर।

Mantra 8

इन्द्रमीशानमोजसाभि स्तोमा अनूषत । सहस्रं यस्य रातय उत वा सन्ति भूयसीः ॥

बल के स्वामी इन्द्र को स्तोत्रों ने गूँजकर पुकारा है। जिसके दान सहस्र हैं—और सच तो यह कि वे और भी अधिक हैं; उसकी कृपा गणना से परे उमड़ती है।

Frequently Asked Questions

It says that inspired hymns strengthen Indra, the great victorious power, and it asks him to protect and bless the worshippers with success and abundance.

Vala’s cave is a symbol of obstruction; when Indra opens it, the ‘cows’ (often understood as rays of light or wealth) are released—meaning prosperity and clarity return.

It can be recited as an Indra-stotra during a fire offering or personal prayer when seeking courage, obstacle-removal, protection, and strength to act rightly.

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