
द्वादशः सर्गः — हनूमतः अन्तःपुरविचयः (Hanuman’s Search Through Ravana’s Inner Apartments)
सुन्दरकाण्ड
इस सर्ग में हनुमान लंका के मध्यवर्ती महाप्रासाद-समूह में फिर से क्रमबद्ध और सूक्ष्म खोज करते हैं। सीता-दर्शन की उत्कंठा से वे लता-गृहों, चित्रशालाओं, शयनकक्षों, भोज्य-सभाओं, क्रीड़ा-गृहों, उद्यान-पथों, भूमिगत कक्षों, देवालयों और अंतःपुर के भीतर-भीतर बसे अनेक निवासों तक पहुँचकर लगभग कोई भी स्थान बिना देखे नहीं छोड़ते। मुख्यतः यह हनुमान का अंतर्मंथन है—कार्य असफल होने का भय, सीता के आतंक या हिंसा से मृत्यु की आशंका, और समुद्र पार प्रतीक्षा कर रहे वानरों (जाम्बवान और अंगद आदि) की अपेक्षाओं तथा धर्म-कार्य की परिणतियों का विचार। नैतिक मोड़ पर वे निराशा त्यागते हैं और “अनिर्वेद” (अवसाद-रहित धैर्य) को समृद्धि और सिद्धि का मूल मानकर श्रेष्ठ प्रयत्न में पुनः प्रवृत्त होते हैं। अंत में अनेक अद्भुत स्त्रियाँ—विद्याधर और नाग-कन्याएँ—तथा विविध भयानक रूपों वाली राक्षसी परिचारिकाएँ तो दिखती हैं, पर जनकनंदिनी, राघवप्रिया सीता नहीं मिलती; शोक बढ़ता है, पर खोज का संकल्प और दृढ़ होता है।
Verse 1
स तस्य मध्ये भवनस्य मारुतिर्लतागृहांश्चित्रगृहान्निशागृहान्।जगाम सीतां प्रति दर्शनोत्सुकोन चैव तां पश्यति चारुदर्शनाम्।।।।
उस भवन के भीतर मारुति, सीता के दर्शन की उत्कंठा से, लता-गृहों, चित्रित गृहों और निशा-गृहों में गया; पर सुंदर दर्शना सीता को वह कहीं न देख सका।
Verse 2
स चिन्तयामास ततो महाकपिःप्रियामपश्यन्रघुनन्दनस्य ताम्।ध्रुवं हि सीता म्रियते यथा न मेविचिन्वतो दर्शनमेति मैथिली।।।।
तब महाकपि ने, रघुनन्दन की उस प्रिया को न पाकर, मन ही मन चिन्ता की—“निश्चय ही सीता नष्ट हो रही है; क्योंकि मैं खोजता हूँ, फिर भी मैथिली मेरे दर्शन में नहीं आती।”
Verse 3
सा राक्षसानां प्रवरेण जानकीस्वशीलसंरक्ष्णतत्परा सती।अनेन नूनं प्रति दुष्टकर्मणाहता भवेदार्यपथे परे स्थिता।।।।
आर्यपथ पर अडिग, अपने शील की रक्षा में तत्पर जनकी—इस दुष्टकर्मी राक्षसश्रेष्ठ के द्वारा निश्चय ही मारी गई होगी—ऐसा वह आशंकित हुआ।
Verse 4
विरूपरूपा विकृता विवर्चसोमहानना दीर्घविरूपदर्शनाः।समीक्ष्य सा राक्षसराजयोषितोभयाद्विनष्टा जनकेश्वरात्मजा।।।।
राक्षसराज की स्त्रियों को—कुरूप, विकृत, मलिनवर्ण, विशालमुख और दीर्घ-कुरूप रूप वाली—देखकर जनकनंदिनी (सीता) भय से मूर्छित हो गई होगी।
Verse 5
सीतामदृष्ट्वा ह्यनवाप्य पौरुषंविहृत्य कालं सह वानरैश्चिरम्।न मेऽस्ति सुग्रीवसमीपगा गतिःसुतीक्ष्णदण्डो बलवांश्च वानरः।।।।
यदि मैं सीता को देखे बिना लौटूँ—पराक्रम का प्रमाण पाए बिना और वानरों के साथ बहुत काल बिताकर—तो सुग्रीव के पास जाने का मुझे कोई मार्ग नहीं; वह बलवान वानर मुझे अत्यन्त कठोर दण्ड देगा।
Verse 6
दृष्टमन्तःपुरं सर्वं दृष्टा रावणयोषितः।न सीता दृश्यते साध्वीवृथा जातो मम श्रमः।।।।
मैंने समस्त अन्तःपुर देख लिया, रावण की स्त्रियाँ भी देख लीं; पर साध्वी सीता नहीं दिखती—मेरा परिश्रम व्यर्थ हो गया।
Verse 7
किं नु मां वानराः सर्वे गतं वक्ष्यन्ति सङ्गताः।गत्वा तत्र त्वया वीर किं कृतं तद्वदस्व नः।।।।
जब मैं लौटूँगा, तब एकत्र हुए सब वानर मुझसे क्या कहेंगे—“हे वीर, वहाँ जाकर तुमने क्या किया? हमें बताओ।”
Verse 8
अदृष्ट्वा किं प्रवक्ष्यामि तामहं जनकात्मजाम्।ध्रुवं प्रायमुपैष्यन्ति कालस्य व्यतिवर्तने।।।।
जनकनन्दिनी को देखे बिना मैं क्या कहूँगा? समय-सीमा बीत जाने पर वे निश्चय ही प्रायोपवेश (उपवास करके प्राणत्याग) का संकल्प करेंगे।
Verse 9
किं वा वक्ष्यति वृद्धश्च जाम्बवानाङ्गदश्च सः।गतं पारं समुद्रस्य वानराश्च समागताः।।।।
समुद्र के उस पार पहुँचे हुए मुझे प्रतीक्षा करते हुए एकत्र वानरों के बीच वृद्ध जाम्बवान क्या कहेंगे? और अङ्गद क्या कहेगा?
Verse 10
अनिर्वेदः श्रियो मूलमनिर्वेदः परं सुखम्।अनिर्वेदो हि सततं सर्वार्थेषु प्रवर्तकः।।।।
निराशा-रहित होना ही श्री (समृद्धि) का मूल है; निराशा-रहित होना ही परम सुख है। वास्तव में निराशा-रहित भाव ही सब कार्यों में सदा प्रवृत्त कराने वाला है।
Verse 11
करोति सफलं जन्तोः कर्म यत्तत्करोति सः।तस्मादनिर्वेदकृतं यत्नं चेष्टेऽहमुत्तमम्।।।।भूयस्तावद्विचेष्यामि देशान्रावणपालितान्।
जीव जो भी कर्म करता है, वही कर्म वह फलवती कर देता है। इसलिए मैं निराशा त्यागकर उत्तम प्रयत्न करूँगा। अब फिर से रावण-रक्षित प्रदेशों में खोज करूँगा।
Verse 12
आपानशाला विचितास्तथा पुष्पगृहाणि च।।।।चित्रशालाश्च विचिता भूयः क्रीडागृहाणि च।निष्कुटान्तररथ्याश्च विमानानि च सर्वशः।।।।
मैंने मदिरा-गृह, पुष्प-गृह भी खोजे; चित्र-शालाएँ और क्रीड़ा-गृह भी फिर-फिर देखे। उपवन-प्रांगणों की भीतर की गलियाँ और सर्वत्र विमान-प्रासाद भी मैंने छान डाले।
Verse 13
आपानशाला विचितास्तथा पुष्पगृहाणि च।।5.12.12।।चित्रशालाश्च विचिता भूयः क्रीडागृहाणि च।निष्कुटान्तररथ्याश्च विमानानि च सर्वशः।।5.12.13।।
मैंने मदिरा-गृह, पुष्प-गृह भी खोजे; चित्र-शालाएँ और क्रीड़ा-गृह भी फिर-फिर देखे। उपवन-प्रांगणों की भीतर की गलियाँ और सर्वत्र विमान-प्रासाद भी मैंने छान डाले।
Verse 14
इति सञ्चिन्त्य भूयोऽपि विचेतुमुपचक्रमे।भूमीगृहांश्चैत्यगृहान् गृहातिगृहकानपि।।।।
ऐसा विचार करके वह फिर से खोज में लग गया—भूमिगत कक्षों, चैत्य-गृहों और घरों के भीतर बने घरों तक में वह घूम-घूमकर देखने लगा।
Verse 15
उत्पतन्निष्पतंश्चापि तिष्ठन्गच्छन् पुनः पुनः।अपावृण्वंश्च द्वाराणि कवाटान्यवघाटयन्।।।।प्रविशन्निष्पतंश्चापि प्रपतन्नुत्पतन्नपि।सर्वमप्यवकाशं स विचचार महाकपिः।।।।
वह बार-बार उछलता और कूदकर उतरता, कभी ठहरता, कभी चलता; द्वार खोलता और कपाटों को धकेलता। भीतर घुसता, फिर बाहर निकलता; कहीं गिरकर उतरता, कहीं उछलकर चढ़ता—वह महाकपि खोज योग्य हर स्थान में विचरता रहा।
Verse 16
उत्पतन्निष्पतंश्चापि तिष्ठन्गच्छन् पुनः पुनः।अपावृण्वंश्च द्वाराणि कवाटान्यवघाटयन्।।5.12.15।।प्रविशन्निष्पतंश्चापि प्रपतन्नुत्पतन्नपि।सर्वमप्यवकाशं स विचचार महाकपिः।।5.12.16।।
वह बार-बार उछलता और कूदकर उतरता, कभी ठहरता, कभी चलता; द्वार खोलता और कपाटों को धकेलता। भीतर घुसता, फिर बाहर निकलता; कहीं गिरकर उतरता, कहीं उछलकर चढ़ता—वह महाकपि खोज योग्य हर स्थान में विचरता रहा।
Verse 17
चतुरङ्गुलमात्रोऽपि नावकाशः स विद्यते।रावणान्तःपुरे तस्मिन् यं कपिर्न जगाम सः।।।।
रावण के उस अंतःपुर में चार अंगुल मात्र का भी ऐसा स्थान न रहा, जहाँ वह वानर न गया हो; वह सर्वत्र पहुँच गया।
Verse 18
प्राकारान्तररथ्याश्च वेदिकाश्चैत्यसंश्रयाः।दीर्घिकाः पुष्करिण्यश्च सर्वं तेनावलोकितम्।।।।
प्राकारों के भीतर की गलियाँ, वेदिकाएँ, चैत्य-परिसर, तथा कूप और पुष्करिणियाँ—यह सब उसने भली-भाँति देख लिया।
Verse 19
राक्षस्यो विविधाकारा विरूपा विकृतास्तथा।दृष्टा हनुमता तत्र न तु सा जनकात्मजा।।।।
वहाँ हनुमान ने अनेक रूपों वाली, कुरूप और विकृत राक्षसियों को तो देखा; पर जनकनन्दिनी सीता को नहीं देखा।
Verse 20
रूपेणाप्रतिमा लोके वरा विद्याधरस्त्रियः।दृष्टा हनुमता तत्र न तु राघवनन्दिनी।।।।
वहाँ हनुमान् ने लोक में रूप से अनुपम, श्रेष्ठ विद्याधर-स्त्रियों को तो देखा, पर राघव की प्रिया (सीता) को नहीं देखा।
Verse 21
नागकन्या वरारोहाः पूर्णचन्र्दनिभाननाः।दृष्टा हनुमता तत्र न तु सीता सुमध्यमा।।।।
वहाँ हनुमान् ने सुन्दर आरोहण वाली, पूर्णचन्द्र के समान मुख वाली नागकन्याएँ देखीं; पर सुमध्यमा सीता को नहीं देखा।
Verse 22
प्रमथ्य राक्षसेन्द्रेण नागकन्या बलाद्धृताः।दृष्टा हनुमता तत्र न सा जनकनन्दिनी।।।।
वहाँ हनुमान् ने राक्षसों के स्वामी द्वारा परास्त करके बलपूर्वक हर ली गई नागकन्याएँ देखीं; पर जनकनन्दिनी सीता वह नहीं थी।
Verse 23
सोऽपश्यंस्तां महाबाहुः पश्यंश्चान्या वरस्त्रियः।विषसाद मुहुर्धीमान् हनुमान् मारुतात्मजः।।।।
अन्य श्रेष्ठ स्त्रियों को देखते हुए भी उसे न देखकर, महाबाहु, बुद्धिमान् मारुतात्मज हनुमान् बार-बार विषाद में डूब गया।
Verse 24
उद्योगं वानरेन्द्राणां प्लवनं सागरस्य च।व्यर्थं वीक्ष्यानिलसुतश्चिन्तां पुनरुपागमत्।।।।
वानर-श्रेष्ठों के उद्योग और सागर-लङ्घन को भी व्यर्थ जानकर, अनिलसुत हनुमान् फिर से चिन्ता में पड़ गया।
Verse 25
अवतीर्य विमानाच्च हनुमान् मारुतात्मजः।चिन्तामुपजगामाथ शोकोपहतचेतनः।।।।
विमान से उतरकर पवनपुत्र हनुमान, शोक से आहत चित्त होकर, फिर चिंता में डूब गए।
Hanumān faces the crisis of apparent failure—after exhaustive searching he still cannot find Sītā—yet he chooses continued, systematic effort over retreat, self-blame, or abandonment of duty to the vānaras and to Rāma’s mandate.
The sarga foregrounds “anirveda” (non-despondency) as a practical ethic: freedom from despair is framed as the root of prosperity and the constant catalyst that initiates success in all aims, enabling renewed effort even when outcomes are uncertain.
The narrative maps Laṅkā’s palace ecology: Rāvaṇa’s antaḥpura, banquet halls, creeper-bowers and flower houses, picture galleries, night chambers, sports halls, garden lanes within boundary walls, shrines/altars, underground cells, water structures (wells and tanks), and the Pushpaka Vimāna as a searched locus.
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