यह सोपान ‘त्याग-धर्म’ से ‘सेवा-धर्म’ की ओर ले जाता है। अयोध्या-काण्ड में राम का वनगमन केवल राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि भक्त के भीतर ‘अहं-राज्य’ का विसर्जन है। भरत-चरित्र इस चरण का द्वार है: निष्काम कर्तव्य, भ्रातृ-प्रेम, और लोक-कल्याण के लिए स्व-सुख का त्याग। यहाँ ‘राजधर्म’ भी साधना बनता है—पादुका-शासन के माध्यम से ईश्वर-आज्ञा का सामाजिक रूपांतरण।
अयोध्या-काण्ड का प्रमुख रस करुण है, पर उसका लक्ष्य शोक का विस्तार नहीं—शोक का शोधन है। राम-वनगमन के बाद ‘धर्म’ का केंद्र राजसिंहासन से हटकर ‘आज्ञा-पालन’ में प्रतिष्ठित होता है। इस खंड में तुलसीदास नीति, मर्यादा और प्रेम को एक ही धुरी पर रखते हैं: राम की विनयशीलता, भरत की निष्कामता, और गुरु-वचन की सर्वोच्चता। प्रस्तुत अंश में अत्रि-आश्रम का ‘पुण्य-भूगोल’ (भरतकूप) लोक-कल्याण का प्रतीक है—भक्ति का जल सार्वजनिक हो जाता है। फिर भरत का वन-परिक्रमा, तीरथों में निमज्जन-प्रणाम, और अंततः राम से ‘राजाज्ञा’ माँगना—यह सब साधक की आंतरिक यात्रा है: पहले पवित्रता (शुचिता), फिर दृष्टि-शोधन (दिव्य-दर्शन), और अंत में कर्तव्य-स्थापन (अवध-पालन) । इस तरह अयोध्या-काण्ड सोपान में ‘विरह-भक्ति’ को ‘सेवा-भक्ति’ में परिणत करता है।
चौपाई 310.1-4
भरत अत्रि अनुसासन पाई।जल भाजन सब दिए चलाई।।
सानुज आपु अत्रि मुनि साधू।सहित गए जहँ कूप अगाधू।।
पावन पाथ पुन्यथल राखा।प्रमुदित प्रेम अत्रि अस भाषा।।
तात अनादि सिद्ध थल एहू।लोपेउ काल बिदित नहिं केहू।।
तब सेवकन्ह सरस थलु देखा।किन्ह सुजल हित कूप बिसेषा।।
बिधि बस भयउ बिस्व उपकारू।सुगम अगम अति धरम बिचारू।।
भरतकूप अब कहिहहिं लोगा।अति पावन तीरथ जल जोगा।।
प्रेम सनेम निमज्जत प्रानी।होइहहिं बिमल करम मन बानी।।
bharata atri anusāsana pāī |jala bhājana saba die calāī ||
sānuja āpu atri muni sādhū |sahita gae jahã kūpa agādhū ||
pāvana pātha punyathala rākhā |pramudita prema atri asa bhāṣā ||
tāta anādi siddha thala ehū |lopeu kāla bidita nahiṁ kehū ||
taba sevakanha sarasa thalu dekhā |kinha sujala hita kūpa biseṣā ||
bidhi basa bhayau bisva upakārū |sugama agama ati dharama bicārū ||
bharatakūpa aba kahihahiṁ logā |ati pāvana tīratha jala jogā ||
prema sanema nimajjata prānī |hoihahiṁ bimala karama mana bānī ||
भरत ने अत्रि का आदेश पाकर सभी जल पात्र रवाना कर दिए। अपने छोटे भाई सहित, तथा मुनि अत्रि और साधुओं के साथ वे स्वयं उसी स्थान पर गए जहाँ अथाह कूप था। उस पवित्र स्थान पर पवित्र जल रखा, और अत्रि प्रेम और हर्ष से परिपूर होकर यों बोले। "हे तात, यह स्थान अनादि काल से सिद्ध है; काल ने इसे छिपा रखा, किसी को इसका ज्ञान नहीं था। तब मेरे सेवकों ने उस स्थान की भूमि को आर्द्र देखा, और शुभ जल के निमित्त वहाँ एक विशेष कूप बनवाया। विधि के वश में यह संसार का उपकार बना, और अत्यन्त कठिन धर्म का मार्ग सुगम हो गया। लोग अब इसे भरतकूप कहेंगे, सभी तीर्थों के जल से युक्त अत्यन्त पवित्र तीर्थ। जो प्राणी प्रेम और नियम सहित इसमें स्नान करते हैं, वे कर्म, मन और वाणी से निर्मल हो जाएँगे।"
दोहा 310
कहत कूप महिमा सकल गए जहाँ रघुराउ।अत्रि सुनायउ रघुबरहि तीरथ पुन्य प्रभाउ।।310।।
kahata kūpa mahimā sakala gae jahā̃ raghurāu |atri sunāyau raghubarahi tīratha punya prabhāu ||310||
कूप की महिमा कहते हुए वे सब वहाँ गए जहाँ रघुराज थे। वहाँ अत्रि ने रघुवर राम को उस तीर्थ का पुण्य और प्रभाव सुनाया।
चौपाई 311.1-4
कहत धरम इतिहास सप्रीती।भयउ भोरु निसि सो सुख बीती।।
नित्य निबाहि भरत दोउ भाई।राम अत्रि गुर आयसु पाई।।
सहित समाज साज सब सादें।चले राम बन अटन पयादें।।
कोमल चरन चलत बिनु पनहीं।भइ मृदु भूमि सकुचि मन मनहीं।।
कुस कंटक काँकरीं कुराईं।कटुक कठोर कुबस्तु दुराईं।।
महि मंजुल मृदु मारग कीन्हे।बहत समीर त्रिबिध सुख लीन्हे।।
सुमन बरषि सुर घन करि छाहीं।बिटप फूलि फलि तृन मृदुताहीं।।
मृग बिलोकि खग बोलि सुबानी।सेवहिं सकल राम प्रिय जानी।।
kahata dharama itihāsa saprītī |bhayau bhoru nisi so sukha bītī ||
nitya nibāhi bharata dou bhāī |rāma atri gura āyasu pāī ||
sahita samāja sāja saba sādeṁ |cale rāma bana aṭana payādeṁ ||
komala carana calata binu panahīṁ |bhai mṛdu bhūmi sakuci mana manahīṁ ||
kusa kaṁṭaka kā̃karīṁ kurāīṁ |kaṭuka kaṭhora kubastu durāīṁ ||
mahi maṁjula mṛdu māraga kīnhe |bahata samīra tribidha sukha līnhe ||
sumana baraṣi sura ghana kari chāhīṁ |biṭapa phūli phali tṛna mṛdutāhīṁ ||
mṛga biloki khaga boli subānī |sevahiṁ sakala rāma priya jānī ||
धर्म और इतिहास की कथा प्रेम सुनाते हुए, वह रात सुख से बीती और भोर हो गई। नित्यकर्म निबाहकर भरत और शत्रुघ्न दोनों भाइयों ने राम और गुरु अत्रि से आज्ञा पाकर, सब सादे वस्त्रों में सजे हुए समाज सहित राम के वन में पैदल विचरने चले। बिना जूते के कोमल चरणों से चलते हुए, धरती लज्जा से मन में सकुचाती हुई मृदुल हो गई। कुशा घास, काँटे, कंकड़ और खाँब, और सभी कटु, कठोर और दुर्बस्तु को उसने दूर कर दिया। धरती ने मार्गों को सुंदर और कोमल किया, और समीर तीन प्रकार के सुख में लीन होकर बहने लगा। देवताओं ने फूल बरसाए और बादलों ने छाया की; वृक्ष फूले और फले, और घास कोमल हो गई। हिरण देखते और पक्षी मधुर स्वर से बोलते हुए, सब राम के प्रिय जानकर सेवा करने लगे।
दोहा 311
सुलभ सिद्धि सब प्राकृतहु राम कहत जमुहात।राम प्रान प्रिय भरत कहुँ यह न होइ बड़ि बात।।311।।
sulabha siddhi saba prākṛtahu rāma kahata jamuhāta |rāma prāna priya bharata kahũ yaha na hoi baṛi bāta ||311||
सामान्य मनुष्य के लिए भी जमहाई लेते हुए रघुनाथ का नाम लेने से सम्पूर्ण सिद्धियाँ सुगमता से प्राप्त हो जाती हैं। राम के जीवन-प्रिय भरत के लिए तो यह कोई बड़ी बात नहीं है।
चौपाई 312.1-4
एहि बिधि भरतु फिरत बन माहीं।नेमु प्रेमु लखि मुनि सकुचाहीं।।
पुन्य जलाश्रय भूमि बिभागा।खग मृग तरु तृन गिरि बन बागा।।
चारु बिचित्र पबित्र बिसेषी।बूझत भरतु दिब्य सब देखी।।
सुनि मन मुदित कहत रिषिराऊ।हेतु नाम गुन पुन्य प्रभाऊ।।
कतहुँ निमज्जन कतहुँ प्रनामा।कतहुँ बिलोकत मन अभिरामा।।
कतहुँ बैठि मुनि आयसु पाई।सुमिरत सीय सहित दोउ भाई।।
देखि सुभाउ सनेहु सुसेवा।देहिं असीस मुदित बनदेवा।।
फिरहिं गएँ दिनु पहर अढ़ाई।प्रभु पद कमल बिलोकहिं आई।।
ehi bidhi bharatu phirata bana māhīṁ |nemu premu lakhi muni sakucāhīṁ ||
punya jalāśraya bhūmi bibhāgā |khaga mṛga taru tṛna giri bana bāgā ||
cāru bicitra pabitra biseṣī |būjhata bharatu dibya saba dekhī ||
suni mana mudita kahata riṣirāū |hetu nāma guna punya prabhāū ||
katahũ nimajjana katahũ pranāmā |katahũ bilokata mana abhirāmā ||
katahũ baiṭhi muni āyasu pāī |sumirata sīya sahita dou bhāī ||
dekhi subhāu sanehu susevā |dehiṁ asīsa mudita banadevā ||
phirahiṁ gaẽ dinu pahara aṛhāī |prabhu pada kamala bilokahiṁ āī ||
इस प्रकार भरत वन में विचरते रहे, और मुनियों ने उनके नेम और प्रेम को देखकर सकुचाना। वे पुण्य जलाश्रयों, भूमि के विभागों, पक्षियों, हिरणों, वृक्षों, घासों, पर्वतों, वनों और उपवनों के विषय में पूछते रहे। सब रमणीय, विचित्र और विशेष रूप से पवित्र थे, और भरत सब दिव्य देखकर उनके विषय में मुनि से पूछते रहे। सुनकर रिषिराज मन में हर्षित होकर प्रत्येक का हेतु, नाम, गुण और पुण्य प्रभाव कहते रहे। कहीं वे स्नान करते, कहीं प्रणाम करते, और कहीं मन को अभिराम करने वाले दृश्य को देखते। कहीं मुनि की आज्ञा पाकर बैठ जाते, और सीता सहित दोनों भाइयों का स्मरण करते। उनका स्वभाव, स्नेह और सुसेवा देखकर वनदेवताएँ हर्षित होकर उन्हें आशीर्वाद देतीं। दिन के ढाई पहर बीत जाने पर वे लौट आते और प्रभु के चरण कमलों को देखते।
दोहा 312
देखे थल तीरथ सकल भरत पाँच दिन माझ।कहत सुनत हरि हर सुजसु गयउ दिवसु भइ साँझ।।312।।
dekhe thala tīratha sakala bharata pā̃ca dina mājha |kahata sunata hari hara sujasu gayau divasu bhai sā̃jha ||312||
भरत ने पाँच दिन में सभी तीर्थों और तटों को देखा। हरि और हर के शुभ यश का कथन करते और सुनते हुए दिन बीत गया और साँझ हो गई।
चौपाई 313.1-4
भोर न्हाइ सबु जुरा समाजू।भरत भूमिसुर तेरहुति राजू।।
भल दिन आजु जानि मन माहीं।रामु कृपाल कहत सकुचाहीं।।
गुर नृप भरत सभा अवलोकी।सकुचि राम फिरि अवनि बिलोकी।।
सील सराहि सभा सब सोची।कहुँ न राम सम स्वामि सँकोची।।
भरत सुजान राम रुख देखी।उठि सप्रेम धरि धीर बिसेषी।।
करि दंडवत कहत कर जोरी।राखीं नाथ सकल रुचि मोरी।।
मोहि लगि सहेउ सबहिं संतापू।बहुत भाँति दुखु पावा आपू।।
अब गोसाइँ मोहि देउ रजाई।सेवौं अवध अवधि भरि जाई।।
bhora nhāi sabu jurā samājū |bharata bhūmisura terahuti rājū ||
bhala dina āju jāni mana māhīṁ |rāmu kṛpāla kahata sakucāhīṁ ||
gura nṛpa bharata sabhā avalokī |sakuci rāma phiri avani bilokī ||
sīla sarāhi sabhā saba socī |kahũ na rāma sama svāmi sãkocī ||
bharata sujāna rāma rukha dekhī |uṭhi saprema dhari dhīra biseṣī ||
kari daṁḍavata kahata kara jorī |rākhīṁ nātha sakala ruci morī ||
mohi lagi saheu sabahiṁ saṁtāpū |bahuta bhā̃ti dukhu pāvā āpū ||
aba gosāĩ mohi deu rajāī |sevauṁ avadha avadhi bhari jāī ||
भोर में स्नान करके सब समाज एकत्र हुआ - भरत, ब्राह्मण और तिरहुत के राजा। मन में जानकर कि आज शुभ दिन है, कृपालु राम कहने में सकुचाते थे। राम ने गुरु, राजा, भरत और सभा को देखा, फिर सकुचाकर पुनः भूमि की ओर दृष्टि फेर ली। सभा ने सब उनके शील की सराहना की और सोचा - राम से अधिक सकुचाने वाला स्वामी कहीं नहीं है। सुजान भरत ने राम का मुख देखा, प्रेम से उठे और विशेष धीरज धारण किया। दंडवत करके हाथ जोड़कर बोले - नाथ, मेरी सब रुचि पूरी कर ली। मेरे लिए सबने संताप सहा और आपने बहुत प्रकार से दुःख पाया। अब गोसाइं मुझे आज्ञा दीजिए, अवध में जाकर अवधि भर सेवा करूँ।
दोहा 313
जेहिं उपाय पुनि पाय जनु देखै दीनदयाल।सो सिख देइअ अवधि लगि कोसलपाल कृपाल।।313।।
jehiṁ upāya puni pāya janu dekhai dīnadayāla |so sikha deia avadhi lagi kosalapāla kṛpāla ||313||
हे कोसल के स्वामी, दीनों पर दया करने वाले कृपाल, आप किसी उपाय की शिक्षा दें जिससे आपका दास अवधि तक आपके चरणों को पुनः देख सके।
चौपाई 314.1-4
पुरजन परिजन प्रजा गोसाई।सब सुचि सरस सनेहँ सगाई।।
राउर बदि भल भव दुख दाहू।प्रभु बिनु बादि परम पद लाहू।।
स्वामि सुजानु जानि सब ही की।रुचि लालसा रहनि जन जी की।।
प्रनतपालु पालिहि सब काहू।देउ दुहू दिसि ओर निबाहू।।
अस मोहि सब बिधि भूरि भरोसो।किएँ बिचारु न सोचु खरो सो।।
आरति मोर नाथ कर छोहू।दुहुँ मिलि कीन्ह ढीठु हठि मोहू।।
यह बड़ दोषु दूरि करि स्वामी।तजि सकोच सिखइअ अनुगामी।।
भरत बिनय सुनि सबहिं प्रसंसी।खीर नीर बिबरन गति हंसी।।
purajana parijana prajā gosāī |saba suci sarasa sanehã sagāī ||
rāura badi bhala bhava dukha dāhū |prabhu binu bādi parama pada lāhū ||
svāmi sujānu jāni saba hī kī |ruci lālasā rahani jana jī kī ||
pranatapālu pālihi saba kāhū |deu duhū disi ora nibāhū ||
asa mohi saba bidhi bhūri bharoso |kiẽ bicāru na socu kharo so ||
ārati mora nātha kara chohū |duhũ mili kīnha ḍhīṭhu haṭhi mohū ||
yaha baṛa doṣu dūri kari svāmī |taji sakoca sikhaia anugāmī ||
bharata binaya suni sabahiṁ prasaṁsī |khīra nīra bibarana gati haṁsī ||
नगरवासी, परिवार और प्रजा, स्वामी, सभी निर्मल हैं और मधुर प्रेम से आपसे बँधे हुए हैं। आपकी आज्ञा में संसार के दाहक दुख भी भले हैं; पर प्रभु के बिना परम पद की प्राप्ति व्यर्थ है। सर्वज्ञ स्वामी अपने हर दास के हृदय की रुचि, लालसा और रहन-सहन जानता है। शरणागत का रक्षक सबका पालन करेगा और इस लोक तथा परलोक दोनों ओर हमारा उद्धार करेगा। इसलिए मुझे सब प्रकार से बहुत भरोसा है; जब विचार करता हूँ तो किंचित् भी चिंता का कारण नहीं पाता। मेरी आर्ति और नाथ की करुणा ने मिलकर मुझे ढीठ और हठी बना दिया है। स्वामी, यह बड़ा दोष दूर करके संकोच त्यागकर अपने अनुचर को शिक्षा दीजिए। भरत का विनय सुनकर सभी ने प्रशंसा की; वह दूध और जल को अलग करने वाले हंस की गति के समान था।
दोहा 314
दीनबंधु सुनि बंधु के बचन दीन छलहीन।देस काल अवसर सरिस बोले रामु प्रबीन।।314।।
dīnabaṁdhu suni baṁdhu ke bacana dīna chalahīna |desa kāla avasara sarisa bole rāmu prabīna ||314||
दीनबंधु राम ने अपने भाई के विनम्र और छलरहित वचन सुनकर, देश, काल और अवसर के अनुरूप बोले, क्योंकि वे सर्वथा निपुण थे।
चौपाई 315.1-4
तात तुम्हारि मोरि परिजन की।चिंता गुरहि नृपहि घर बन की।।
माथे पर गुर मुनि मिथिलेसू।हमहि तुम्हहि सपनेहुँ न कलेसू।।
मोर तुम्हार परम पुरुषारथु।स्वारथु सुजसु धरमु परमारथु।।
पितु आयसु पालिहिं दुहु भाई।लोक बेद भल भूप भलाई।।
गुर पितु मातु स्वामि सिख पालें।चलेहुँ कुमग पग परहिं न खालें।।
अस बिचारि सब सोच बिहाई।पालहु अवध अवधि भरि जाई।।
देसु कोसु परिजन परिवारू।गुर पद रजहिं लाग छरुभारू।।
तुम्ह मुनि मातु सचिव सिख मानी।पालेहु पुहुमि प्रजा रजधानी।।
tāta tumhāri mori parijana kī |ciṁtā gurahi nṛpahi ghara bana kī ||
māthe para gura muni mithilesū |hamahi tumhahi sapanehũ na kalesū ||
mora tumhāra parama puruṣārathu |svārathu sujasu dharamu paramārathu ||
pitu āyasu pālihiṁ duhu bhāī |loka beda bhala bhūpa bhalāī ||
gura pitu mātu svāmi sikha pāleṁ |calehũ kumaga paga parahiṁ na khāleṁ ||
asa bicāri saba soca bihāī |pālahu avadha avadhi bhari jāī ||
desu kosu parijana parivārū |gura pada rajahiṁ lāga charubhārū ||
tumha muni mātu saciva sikha mānī |pālehu puhumi prajā rajadhānī ||
भाई, तुम्हारी, मेरी और हमारे परिवार की, घर और वन की चिंता गुरु और राजा की है। गुरु, मुनि और मिथिलेश्वर हमारे मस्तक पर हैं, तब तो तुम्हें और मुझे स्वप्न में भी कोई क्लेश नहीं होगा। मेरा और तुम्हारा परम पुरुषार्थ, स्वार्थ, सुयश, धर्म और परमार्थ सब इसी में है। कि हम दोनों भाई पिता की आज्ञा को पालें। लोक और वेद दोनों में राजा की भलाई भली है। जो गुरु, पिता, माता और स्वामी की शिक्षा को पालता है, वह टेढ़े मार्ग पर भी चले, तो उसके पैर गड्ढे में नहीं गिरेंगे। ऐसा विचारकर सब चिंता त्यागकर अयोध्या को जाकर नियत समय तक उसकी रक्षा करो। देश, कोश, परिजन और परिवार, इन सबका भार गुरु के चरणों की धूल पर पड़ेगा। मुनि, माताओं और सचिवों की सलाह मानकर तुम पृथ्वी, प्रजा और राजधानी की रक्षा करो।
दोहा 315
मुखिआ मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक।पालइ पोषइ सकल अँग तुलसी सहित बिबेक।।315।।
mukhiā mukhu so cāhiai khāna pāna kahũ eka |pālai poṣai sakala ãga tulasī sahita bibeka ||315||
मुखिया को मुख के समान होना चाहिए, जो अकेला खाने-पीने का काम करता है, फिर भी तुलसीदास कहते हैं कि विवेक के साथ समस्त अंगों का पालन-पोषण करता है।
चौपाई 316.1-4
राजधरम सरबसु एतनोई।जिमि मन माहँ मनोरथ गोई।।
बंधु प्रबोधु कीन्ह बहु भाँती।बिनु अधार मन तोषु न साँती।।
भरत सील गुर सचिव समाजू।सकुच सनेह बिबस रघुराजू।।
प्रभु करि कृपा पाँवरीं दीन्हीं।सादर भरत सीस धरि लीन्हीं।।
चरनपीठ करुनानिधान के।जनु जुग जामिक प्रजा प्रान के।।
संपुट भरत सनेह रतन के।आखर जुग जुन जीव जतन के।।
कुल कपाट कर कुसल करम के।बिमल नयन सेवा सुधरम के।।
भरत मुदित अवलंब लहे तें।अस सुख जस सिय रामु रहे तें।।
rājadharma sarbasu etanoī |jimi mana māhā̃ manoratha goī ||
bandhu prabodhu kīnha bahu bhā̃tī |binu adhāra mana toṣu na sā̃tī ||
bharata sīla guru saciva samājū |sakuca saneha bibasa raghurājū ||
prabhu kari kṛpā pā̃varī̃ dīnhī̃ |sādara bharata sīsa dhari līnhī̃ ||
caraṇapīṭha karuṇānidhāna ke |janu juga jāmika prajā prāna ke ||
saṃpuṭa bharata saneha ratana ke |ākhara juga juna jīva jatana ke ||
kula kapāṭa kara kusala karama ke |bimala nayana sevā sudharama ke ||
bharata mudita avalaṃba lahe tẽ |asa sukha jasa siya rāmu rahe tẽ ||
राजधर्म का सम्पूर्ण सार बस इतना ही है, जैसे मन में मनोरथ छिपा रहता है। भाई को बहुत प्रकार से समझाया, पर बिना किसी आधार के मन को तृप्ति और शान्ति नहीं मिलती। भरत के शील और गुरु, सचिव तथा समाज को देखकर रघुराज संकोच और स्नेह से विवश हो गए। प्रभु ने कृपा करके पादुकाएँ दे दीं, और भरत ने श्रद्धापूर्वक सिर पर धारण कर लीं। वे करुणानिधान के चरणपीठ थे, जनु प्रजा के प्राणों के रक्षक दो जामिक थे। वे भरत के स्नेह रत्न के संपुट थे, और जीव के जतन के दो अक्षर थे। वे कुल के कपाट, कुशल कर्म के कर, और सेवा-सुधर्म के बिमल नयन थे। भरत ने आनन्दपूर्वक उस आश्रय को प्राप्त किया, और ऐसा सुख था जैसे सीता और राम स्वयं रह गए हों।
दोहा 316
मागेउ बिदा प्रनामु करि राम लिए उर लाइ।लोग उचाटे अमरपति कुटिल कुअवसरु पाइ।।316।।
māgeu bidā pranāmu kari rāma liye ura lāi |loga ucāṭe amarapati kuṭila kuavasaru pāi ||316||
भरत ने प्रणाम करके विदा मांगी और राम ने उन्हें छाती से लगा लिया। परंतु अमरों के स्वामी इंद्र ने कुटिल और अनुकूल नहीं समय पाकर लोगों के मन में जाने की उत्कंठा उत्पन्न कर दी।
चौपाई 317.1-4
सो कुचालि सब कहँ भइ नीकी।अवधि आस सम जीवनि जी की।।
नतरु लखन सिय सम बियोगा।हहरि मरत सब लोग कुरोगा।।
रामकृपाँ अवरेब सुधारी।बिबुध धारि भइ गुनद गोहारी।।
भेंटत भुज भरि भाइ भरत सो।राम प्रेम रसु कहि न परत सो।।
तन मन बचन उमग अनुरागा।धीर धुरंधर धीरजु त्यागा।।
बारिज लोचन मोचत बारी।देखि दसा सुर सभा दुखारी।।
मुनिगन गुर धुर धीर जनक से।ग्यान अनल मन कसें कनक से।।
जे बिरंचि निरलेप उपाए।पदुम पत्र जिमि जग जल जाए।।
so kucāli saba kahã bhai nīkī |avadhi āsa sama jīvani jī kī ||
nataru lakhana siya sama biyogā |hahari marata saba loga kurogā ||
rāmakṛpā̃ avareba sudhārī |bibudha dhāri bhai guṇada gohārī ||
bhẽṭata bhuja bhari bhāi bharata so |rāma prema rasu kahi na parata so ||
tana mana bacana umaga anurāgā |dhīra dhuraṃdhara dhīraju tyāgā ||
bārija locana mocata bārī |dekhi dasā sura sabhā dukhārī ||
munigana guru dhura dhīra janaka se |gyāna anala mana kasẽ kanaka se ||
je birañci nirlepa upāe |paduma patra jimi jaga jala jāe ||
वह दुष्ट योजना सबके लिए अच्छी हो गई, क्योंकि नियत वनवास की आशा उनके हृदय के लिए जीवनदायी अमृत के समान थी। अन्यथा लक्ष्मण और सीता के वियोग से सब लोग घुटकर मर जाते, जैसे किसी भयंकर रोग से। राम की कृपा से वह उलझी बात सुधर गई, और देवताओं का वैरी समूह कल्याणकारी बन गया, जैसे गोहार जो सहायता लाती है। राम ने अपने भाई भरत को भुजाओं में भरकर गले लगाया, उस प्रेम का माधुर्य कहा नहीं जा सकता। तन, मन और वचन में प्रेम की उमंग उमड़ पड़ी, और धैर्यवान भरत ने भी धैर्य त्याग दिया। उनके कमल-नयनों से आँसू की धार बहने लगी, उनकी दशा देखकर देवताओं की सभा दुःखी हो गई। मुनियों, गुरुओं और जनक जैसे धीर पुरुषों के, जिनके मन ज्ञान की अग्नि में सोने की तरह कसे गए थे, जिन्हें ब्रह्मा ने जगत से अनलेप रूप में रचा था, जैसे जल में उत्पन्न कमल का पत्ता जल से अछूता रहता है।
दोहा 317
तेउ बिलोकि रघुबर भरत प्रीति अनूप अपार।भए मगन मन तन बचन सहित बिराग बिचार।।317।।
teu biloki raghubara bharata prīti anūpa apāra |bhae magana mana tana bacana sahita birāga bicāra ||317||
तब वे श्री राम और भरत की अनूप और अपार प्रीति को देखकर, मन, तन और वचन सहित वैराग्य और विचार के साथ मग्न हो गए।
चौपाई 318.1-4
जहाँ जनक गुर मति भोरी।प्राकृत प्रीति कहत बड़ि खोरी।।
बरनत रघुबर भरत बियोगू।सुनि कठोर कबि जानिहि लोगू।।
सो सकोच रसु अकथ सुबानी।समउ सनेहु सुमिरि सकुचानी।।
भेंटि भरत रघुबर समुझाए।पुनि रिपुदवनु हरषि हियँ लाए।।
सेवक सचिव भरत रुख पाई।निज निज काज लगे सब जाई।।
सुनि दारुन दुखु दुहूँ समाजा।लगे चलन के साजन साजा।।
प्रभु पद पदुम बंदि दोउ भाई।चले सीस धरि राम रजाई।।
मुनि तापस बनदेव निहोरी।सब सनमानि बहोरि बहोरी।।
jahā̃ janaka guru mati bhorī |prākṛta prīti kahata baṛi khorī ||
baranata raghubara bharata biyogū |suni kaṭhora kabi jānihi logū ||
so sakoca rasu akatha subānī |samau sanehu sumiri sakucānī ||
bhẽṭi bharata raghubara samujhāe |puni ripudavanu haraṣi hiyã lāe ||
sevaka saciva bharata rukha pāī |nija nija kāja lage saba jāī ||
suni dārun dukhu duhū̃ samājā |lage calana ke sājana sājā ||
prabhu pada paduma bandi dou bhāī |cale sīsa dhari rāma rajāī ||
muni tāpasa banadeva nihorī |saba sanamāni bahori bahorī ||
जहाँ जनक और गुरु वसिष्ठ मन में व्याकुल थे, वहाँ सामान्य लोगों के प्रेम का वर्णन करना बड़ी भूल होगी। यदि कोई कवि राम और भरत के वियोग का वर्णन करे, तो लोग सुनकर उसे कठोर हृदय वाला मानें। वह संकोच का भाव, वह अकथनीय कथा, उस अवसर और प्रेम को स्मरण कर वाणी की देवी भी सकुचा गई। राम ने भरत को गले लगाकर समझाया, फिर शत्रुघ्न को हर्षित होकर हृदय से लगाया। सेवक और सचिव भरत की इच्छा जानकर सब अपने-अपने काम में लग गए। दोनों दलों ने वह भयंकर विरह का दुःख सुनकर प्रस्थान की तैयारी करनी आरंभ की। दोनों भाइयों ने प्रभु के चरण कमलों को वंदना की और राम की आज्ञा सिर पर धारण कर प्रस्थान किया। मुनियों, तापसों और वनदेवताओं से विदा लेकर सबका बार-बार सम्मान किया।
दोहा 318
लखनहि भेंटि प्रनामु करि सिर धरि सिय पद धूरि।चले सप्रेम असीस सुनि सकल सुमंगल मूरि।।318।।
lakhanahi bheṇṭi pranāmu kari sir dhari siya pada dhūri |cale sa-prema asīsa suni sakala su-maṅgala mūri ||318||
लक्ष्मण को गले लगाकर और उन्हें प्रणाम करके, तथा सीता के चरणों की धूल सिर पर धारण करके, दोनों भाई स्नेहपूर्वक उनका आशीर्वाद सुनकर चले, जो सम्पूर्ण मंगलों का मूल है।
चौपाई 319.1-4
सानुज राम नृपहि सिर नाई।कीन्हि बहुत बिधि बिनय बड़ाई।।
देव दया बस बड़ दुखु पायउ।सहित समाज काननहिं आयउ।।
पुर पगु धारिअ देइ असीसा।कीन्ह धीर धरि गवनु महीसा।।
मुनि महिदेव साधु सनमाने।बिदा किए हरि हर सम जाने।।
सासु समीप गए दोउ भाई।फिरे बंदि पग आसिष पाई।।
कौसिक बामदेव जाबाली।पुरजन परिजन सचिव सुचाली।।
जथा जोगु करि बिनय प्रनामा।बिदा किए सब सानुज रामा।।
नारि पुरुष लघु मध्य बड़ेरे।सब सनमानि कृपानिधि फेरे।।
s-anuja rāma nṛpahi sir nāī |kīnhi bahuta bidhi binaya baṛāī ||
deva dayā basa baṛa dukhu pāyu |sahita samāja kānanahiṃ āyu ||
pura pagu dhāri-a dei asīsā |kīnha dhīra dhari gavanu mahīsā ||
muni mahideva sādhu sanamāne |bidā kiye hari hara sama jāne ||
sāsu samīpa gae dou bhāī |phire bandi paga āsiṣa pāī ||
kausika bāmadeva jāvālī |purajana parijana saciva sucālī ||
jathā jogu kari binaya pranāmā |bidā kiye saba s-anuja rāmā ||
nāri puruṣa laghu madhya baṛere |saba sanamāni kṛpānidhi phere ||
अनुज सहित राम ने राजा के सिर नवाए, और बहुत प्रकार से विनय और स्तुति के वचन कहे। "स्वामी, दया के वश में आपने बड़ा दुःख सहा, और समाज सहित वन में आए। अब आशीष देकर नगर की ओर पग धरें।" राजा ने धीरज धरकर प्रस्थान किया। मुनि, ब्राह्मण और साधुओं का सम्मान किया, और हरि-हर के समान जानकर विदा किया। दोनों भाई सास के पास गए, चरण बांधकर आशीष पाकर लौटे। कौशिक, वामदेव, जाबाली, नगर के लोग, परिजन और सुचाली सचिव, जिनके जैसा योग्य था वैसे विनय और प्रणाम करके, अनुज सहित राम ने सबको विदा किया। स्त्री-पुरुष, छोटे, मध्य और बड़े, सबका सम्मान करके कृपानिधि ने फेर दिया।
दोहा 319
भरत मातु पद बंदि प्रभु सुचि सनेहँ मिलि भेंटि।बिदा कीन्ह सजि पालकी सकुच सोच सब मेटि।।319।।
bharata mātu pada bandi prabhu suci sanehaṃ mili bheṇṭi |bidā kīnha saji pālakī sakuca soca saba meṭi ||319||
प्रभु ने भरत की माता के चरणों में प्रणाम किया और निर्मल प्रेम से उन्हें गले लगाया। फिर पालकी सजवाकर उन्हें विदा किया, सब संकोच और चिंता मिटा दी।
गुरु/संत-वचन की सर्वोच्चता: भरत ‘अनुशासन’ को राजाज्ञा से ऊपर मानकर आत्म-शासन सीखते हैं। शुचिता और सेवा का योग: जल-भाजन/स्नान केवल कर्मकांड नहीं, मन की निर्मलता और विनय का अभ्यास है। निष्काम कर्तव्य: राजधर्म का शुद्ध रूप—स्वार्थ-त्याग करके लोक-हित हेतु व्यवस्था करना। भ्रातृ-प्रेम का आध्यात्मिकीकरण: राम-विरह करुणा को निष्फल शोक नहीं रहने देता; वह सेवा-भक्ति में रूपांतरित होकर ‘आज्ञा-पालन’ की साधना बनता है।
अयोध्या-काण्ड का प्रमुख रस करुण है, पर उसका लक्ष्य शोक का विस्तार नहीं—शोक का शोधन है। राम-वनगमन के बाद ‘धर्म’ का केंद्र राजसिंहासन से हटकर ‘आज्ञा-पालन’ में प्रतिष्ठित होता है। इस खंड में तुलसीदास नीति, मर्यादा और प्रेम को एक ही धुरी पर रखते हैं: राम की विनयशीलता, भरत की निष्कामता, और गुरु-वचन की सर्वोच्चता। प्रस्तुत अंश में अत्रि-आश्रम का ‘पुण्य-भूगोल’ (भरतकूप) लोक-कल्याण का प्रतीक है—भक्ति का जल सार्वजनिक हो जाता है। फिर भरत का वन-परिक्रमा, तीरथों में निमज्जन-प्रणाम, और अंततः राम से ‘राजाज्ञा’ माँगना—यह सब साधक की आंतरिक यात्रा है: पहले पवित्रता (शुचिता), फिर दृष्टि-शोधन (दिव्य-दर्शन), और अंत में कर्तव्य-स्थापन (अवध-पालन) । इस तरह अयोध्या-काण्ड सोपान में ‘विरह-भक्ति’ को ‘सेवा-भक्ति’ में परिणत करता है।
करुण-रस से आरम्भ होकर (वनगमन-जन्य शोक की छाया) यह खंड शीघ्र ही शोक-शोधन की ओर मुड़ता है: (1) विनय और संकोच—भरत का अत्रि-आश्रम में अनुशासन स्वीकारना; (2) शुचिता-रस/शांत-रस—जल-भाजन, स्नान, सेवा-व्यवस्था द्वारा मन का ‘धर्म-स्थिर’ होना; (3) श्रद्धा-रस—मुनि-संत के वचन को सर्वोच्च मानकर अहं का गलना; (4) वीर-धर्म (धर्म-वीरता)—राज्य-लोभ का त्याग कर लोक-कल्याण हेतु कर्तव्य-ग्रहण; (5) अंत में शांत-भक्ति—सेवा-धर्म में प्रतिष्ठा, जहाँ करुणा ‘कर्तव्य’ बनकर स्थिर हो जाती है।
परंपरा में भरत-चरित्र के पाठ को ‘निष्काम सेवा, भ्रातृ-प्रेम, और राज्य/गृहस्थ-धर्म की शुद्धि’ का फलदायक माना गया है। ‘भरतकूप’ प्रसंग का स्मरण तीर्थ-स्नान-सदृश मन-शुद्धि और लोक-कल्याण-बुद्धि बढ़ाने वाला कहा जाता है—मन, वाणी, कर्म की ‘बिमलता’ (पंक्ति: ‘होइहहिं बिमल करम मन बानी’)।
इस खंड (भरत-विनय, पादुका-प्रदान, सेवा-धर्म) में साधारणतः राम-नाम-सम्पुट प्रचलित है: ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ या ‘राम राम’ का जप। कुछ परंपराओं में ‘भरतचरित’ के साथ ‘प्रनतपाल’ भाव हेतु ‘दीन दयाल’/‘कृपालु’ नाम-स्मरण भी जोड़ा जाता है।
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