
Sukta 1.108
Indra-Agni (dual)
यह सूक्त युगल शक्तियों इन्द्र और अग्नि का आह्वान करता है कि वे अपने दीप्तिमान रथ पर साथ-साथ आएँ और नवनिष्पीडित सोम का पान करें। जहाँ-जहाँ वे रमते हों—गृह में, पवित्र वाणी/ब्रह्मन् में, या राजकीय पराक्रम में—वहीं से उन्हें बार-बार बुलाया गया है, ताकि वे विजय, गौ-धन/सम्पत्ति और सर्वतोमुखी समृद्धि प्रदान करें। अंत की मंगलकामना प्रार्थना को अन्य पोषक देवताओं और विश्व-आधारों तक विस्तृत करती है—मित्र-वरुण, अदिति, सिन्धु, पृथ्वी और द्यौ (स्वर्ग)।
Mantra 1
य इन्द्राग्नी चित्रतमो रथो वामभि विश्वानि भुवनानि चष्टे । तेना यातं सरथं तस्थिवांसाथा सोमस्य पिबतं सुतस्य ॥
हे इन्द्र और अग्नि! तुम्हारा जो परम चित्र (दीप्तिमान) रथ समस्त भुवनों को निहारता है—उसी से आओ; एक ही रथ पर साथ खड़े होकर आओ; फिर निचोड़े हुए सोम का पान करो।
Mantra 2
यावदिदं भुवनं विश्वमस्त्युरुव्यचा वरिमता गभीरम् । तावाँ अयं पातवे सोमो अस्त्वरमिन्द्राग्नी मनसे युवभ्याम् ॥
जितना यह समस्त जगत् है—विस्तार में विशाल, परिमाण में व्यापक, गहन—उतना ही यह सोम पान के लिए विशाल हो; हे इन्द्राग्नी, शीघ्र ही वह तुम्हारे दोनों के मन के लिए पर्याप्त हो।
Mantra 3
चक्राथे हि सध्र्यङ्नाम भद्रं सध्रीचीना वृत्रहणा उत स्थः । ताविन्द्राग्नी सध्र्यञ्चा निषद्या वृष्णः सोमस्य वृषणा वृषेथाम् ॥
हे वृत्रहन्ता इन्द्र–अग्नि! तुम दोनों ने सचमुच एकाग्र, सीधी और संयुक्त गति से कल्याणकारी शुभ कर्म रचा है; और तुम दृढ़ होकर स्थित हो। हे इन्द्र–अग्नि, ऋजु-प्रेरणा में साथ बैठकर, सोम के वृषभ-बल से वृषण (पराक्रमी) होकर पुष्ट होओ; हे दो वीरों, बलवान बनो।
Mantra 4
समिद्धेष्वग्निष्वानजाना यतस्रुचा बर्हिरु तिस्तिराणा । तीव्रैः सोमैः परिषिक्तेभिरर्वागेन्द्राग्नी सौमनसाय यातम् ॥
जब अग्नियाँ प्रज्वलित हों, तब पुकार को पहचानते हुए समीप आओ; सुयोजित स्रुचाओं से बिछा हुआ बर्हि (आसन) फैलाया जाता है। तीव्र सोम-रसों से चारों ओर परिषिक्त होकर—हे इन्द्र–अग्नि—यहाँ आओ, प्रसन्न-मन की सौमनस्य-एकता के लिए।
Mantra 5
यानीन्द्राग्नी चक्रथुर्वीर्याणि यानि रूपाण्युत वृष्ण्यानि । या वां प्रत्नानि सख्या शिवानि तेभिः सोमस्य पिबतं सुतस्य ॥
हे इन्द्र–अग्नि! तुमने जो-जो वीर्य (पराक्रम) सिद्ध किए हैं, जो-जो रूप और जो-जो वृष्ण्य (वृषभ-बल) हैं; और जो तुम्हारी प्राचीन, कल्याणमयी सख्यताएँ हैं—उन्हीं के द्वारा तुम दोनों सुत (निचोड़े हुए) सोम का पान करो।
Mantra 6
यदब्रवं प्रथमं वां वृणानोऽयं सोमो असुरैर्नो विहव्यः । तां सत्यां श्रद्धामभ्या हि यातमथा सोमस्य पिबतं सुतस्य ॥
जब, तुम्हें चुनकर, मैंने प्रथम यह उद्घोष किया— ‘यह सोम हमारे लिए आह्वेय है; असुर-शक्तियाँ इसे हमसे न फेर सकें’— उस सत्य श्रद्धा के पास तुम यहाँ आओ; फिर पेरित (सुते) सोम का पान करो।
Mantra 7
यदिन्द्राग्नी मदथः स्वे दुरोणे यद्ब्रह्मणि राजनि वा यजत्रा । अतः परि वृषणावा हि यातमथा सोमस्य पिबतं सुतस्य ॥
हे इन्द्राग्नी, यदि तुम अपने ही दुर्वाणे (गृह) में, या ब्रह्मणि (प्रेरित वाणी) में, अथवा राजन्-भाव (राजसत्ता) में हर्ष पाते हो— हे यजत्रो! वहाँ से, हे दोनों वृषणाव, हमारे पास परिक्रमा करके आओ; फिर पेरित (सुते) सोम का पान करो।
Mantra 8
यदिन्द्राग्नी यदुषु तुर्वशेषु यद्द्रुह्युष्वनुषु पूरुषु स्थः । अतः परि वृषणावा हि यातमथा सोमस्य पिबतं सुतस्य ॥
हे इन्द्राग्नी, यदि तुम यदुओं में, तुर्वशों में, द्रुह्यों में, अनुओं में, पूरुओं में स्थित हो— तो वहाँ से, हे दोनों वृषणाव, हमारे पास परिक्रमा करके आओ; और पेरित (सुते) सोम का पान करो।
Mantra 9
यदिन्द्राग्नी अवमस्यां पृथिव्यां मध्यमस्यां परमस्यामुत स्थः । अतः परि वृषणावा हि यातमथा सोमस्य पिबतं सुतस्य ॥
यदि, हे इन्द्र–अग्नि, तुम इस पृथ्वी के अधो-लोक में, मध्य-लोक में, अथवा परम-लोक में स्थित हो—तो वहीं से, हे दोनों वृषण (पराक्रमी), चारों ओर से यहाँ आओ; और सुते हुए (निचोड़े हुए) सोम का पान करो।
Mantra 10
यदिन्द्राग्नी परमस्यां पृथिव्यां मध्यमस्यामवमस्यामुत स्थः । अतः परि वृषणावा हि यातमथा सोमस्य पिबतं सुतस्य ॥
यदि, हे इन्द्र–अग्नि, तुम इस पृथ्वी के परम-लोक में, मध्य-लोक में, अथवा अधो-लोक में स्थित हो—तो वहीं से, हे दोनों वृषण (पराक्रमी), चारों ओर से यहाँ आओ; और सुते हुए सोम का पान करो।
Mantra 11
यदिन्द्राग्नी दिवि ष्ठो यत्पृथिव्यां यत्पर्वतेष्वोषधीष्वप्सु । अतः परि वृषणावा हि यातमथा सोमस्य पिबतं सुतस्य ॥
यदि, हे इन्द्र–अग्नि, तुम स्वर्ग में स्थित हो, या पृथ्वी पर, या पर्वतों में, औषधियों में, अथवा जलों में—तो वहीं से, हे दोनों वृषण (पराक्रमी), चारों ओर से यहाँ आओ; और सुते हुए सोम का पान करो।
Mantra 12
यदिन्द्राग्नी उदिता सूर्यस्य मध्ये दिवः स्वधया मादयेथे । अतः परि वृषणावा हि यातमथा सोमस्य पिबतं सुतस्य ॥
यदि, हे इन्द्र–अग्नि, सूर्य के उदय में, दिवः के मध्य में, तुम अपनी स्वधा से आनन्दित होते हो—तो वहीं से, हे दोनों वृषण (पराक्रमी), चारों ओर से यहाँ आओ; और निचोड़े हुए सुत सोम का पान करो।
Mantra 13
एवेन्द्राग्नी पपिवांसा सुतस्य विश्वास्मभ्यं सं जयतं धनानि । तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः ॥
ऐसे, हे इन्द्र–अग्नि, सुत सोम का पान करने वाले, हमारे लिए समग्र रूप से धन-सम्पदाएँ—सब प्रकार की समृद्धियाँ—जीत लो। और मित्र–वरुण हमें महान करें; अदिति, प्रवहमान सिन्धु, पृथ्वी तथा द्यौ (स्वर्ग) भी हमें धारण करें और बढ़ाएँ।
They are praised as a paired power: Indra brings victorious strength, and Agni brings the sacrificial fire that carries offerings. Together they make the ritual effective and prosperity-giving.
In Soma rites, inviting the gods to drink Soma means inviting their presence and power into the sacrifice. It signals that the offering is accepted and that blessings can flow to the worshippers.
The hymn ends by widening the blessing beyond Indra–Agni alone. These names represent cosmic order, protection, abundance, and the stable supports of life, sealing the prayer with universal well-being.
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