
Sukta 1.101
Kutsa Āṅgirasa (traditional attribution for RV 1.94–1.115 includes Kutsa; RV 1.101 is commonly assigned to Kutsa Āṅgirasa in Anukramaṇī)
Indra (Marutvant Indra: Indra in companionship with the Maruts)
Triṣṭubh (11-syllable pādas; standard for many Indra hymns)
कुत्स आङ्गिरस का यह त्रिष्टुभ् सूक्त ‘मरुतों सहित’ इन्द्र का आह्वान करता है—आनन्दमय, संग्राम-विजयी शक्ति के रूप में, जो अन्धकार और अवरोध को चीरकर वाज (विजयी समृद्धि) प्रदान करता है। कवि हर अवस्था में—वीर-प्रगति, भय, प्रयत्न और विजय—इन्द्र की सख्यता/संगति माँगता है, ताकि गायक बाह्य प्रतिस्पर्धा और अन्तःसंघर्ष—दोनों में विजयी हों। अंत में प्रार्थना को व्यापक कर विश्व-धारण करने वाले सहायक मंडल तक फैलाता है: मित्र-वरुण, अदिति, सिन्धु, पृथ्वी और द्यौ (स्वर्ग)।
Mantra 1
प्र मन्दिने पितुमदर्चता वचो यः कृष्णगर्भा निरहन्नृजिश्वना । अवस्यवो वृषणं वज्रदक्षिणं मरुत्वन्तं सख्याय हवामहे ॥
मन्दिन (आनन्द-दीप्त) वाणी, पोषण-रस से परिपूर्ण, उसके लिए प्रवाहित करो—जिसने ऋजिश्वन् (सीधे-गामी बल) से गर्भित कृष्णता (अन्धकार) को बाहर निकालकर मारा। सच्ची सहायता के अभिलाषी हम, मरुतों सहित, वज्र-दक्षिण (वज्र-धारी दाहिने हाथ वाला) उस वृषभ इन्द्र को सख्य के लिए पुकारते हैं।
Mantra 2
यो व्यंसं जाहृषाणेन मन्युना यः शम्बरं यो अहन्पिप्रुमव्रतम् । इन्द्रो यः शुष्णमशुषं न्यावृणङ्मरुत्वन्तं सख्याय हवामहे ॥
जो उल्लसित क्रोध (मन्यु) से व्यंस को मार गिराने वाला, जो शम्बर को संहारने वाला, जो अव्रत (व्रत-रहित) पिप्रु का वध करने वाला है; जो शुष्ण—उस सूखा-रूप, रोकने वाली शक्ति—को बाँधकर रोक देता है—ऐसे मरुत्वान् इन्द्र को हम सख्य-भाव के लिए आह्वान करते हैं।
Mantra 3
यस्य द्यावापृथिवी पौंस्यं महद्यस्य व्रते वरुणो यस्य सूर्यः । यस्येन्द्रस्य सिन्धवः सश्चति व्रतं मरुत्वन्तं सख्याय हवामहे ॥
जिसका महान् पौरुष द्यावा-पृथिवी को धारण करता है; जिसके व्रत में वरुण भी चलता है और सूर्य भी; जिसके इन्द्र के व्रत का अनुसरण करते हुए सिन्धु (नदियाँ) प्रवाहित होती हैं—ऐसे मरुत्वान् इन्द्र को हम सख्य-भाव के लिए आह्वान करते हैं।
Mantra 4
यो अश्वानां यो गवां गोपतिर्वशी य आरितः कर्मणिकर्मणि स्थिरः । वीळोश्चिदिन्द्रो यो असुन्वतो वधो मरुत्वन्तं सख्याय हवामहे ॥
जो अश्वों का स्वामी, जो गौओं का स्वामी—गोपति, वशी—है; जो प्रत्येक कर्म में स्थिर, यथोचित रूप से स्थापित है; जो असुन्वत् (जो सोम न निचोड़ें) का भी वध करने वाला इन्द्र है—ऐसे मरुत्वान् इन्द्र को हम सख्य-भाव के लिए आह्वान करते हैं।
Mantra 5
यो विश्वस्य जगतः प्राणतस्पतिर्यो ब्रह्मणे प्रथमो गा अविन्दत् । इन्द्रो यो दस्यूँरधराँ अवातिरन्मरुत्वन्तं सख्याय हवामहे ॥
जो समस्त जगत् के चलने‑फिरने और प्राणधारण करने वालों का स्वामी है; जिसने ब्रह्म (वाणी/मंत्र) के साधक के लिए सबसे पहले गौओं (किरणों) को पाया—वही इन्द्र, जिसने दस्युओं को अधर अन्धकार में गिरा दिया; मरुतों सहित उस इन्द्र को हम सख्य‑भाव के लिए आह्वान करते हैं।
Mantra 6
यः शूरेभिर्हव्यो यश्च भीरुभिर्यो धावद्भिर्हूयते यश्च जिग्युभिः । इन्द्रं यं विश्वा भुवनाभि संदधुर्मरुत्वन्तं सख्याय हवामहे ॥
जो शूरों द्वारा भी और भीरुओं द्वारा भी आह्वेय है; जिसे धावते‑दौड़ते प्रयत्नशील जन पुकारते हैं और जिसे विजयी जन पुकारते हैं; जिस इन्द्र को समस्त भुवन एक ही सामंजस्य में जोड़ते हैं—मरुतों सहित उस इन्द्र को हम सख्य‑भाव के लिए आह्वान करते हैं।
Mantra 7
रुद्राणामेति प्रदिशा विचक्षणो रुद्रेभिर्योषा तनुते पृथु ज्रयः । इन्द्रं मनीषा अभ्यर्चति श्रुतं मरुत्वन्तं सख्याय हवामहे ॥
वह दूरदर्शी ऋषि‑दृष्टि वाला, रुद्रों की दिशाओं में गमन करता है; रुद्रों के साथ वह युवा शक्ति विस्तृत जुए/बंधन को फैलाती है। हमारी मनीषा (प्रेरित बुद्धि) श्रुत (सुप्रसिद्ध/श्रवणीय) इन्द्र की स्तुति करती है—मरुतों सहित उस इन्द्र को हम सख्य‑भाव के लिए आह्वान करते हैं।
Mantra 8
यद्वा मरुत्वः परमे सधस्थे यद्वावमे वृजने मादयासे । अत आ याह्यध्वरं नो अच्छा त्वाया हविश्चकृमा सत्यराधः ॥
हे मरुत्वन्! चाहे तुम परम सदस् (परमे सधस्थे) में आनंदित हो, चाहे निकट के कर्म-क्षेत्र (अवमे वृजने) में; वहीं से हमारे इस अध्वर-यज्ञ की ओर आओ। हे सत्यराधस्—सत्य कर्म-सिद्ध करने वाले! तुम्हारे लिए हमने हवि तैयार की है।
Mantra 9
त्वायेन्द्र सोमं सुषुमा सुदक्ष त्वाया हविश्चकृमा ब्रह्मवाहः । अधा नियुत्वः सगणो मरुद्भिरस्मिन्यज्ञे बर्हिषि मादयस्व ॥
हे इन्द्र! हे सुदक्ष—कुशल! तुम्हारे लिए हमने सोम को सु-रूप से निचोड़ा है; हे ब्रह्मवाहः—ब्रह्म (पवित्र वाणी) के वाहक! तुम्हारे लिए हमने हवि भी तैयार की है। तब अपनी नियुत्-रथ-टीमों से युक्त होकर, मरुतों के गण सहित, इस यज्ञ में इसी बर्हिष् (पवित्र कुशासन) पर आनंदित हो।
Mantra 10
मादयस्व हरिभिर्ये त इन्द्र वि ष्यस्व शिप्रे वि सृजस्व धेने । आ त्वा सुशिप्र हरयो वहन्तूशन्हव्यानि प्रति नो जुषस्व ॥
हे इन्द्र! अपने हरि (ताम्रवर्ण अश्वों) के साथ आनंदित हो; हे शिप्रे—ओष्ठों वाले! अपने ओष्ठ खोल, धाराओं को प्रवाहित होने दे। हे सुशिप्र—सुन्दर-ओष्ठ! हरि तुम्हें यहाँ ले आएँ; हव्यों की कामना करते हुए, हमारी आहुतियों को स्वीकार कर, उनमें तृप्त हो।
Mantra 11
मरुत्स्तोत्रस्य वृजनस्य गोपा वयमिन्द्रेण सनुयाम वाजम् । तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः ॥
मरुतों के स्तोत्र के रक्षक, और (आत्मिक) संग्राम-भूमि के गोपा, हम इन्द्र के साथ वाज—विजयी बल की पूर्णता—को प्राप्त करें। मित्र और वरुण हमें बढ़ाएँ; और अदिति, प्रवहमान सिन्धु, पृथ्वी तथा द्यौ (स्वर्ग) हमारे अस्तित्व को धारण करें और महिमामय करें।
The main deity is Indra, specifically Indra accompanied by the Maruts (Marutvant Indra), invoked as a powerful ally who grants victory and breaks obstruction.
It means seeking Indra as an active companion—strength, courage, and decisive help in struggle—rather than a distant blessing, especially with the Maruts as supporting energies.
They are invoked to stabilize and enlarge the boon: Indra gives the breakthrough and victory, while these cosmic powers uphold order, widen protection, and support lasting well-being.
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