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Sarga 51

स्वयंप्रभा-प्रश्नोत्तरम् / Svayamprabha Explains the Golden Forest and Questions the Vanaras

किष्किन्धाकाण्ड

इस सर्ग में अन्धकारमय गुफा के भीतर पहुँचे वानर—भूख-प्यास से अत्यन्त क्लान्त—अचानक एक अद्भुत, प्रकाशमान ‘काञ्चन वन’ देखते हैं। वहाँ रत्न-जालों से सुसज्जित भवन, स्वर्ण-वृक्ष, कमल-सरोवर तथा मछलियाँ और कछुए आदि आश्चर्यजनक जीव-वनस्पतियाँ हैं। विस्मित होकर हनुमान् मुख्य वक्ता बनते हैं और पूछते हैं कि यह सब किस तपः-शक्ति या किसके प्रभाव से उत्पन्न हुआ है। तब धर्मपरायणा, सर्वहित-निरता तपस्विनी स्त्री स्वयम्प्रभा बताती है कि यह वन और स्वर्ण-गृह मायानामक शक्तिशाली, छल-प्रवीण दानव द्वारा ‘माया’ से रचे गए थे; इसकी शिल्प-परम्परा दानव-प्रधानों में विश्वकर्मा से जुड़ी मानी जाती है। माया ने दीर्घ तप करके ब्रह्मा से वर पाए और अप्सरा हेमा पर आसक्त होने पर इन्द्र के वज्र से मारा गया। इसके बाद ब्रह्मा ने हेमा को यह काञ्चन वन और स्वर्ण-भवन स्थायी रूप से प्रदान किया तथा मेरु-सावर्णि की पुत्री स्वयम्प्रभा को वर-रक्षित संरक्षिका के रूप में नियुक्त किया। अन्त में स्वयम्प्रभा वानरों का आतिथ्य कर मूल, फल और जल देने का प्रस्ताव करती है और सीधे प्रश्न करती है कि उनका प्रयोजन क्या है तथा वे इस दुर्गम वन तक कैसे पहुँचे—जिससे यह प्रसंग अद्भुत-वर्णन के साथ उनके अभियान-प्रकटन का द्वार बन जाता है।

Shlokas

Verse 1

इत्युक्त्वा हनुमांस्तत्र पुनः कृष्णाजिनाम्बराम्।अब्रवीत्तां महाभागां तापसीं धर्मचारिणीम्।।4.51.1।।

ऐसा कहकर हनुमान् ने वहाँ फिर उस महाभागा तापसी से कहा, जो कृष्णमृगचर्म का वस्त्र धारण करती थी और धर्माचरण में निष्ठ थी।

Verse 2

इदं प्रविष्टास्सहसा बिलं तिमिरसंवृतम्।क्षुत्पिपासापरिश्रान्ताः परिखिन्नाश्च सर्वशः।।4.51.2।।

हम भूख-प्यास से अत्यन्त थके और चारों ओर से क्लान्त होकर, अन्धकार से ढकी इस गुफा में सहसा प्रवेश कर गए।

Verse 3

महद्धरण्या विवरं प्रविष्टाः स्म पिपासिताः।इमां स्त्वेवंविधान्भावान्विविधानद्भुतोपमान्।।4.51.3।।दृष्ट्वा वयं प्रव्यथितास्सम्भ्रान्ता नष्टचेतसः।

हम प्यास से व्याकुल होकर पृथ्वी के इस विशाल विवर में प्रविष्ट हुए; और इन नाना प्रकार के अद्भुत दृश्यों को देखकर हम व्यथित, भ्रमित और मानो चेतना-शून्य हो गए।

Verse 4

कस्यैते काञ्चना वृक्षास्तरुणादित्यसन्निभाः।।4.51.4।।शुचीन्यभ्यवहार्याणि मूलानि च फलानि च।काञ्चनानि विमानानि राजतानि गृहाणि च।।4.51.5।।तपनीयगवाक्षाणि मणिजालावृतानि च।

ये उगते सूर्य के समान दीप्तिमान स्वर्ण-वृक्ष किसके हैं? और ये पवित्र, स्वादिष्ट मूल और फल किसके लिए हैं?

Verse 5

कस्यैते काञ्चना वृक्षास्तरुणादित्यसन्निभाः।।4.51.4।।शुचीन्यभ्यवहार्याणि मूलानि च फलानि च।काञ्चनानि विमानानि राजतानि गृहाणि च।।4.51.5।।तपनीयगवाक्षाणि मणिजालावृतानि च।

ये स्वर्ण-विमान और रजत-गृह किसके हैं? इनके तपनीय (शुद्ध स्वर्ण) झरोखे रत्न-जालियों से आच्छादित होकर चमक रहे हैं।

Verse 6

पुष्पिताः फलवन्तश्च पुण्यास्सुरभिगन्धिनः।।4.51.6।।इमे जाम्बूनदमयाः पादपाः कस्य तेजसा।काञ्चनानि च पद्मानि जातानि विमले जले।।4.51.7।।कथं मत्स्याश्च सौवर्णा दृश्यन्ते सह कच्छपैः।आत्मानमनुभावं च कस्य चैतत्तपोबलम्।।4.51.8।।अजानतां न स्सर्वेषां सर्वमाख्यातुमर्हसि।

ये वृक्ष पुष्पित और फल-सम्पन्न हैं—पुण्य और सुगन्धित; किसके तेज से ये जाम्बूनद-स्वर्णमय बने हैं?

Verse 7

पुष्पिताः फलवन्तश्च पुण्यास्सुरभिगन्धिनः।।4.51.6।।इमे जाम्बूनदमयाः पादपाः कस्य तेजसा।काञ्चनानि च पद्मानि जातानि विमले जले।।4.51.7।।कथं मत्स्याश्च सौवर्णा दृश्यन्ते सह कच्छपैः।आत्मानमनुभावं च कस्य चैतत्तपोबलम्।।4.51.8।।अजानतां न स्सर्वेषां सर्वमाख्यातुमर्हसि।

इस निर्मल जल में स्वर्ण-कमल कैसे उत्पन्न हुए हैं?

Verse 8

पुष्पिताः फलवन्तश्च पुण्यास्सुरभिगन्धिनः।।4.51.6।।इमे जाम्बूनदमयाः पादपाः कस्य तेजसा।काञ्चनानि च पद्मानि जातानि विमले जले।।4.51.7।।कथं मत्स्याश्च सौवर्णा दृश्यन्ते सह कच्छपैः।आत्मानमनुभावं च कस्य चैतत्तपोबलम्।।4.51.8।।अजानतां न स्सर्वेषां सर्वमाख्यातुमर्हसि।

कच्छपों के साथ ये स्वर्ण-मछलियाँ कैसे दिखाई देती हैं? यह सब किसके तपोबल का प्रभाव है? हम सब अज्ञानी हैं—आप कृपा करके सब कुछ बताने योग्य हैं।

Verse 9

एवमुक्ता हनुमता तापसी धर्मचारिणी।।4.51.9।।प्रत्युवाच हनूमन्तं सर्वभूतहिते रता।

हनुमान द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, धर्म का आचरण करने वाली, सर्वभूत-हित में रत वह तापसी हनुमान को उत्तर देने लगी।

Verse 10

मयो नाम महातेजा मायावी वानरर्षभः।।4.51.10।।तेनेदं निर्मितं सर्वं मायया काञ्चनं वनम्।

हे वानरश्रेष्ठ! ‘मय’ नाम का एक महातेजस्वी मायावी था। उसी ने अपनी माया-शक्ति से यह समूचा स्वर्णमय वन रचा है।

Verse 11

पुरा दानवमुख्यानां विश्वकर्मा बभूव ह।।4.51.11।।येनेदं काञ्चनं दिव्यं निर्मितं भवनोत्तमम्।

प्राचीन काल में दानवों के प्रमुखों में एक विश्वकर्मा था; उसी ने इस दिव्य, स्वर्णमय, श्रेष्ठ भवन का निर्माण किया।

Verse 12

स तु वर्षसहस्राणि तपस्तप्त्वा महावने।।4.51.12।।पितामहाद्वरं लेभे सर्वमौशनसं धनम्।

उसने महावन में सहस्रों वर्षों तक तप किया और पितामह ब्रह्मा से वर पाकर औशनस (शुक्राचार्य) से सम्बद्ध समस्त धन प्राप्त किया।

Verse 13

वनं विधाय बलवान्सर्वकामेश्वरस्तदा।।4.51.13।।उवास सुखितः कालं कञ्चिदस्मिन्महावने।

तब वह बलवान्, सर्वकामों का स्वामी, इस महावन को रचकर कुछ काल तक यहीं सुखपूर्वक निवास करता रहा।

Verse 14

तमप्सरसि हेमायां सक्तं दानवपुङ्गवम्।।4.51.14।।विक्रम्यैवाशनिं गृह्य जघानेत्रः पुरन्दरः।

जब वह दानवश्रेष्ठ अप्सरा हेमा में आसक्त हो गया, तब पुरन्दर इन्द्र ने पराक्रम करके वज्र उठाया और उसे मार गिराया।

Verse 15

इदं च ब्रह्मणा दत्तं हेमायै वनमुत्तमम्।।4.51.15।।शाश्वता: कामभोगश्च गृहं चेदं हिरण्मयम्।

यह उत्तम वन ब्रह्मा ने हेमा को प्रदान किया; साथ ही शाश्वत कामभोग और यह स्वर्णमय गृह भी।

Verse 16

दुहिता मेरुसावर्णेरहं तस्यास्स्वयंप्रभा।।4.51.16।।इदं रक्षामि भवनं हेमाया वानरोत्तम।

हे वानरोत्तम! मैं मेरुसावर्णि की पुत्री स्वयम्प्रभा हूँ। यह हेमा का भवन है; इसकी मैं रक्षा करती हूँ।

Verse 17

मम प्रियसखी हेमा नृत्तगीतविशारदा।।4.51.17।।तया दत्तवरा चास्मि रक्षामि भवनोत्तमम्।

मेरी प्रिय सखी हेमा नृत्य-गीत में निपुण है। उसी ने मुझे वरदान दिया है; इसलिए मैं इस उत्तम भवन की रक्षा करती हूँ।

Verse 18

किं कार्यं कस्य वा हेतोः कान्ताराणि प्रपश्यथ।।4.51.18।।कथं चेदं वनं दुर्गं युष्माभिरुपलक्षितम्।

तुम्हारा क्या कार्य है, और किस हेतु से तुम इन निर्जन कान्तारों में भटक रहे हो? और यह दुर्गम वन तुमने कैसे खोज लिया?

Verse 19

इमान्यभ्यवहार्याणि मूलानि च फलानि च।।4.51.19।।भुक्त्वा पीत्वा च पानीयं सर्वं मे वक्तुमर्हथ।

इन खाने योग्य कन्द-मूल और फलों को खाकर तथा यह जल पीकर, फिर तुम सब कुछ मुझे बताने योग्य हो।

Frequently Asked Questions

The Vanaras’ urgent action—entering an unknown, dark cave without permission due to hunger and thirst—raises a practical dharma question about necessity versus propriety; the episode resolves it through truthful confession, respectful inquiry, and the host’s compassionate hospitality.

Marvels can arise from māyā, tapas, and divine grants; therefore, disciplined questioning and ethical conduct are required to interpret extraordinary experiences without losing discernment or mission-focus.

An inaccessible cave region opening into a ‘kāñcana vana’ with hiraṇmaya dwellings, gem-lattice windows, and golden aquatic life—presented as a liminal, otherworldly landmark that functions as a narrative checkpoint before the search party’s mission is disclosed.