Sarga 40 Hero
Kishkindha KandaSarga 4070 Verses

Sarga 40

पूर्वदिशि सीतामार्गण-नियोगः (Deployment to the Eastern Quarter for the Search of Sita)

किष्किन्धाकाण्ड

इस सर्ग में सुग्रीव श्रीराम को वानरसेना की समृद्धि का निवेदन करके उनकी आज्ञा चाहता है। श्रीराम सुग्रीव को आलिंगन देकर मुख्य लक्ष्य बताते हैं—वैदेही सीता के जीवित या मृत होने का निश्चय तथा रावण के निवास-प्रदेश का पता लगाना। फिर वे नेतृत्व-धर्म सुग्रीव को सौंपते हैं कि वानरसेना का संचालन सुग्रीव के अधिकार में है, राम-लक्ष्मण के नहीं। सुग्रीव विनत नामक यूथपति को बुलाकर पूर्व दिशा में सीता-अन्वेषण हेतु नियुक्त करता है और उसके देश-काल-नीति से युक्त निर्णय-कौशल की प्रशंसा करते हुए एक लाख वानरों के साथ प्रस्थान का आदेश देता है। खोज-मार्ग के मानचित्र में नदियाँ, जनपद, पर्वत, द्वीप, समुद्र तथा यवद्वीप, शिशिर पर्वत, लोहित सागर, क्षीरोद, जलोद, जातरूपशिला, अनन्त, उदय पर्वत आदि अद्भुत लोकों का विस्तृत निर्देश दिया जाता है। अंत में सुग्रीव एक मास की समय-सीमा निश्चित करता है और न लौटने पर वध-दण्ड का विधान करता है; इस प्रकार अन्वेषण शास्त्रीय रणनीति के अनुसार अनुशासित रूप से संचालित होता है।

Shlokas

Verse 1

अथ राजा समृद्धार्थस्सुग्रीवः प्लवगेश्वरः।उवाच नरशार्दूलं रामं परबलार्दनम्।।4.40.1।।

तब समस्त साधनों से सम्पन्न वानराधिपति राजा सुग्रीव ने शत्रुबल का दमन करने वाले नरशार्दूल श्रीराम से यह वचन कहा।

Verse 2

आगता विनिविष्टाश्च बलिनः कामरूपिणः।वानरा वारणेन्द्रभा: ये मद्विषयवासिनः।।4.40.2।।

मेरे राज्य में रहने वाले बलवान, इच्छानुसार रूप धारण करने वाले, गजराज के समान विशाल वानर-वीर आकर अपने-अपने स्थानों पर स्थित हो गए हैं।

Verse 3

त इमे बहुविक्रान्तैर्हरिभिर्भीमविक्रमैः।आगता वानरा घोरा दैत्यदानवसन्निभाः।।4.40.3।।

वे भयानक वानर-वीर—अत्यन्त पराक्रमी, भीषण विक्रम वाले, और रूप में दैत्य-दानवों के समान—यहाँ आ पहुँचे हैं॥

Verse 4

ख्यातकर्मापदानाश्च बलवन्तो जितक्लमाः।पराक्रमेषु विख्याता व्यवसायेषु चोत्तमाः।।4.40.4।।पृथिव्यम्बुचरा राम नानानगनिवासिनः।कोट्यग्रश इमे प्राप्ता वानरास्तव किङ्कराः।।4.40.5।।

हे राम! ये वानर अपने पूर्वकर्मों के लिए प्रसिद्ध, बलवान, श्रम को जीतने वाले, पराक्रम में विख्यात और उद्योग में श्रेष्ठ हैं। वे भूमि और जल में विचरण करने वाले, अनेक पर्वतों पर निवास करने वाले हैं; असंख्य कोटियों की संख्या में ये तुम्हारे सेवक बनकर यहाँ आ पहुँचे हैं।

Verse 5

ख्यातकर्मापदानाश्च बलवन्तो जितक्लमाः।पराक्रमेषु विख्याता व्यवसायेषु चोत्तमाः।।4.40.4।।पृथिव्यम्बुचरा राम नानानगनिवासिनः।कोट्यग्रश इमे प्राप्ता वानरास्तव किङ्कराः।।4.40.5।।

हे राम! ये वानर अपने पूर्वकर्मों के लिए प्रसिद्ध, बलवान, श्रम को जीतने वाले, पराक्रम में विख्यात और उद्योग में श्रेष्ठ हैं। वे भूमि और जल में विचरण करने वाले, अनेक पर्वतों पर निवास करने वाले हैं; असंख्य कोटियों की संख्या में ये तुम्हारे सेवक बनकर यहाँ आ पहुँचे हैं।

Verse 6

निदेशवर्तिनस्सर्वे सर्वे गुरुहिते रताः।अभिप्रेतमनुष्ठातुं तव शक्ष्यन्त्यरिन्दम।।4.40.6।।

हे अरिंदम! वे सब आज्ञा के पालनकर्ता हैं, सब गुरुजनों के हित में रत हैं; और जो कुछ आप अभिप्रेत करते हैं, उसे वे अवश्य सम्पन्न कर सकेंगे।

Verse 7

त इमे बहुसाहस्रैरनीकै भीमविक्रमैः।आगता वानरा घोरा दैत्यदानवसन्निभा:।।4.40.7।।

ये देखो, अनेक सहस्रों की सेनाओं सहित, भयानक पराक्रम वाले वे घोर वानर आ पहुँचे हैं, जो बल में दैत्य-दानवों के समान प्रतीत होते हैं।

Verse 8

यन्मन्यसे नरव्याघ्र प्राप्तकालं तदुच्यताम्।तत्सैन्यं त्वद्वशे युक्तमाज्ञापयितुमर्हसि।।4.40.8।।

हे नरव्याघ्र, जो समय तुम्हें उचित लगे, वही बताइए। यह सेना आपके वश में, आज्ञा के लिए तत्पर है—आप आदेश देने योग्य हैं।

Verse 9

काममेषामिदं कार्यं विदितं मम तत्त्वतः।तथापि तु यथातत्त्वमाज्ञापयितुमर्हसि।।4.40.9।।

इनका यह कार्य मुझे तत्त्वतः ज्ञात है, फिर भी यथोचित और यथार्थ रूप से आदेश देना आपको ही शोभता है।

Verse 10

इति ब्रुवाणं सुग्रीवं रामो दशरथात्मजः।बाहुभ्यां सम्परिष्वज्य इदं वचनमब्रवीत्।।4.40.10।।

इस प्रकार कहते हुए सुग्रीव को दशरथनन्दन श्रीराम ने दोनों भुजाओं से आलिंगन किया और फिर यह वचन कहा।

Verse 11

ज्ञायतां मम वैदेही यदि जीवति वा न वा।स च देशो महाप्राज्ञ यस्मिन्वसति रावणः।।4.40.11।।

हे महाप्राज्ञ! यह ज्ञात किया जाए कि मेरी वैदेही जीवित है या नहीं; और वह प्रदेश भी जहाँ रावण निवास करता है।

Verse 12

अधिगम्य तु वैदेहीं निलयं रावणस्य च।प्राप्तकालं विधास्यामि तस्मिन्काले सह त्वया।।4.40.12।।

वैदेही का पता लगाकर और रावण के निवास-स्थान को जानकर, उचित समय आने पर मैं उसी समय तुम्हारे साथ कार्य करूँगा।

Verse 13

नाहमस्मिन् प्रभुः कार्ये वानरेश न लक्ष्मणः।त्वमस्य हेतुः कार्यस्य प्रभुश्च प्लवगेश्वर।।4.40.13।।

हे वानरराज! इस कार्य में न मैं अधिकारी हूँ, न लक्ष्मण। इस कार्य के हेतु भी तुम ही हो और इसके स्वामी भी, हे कपिश्रेष्ठ।

Verse 14

त्वमेवाऽज्ञापय विभो मम कार्यविनिश्चयम्।त्वं हि जानासि यत्कार्यं मम वीर न संशयः।।4.40.14।।

हे विभो! मेरे कार्य का निश्चय करने वाली आज्ञा तुम ही दो। हे वीर! मेरे लिए क्या करना चाहिए, यह तुम जानते हो—इसमें संदेह नहीं।

Verse 15

सुहृद्वितीयो विक्रान्तः प्राज्ञः कालविशेषवित्।भवानस्मध्दिते युक्त स्सुकृतार्थोऽर्थवित्तमः।।4.40.15।।

तुम मेरे दूसरे सुहृद हो—पराक्रमी, प्राज्ञ और समय-विशेष को जानने वाले। तुम हमारे हित में तत्पर, कार्य-साधन में समर्थ और उद्देश्य-ज्ञान में श्रेष्ठ हो।

Verse 16

एवमुक्तस्तु सुग्रीवो विनतं नाम यूथपम्।अब्रवीद्रामसान्निध्ये लक्ष्मणस्य च धीमतः।।4.40.16।।शैलाभं मेघनिर्घोषमूर्जितं प्लवगेश्वरः।

ऐसा कहे जाने पर वानराधिपति सुग्रीव ने श्रीराम और बुद्धिमान लक्ष्मण के सान्निध्य में ‘विनत’ नामक यूथपति से कहा—जो पर्वत-सा विशाल, मेघ-गर्जन-सा नादवान और बलवान था।

Verse 17

सोमसूर्यात्मजै स्सार्धं वानरैर्वानरोत्तम।।4.40.17।।देशकालनयैर्युक्तः कार्या कार्यविनिश्चये।वृतश्शतसहश्रेण वानराणां तरस्विनाम्।।4.40.18।।अधिगच्छ दिशं पूर्वां सशैलवनकाननाम्।

हे वानरोत्तम! चन्द्र और सूर्य के पुत्रों सहित वानरों के साथ, देश-काल के अनुरूप नीति से युक्त होकर कार्य-निर्णय में समर्थ तुम, तेजस्वी वानरों के एक लाख दल से घिरकर, पर्वत-वन-काननों से युक्त पूर्व दिशा की ओर प्रस्थान करो।

Verse 18

सोमसूर्यात्मजै स्सार्धं वानरैर्वानरोत्तम।।4.40.17।।देशकालनयैर्युक्तः कार्या कार्यविनिश्चये।वृतश्शतसहश्रेण वानराणां तरस्विनाम्।।4.40.18।।अधिगच्छ दिशं पूर्वां सशैलवनकाननाम्।

हे वानरोत्तम! चन्द्र और सूर्य के पुत्रों सहित वानरों के साथ, देश-काल के अनुरूप नीति से युक्त होकर कार्य-निर्णय में समर्थ तुम, तेजस्वी वानरों के एक लाख दल से घिरकर, पर्वत-वन-काननों से युक्त पूर्व दिशा की ओर प्रस्थान करो।

Verse 19

तत्र सीतां च वैदेहीं निलयं रावणस्य च।।4.40.19।।मार्गध्वं गिरिशृङ्गेषु वनेषु च नदीषु च।

वहाँ वैदेही सीता तथा रावण के निवास का भी अन्वेषण करो। पर्वत-शिखरों पर, वनों में और नदियों के तटों पर सर्वत्र खोज करो।

Verse 20

नदीं भागीरथीं रम्यां सरयूं कौशिकीं तथा।।4.40.20।।कालिन्दीं यमुनां रम्यां यामुनं च महागिरिम्।सरस्वतीं च सिन्धुं च शोणं मणिनिभोदकम्।।4.40.21।।महीं कालमहीं चैव शैलकाननशोभिताम्।ब्रह्ममालान्विदेहांश्च मालवान्कालिकोसलान्।।4.40.22।।मागधांश्च महाग्रामान्पुण्ड्रांन्वङ्गां स्तथैव च।पत्तनं कोशकाराणां भूमिं च रजताकराम्।।4.40.23।।

रमणीय भागीरथी नदी में, तथा सरयू और कौशिकी के तटों पर भी सीता का अन्वेषण करो।

Verse 21

नदीं भागीरथीं रम्यां सरयूं कौशिकीं तथा।।4.40.20।।कालिन्दीं यमुनां रम्यां यामुनं च महागिरिम्।सरस्वतीं च सिन्धुं च शोणं मणिनिभोदकम्।।4.40.21।।महीं कालमहीं चैव शैलकाननशोभिताम्।ब्रह्ममालान्विदेहांश्च मालवान्कालिकोसलान्।।4.40.22।।मागधांश्च महाग्रामान्पुण्ड्रांन्वङ्गां स्तथैव च।पत्तनं कोशकाराणां भूमिं च रजताकराम्।।4.40.23।।

रमणीय कालिन्दी-यमुना के तट पर, तथा ‘यामुन’ नामक महापर्वत पर; और सरस्वती, सिन्धु तथा मणि-सम निर्मल जल वाली शोण नदी के किनारों पर भी खोज करो।

Verse 22

नदीं भागीरथीं रम्यां सरयूं कौशिकीं तथा।।4.40.20।।कालिन्दीं यमुनां रम्यां यामुनं च महागिरिम्।सरस्वतीं च सिन्धुं च शोणं मणिनिभोदकम्।।4.40.21।।महीं कालमहीं चैव शैलकाननशोभिताम्।ब्रह्ममालान्विदेहांश्च मालवान्कालिकोसलान्।।4.40.22।।मागधांश्च महाग्रामान्पुण्ड्रांन्वङ्गां स्तथैव च।पत्तनं कोशकाराणां भूमिं च रजताकराम्।।4.40.23।।

पर्वतों और वनों से शोभित मही और कालमही में भी खोज करो; तथा ब्रह्ममाल, विदेह, मालव, काशी और कोसल देशों में भी अन्वेषण करो।

Verse 23

नदीं भागीरथीं रम्यां सरयूं कौशिकीं तथा।।4.40.20।।कालिन्दीं यमुनां रम्यां यामुनं च महागिरिम्।सरस्वतीं च सिन्धुं च शोणं मणिनिभोदकम्।।4.40.21।।महीं कालमहीं चैव शैलकाननशोभिताम्।ब्रह्ममालान्विदेहांश्च मालवान्कालिकोसलान्।।4.40.22।।मागधांश्च महाग्रामान्पुण्ड्रांन्वङ्गां स्तथैव च।पत्तनं कोशकाराणां भूमिं च रजताकराम्।।4.40.23।।

मागध देश के महान् ग्रामों में, तथा पुण्ड्र और वङ्ग में भी खोज करो। रेशम-कारों के पत्तन में और रजत-खानों से प्रसिद्ध उस भूमि में भी अन्वेषण करो।

Verse 24

सर्वमेतद्विचेतव्यं मृगयद्भिस्ततस्ततः।रामस्य दयितां भार्यां सीतां दशरथस्नुषाम्।।4.40.24।।

इधर-उधर बार-बार खोज करते हुए इन सब स्थानों का भली-भाँति अन्वेषण करना चाहिए—राम की प्रियतमा भार्या, दशरथ की स्नुषा सीता के लिए।

Verse 25

समुद्रमवगाढांश्च पर्वतान्पत्तनानि च।मन्दरस्य च ये कोटिं संश्रिताः केचिदायताम्।।4.40.25।।कर्णप्रावरणाश्चैव तथा चाप्योष्ठकर्णकाः।घोरलोहमुखाश्चैव जवनाश्चैकपादकाः।।4.40.26।।अक्षया बलवन्तश्च पुरुषाः पुरुषादकाः।किराताः कर्ण चूडाश्च हेमाङ्गा: प्रियदर्शनाः।।4.40.27।।आममीनाशनास्तत्र किराता द्वीपवासिनः।अन्तर्जलचरा घोरा नरव्याघ्रा इति शृताः।।4.40.28।।एतेषामाश्रयास्सर्वे विचेयाः कावनौकसः।गिरिभिर्ये च गम्यन्ते प्लवनेन प्लवेन च।।4.40.29।।

समुद्र के भीतर गहरे स्थित स्थानों में भी, पर्वतों और नगरों में भी खोज करो; और जो कोई मन्दर पर्वत की विस्तीर्ण चोटियों का आश्रय लिए रहते हों, उन्हें भी ढूँढ़ो।

Verse 26

समुद्रमवगाढांश्च पर्वतान्पत्तनानि च।मन्दरस्य च ये कोटिं संश्रिताः केचिदायताम्।।4.40.25।।कर्णप्रावरणाश्चैव तथा चाप्योष्ठकर्णकाः।घोरलोहमुखाश्चैव जवनाश्चैकपादकाः।।4.40.26।।अक्षया बलवन्तश्च पुरुषाः पुरुषादकाः।किराताः कर्ण चूडाश्च हेमाङ्गा: प्रियदर्शनाः।।4.40.27।।आममीनाशनास्तत्र किराता द्वीपवासिनः।अन्तर्जलचरा घोरा नरव्याघ्रा इति शृताः।।4.40.28।।एतेषामाश्रयास्सर्वे विचेयाः कावनौकसः।गिरिभिर्ये च गम्यन्ते प्लवनेन प्लवेन च।।4.40.29।।

कुछ ऐसे हैं जो अपने कान ढँक लेते हैं, और कुछ ऐसे जिनके कान होंठों तक पहुँचते हैं। कुछ के मुख भयानक लोहे के समान हैं, और कुछ अत्यन्त वेगवान एक-पैर वाले हैं।

Verse 27

समुद्रमवगाढांश्च पर्वतान्पत्तनानि च।मन्दरस्य च ये कोटिं संश्रिताः केचिदायताम्।।4.40.25।।कर्णप्रावरणाश्चैव तथा चाप्योष्ठकर्णकाः।घोरलोहमुखाश्चैव जवनाश्चैकपादकाः।।4.40.26।।अक्षया बलवन्तश्च पुरुषाः पुरुषादकाः।किराताः कर्ण चूडाश्च हेमाङ्गा: प्रियदर्शनाः।।4.40.27।।आममीनाशनास्तत्र किराता द्वीपवासिनः।अन्तर्जलचरा घोरा नरव्याघ्रा इति शृताः।।4.40.28।।एतेषामाश्रयास्सर्वे विचेयाः कावनौकसः।गिरिभिर्ये च गम्यन्ते प्लवनेन प्लवेन च।।4.40.29।।

अक्षय और बलवान् ऐसे पुरुष-भक्षक पुरुष भी हैं; तथा किरात भी हैं, जिनकी जटाएँ कानों तक लटकती हैं—स्वर्ण-सम अंगों वाले और देखने में मनोहर।

Verse 28

समुद्रमवगाढांश्च पर्वतान्पत्तनानि च।मन्दरस्य च ये कोटिं संश्रिताः केचिदायताम्।।4.40.25।।कर्णप्रावरणाश्चैव तथा चाप्योष्ठकर्णकाः।घोरलोहमुखाश्चैव जवनाश्चैकपादकाः।।4.40.26।।अक्षया बलवन्तश्च पुरुषाः पुरुषादकाः।किराताः कर्ण चूडाश्च हेमाङ्गा: प्रियदर्शनाः।।4.40.27।।आममीनाशनास्तत्र किराता द्वीपवासिनः।अन्तर्जलचरा घोरा नरव्याघ्रा इति शृताः।।4.40.28।।एतेषामाश्रयास्सर्वे विचेयाः कावनौकसः।गिरिभिर्ये च गम्यन्ते प्लवनेन प्लवेन च।।4.40.29।।

वहाँ द्वीपों में रहने वाले किरात कच्ची मछली खाने वाले कहे जाते हैं। वे जल के भीतर विचरने वाले, अत्यन्त भयानक—‘नर-व्याघ्र’ (मनुष्य-रूप बाघ) के नाम से प्रसिद्ध हैं॥

Verse 29

समुद्रमवगाढांश्च पर्वतान्पत्तनानि च।मन्दरस्य च ये कोटिं संश्रिताः केचिदायताम्।।4.40.25।।कर्णप्रावरणाश्चैव तथा चाप्योष्ठकर्णकाः।घोरलोहमुखाश्चैव जवनाश्चैकपादकाः।।4.40.26।।अक्षया बलवन्तश्च पुरुषाः पुरुषादकाः।किराताः कर्ण चूडाश्च हेमाङ्गा: प्रियदर्शनाः।।4.40.27।।आममीनाशनास्तत्र किराता द्वीपवासिनः।अन्तर्जलचरा घोरा नरव्याघ्रा इति शृताः।।4.40.28।।एतेषामाश्रयास्सर्वे विचेयाः कावनौकसः।गिरिभिर्ये च गम्यन्ते प्लवनेन प्लवेन च।।4.40.29।।

इन वनवासियों के सब आश्रय-स्थानों की खोज करनी चाहिए; और वे स्थान भी, जो पर्वतों से, छलाँग लगाकर तथा तैरकर भी पहुँचे जाते हैं॥

Verse 30

रत्नवन्तं यवद्वीपं सप्तराज्योपशोभितम्।सुवर्णरूप्यकं चैव सुवर्णाकरमण्डितम्।।4.40.30।।यवद्वीपमतिक्रम्य शिशिरो नाम पर्वतः।दिवं स्पृशति शृङ्गेण देवदानवसेवितः।।4.40.31।।एतेषां गिरिदुर्गेषु प्रपातेषु वनेषु च।मार्गध्वं सहितास्सर्वे रामपत्नीं यशस्विनीम्।।4.40.32।।

रत्नों से सम्पन्न यवद्वीप को जाओ—जो सात राज्यों की शोभा से विभूषित है, स्वर्ण-रजत से समृद्ध है, और स्वर्ण-खानों से अलंकृत है॥

Verse 31

रत्नवन्तं यवद्वीपं सप्तराज्योपशोभितम्।सुवर्णरूप्यकं चैव सुवर्णाकरमण्डितम्।।4.40.30।।यवद्वीपमतिक्रम्य शिशिरो नाम पर्वतः।दिवं स्पृशति शृङ्गेण देवदानवसेवितः।।4.40.31।।एतेषां गिरिदुर्गेषु प्रपातेषु वनेषु च।मार्गध्वं सहितास्सर्वे रामपत्नीं यशस्विनीम्।।4.40.32।।

यवद्वीप को पार करके ‘शिशिर’ नामक पर्वत है; वह अपने शिखर से मानो आकाश को स्पर्श करता है, और देवों तथा दानवों द्वारा सेवित है॥

Verse 32

रत्नवन्तं यवद्वीपं सप्तराज्योपशोभितम्।सुवर्णरूप्यकं चैव सुवर्णाकरमण्डितम्।।4.40.30।।यवद्वीपमतिक्रम्य शिशिरो नाम पर्वतः।दिवं स्पृशति शृङ्गेण देवदानवसेवितः।।4.40.31।।एतेषां गिरिदुर्गेषु प्रपातेषु वनेषु च।मार्गध्वं सहितास्सर्वे रामपत्नीं यशस्विनीम्।।4.40.32।।

इन दुर्गम पर्वत-दुर्गों, प्रपातों और वनों में तुम सब एक साथ मिलकर यशस्विनी श्रीराम-पत्नी का भली-भाँति अन्वेषण करो।

Verse 33

ततो रक्तजलं शोणमगाधं शीघ्रगामिनम्।गत्वा पारं समुद्रस्य सिद्धचारणसेवितम्।।4.40.33।।तस्य तीर्थेषु रम्येषु विचित्रेषु वनेषु च।रावण स्सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्ततः।।4.40.34।।

फिर रक्तजल वाले, अगाध और शीघ्रगामी शोण नदी तक जाकर, उसके आगे सिद्धों और चारणों से सेवित समुद्र के पार-तट पर पहुँचो।

Verse 34

ततो रक्तजलं शोणमगाधं शीघ्रगामिनम्।गत्वा पारं समुद्रस्य सिद्धचारणसेवितम्।।4.40.33।।तस्य तीर्थेषु रम्येषु विचित्रेषु वनेषु च।रावण स्सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्ततः।।4.40.34।।

उसके रमणीय तीर्थों और विचित्र वनों में, जहाँ-जहाँ हो सके, वहाँ-वहाँ वैदेही सहित रावण का अन्वेषण करना चाहिए।

Verse 35

तत स्समुद्रद्वीपांश्च सुभीमान्द्रष्टुमर्हथ।ऊर्मिमन्तं समुद्रं च क्रोशन्तमनिलोद्धतम्।।4.40.35।।

इसके बाद तुम भयावह समुद्र-द्वीपों को भी देखो, और लहरों से भरे, पवन से उद्वेलित, गर्जना करते समुद्र का भी निरीक्षण करो।

Verse 36

तत्रासुरा महाकायाश्छायां गृह्णन्ति नित्यशः।ब्रह्मणा समनुज्ञाता दीर्घकालं बुभुक्षिताः।।4.40.36।।

वहाँ महाकाय असुर नित्य ही (यात्रियों की) छाया को पकड़ लेते हैं; दीर्घकाल से भूखे वे ब्रह्मा से अनुमति प्राप्त हैं।

Verse 37

तं कालमेघप्रतिमं महोरगनिषेवितम्।अभिगम्य महानादं तीर्थेनैव महोदधिम्।।4.40.37।।ततो रक्तजलं भीमं लोहितं नाम सागरम्।गत्वा प्रेक्ष्यथ तां चैव बृहतीं कूटशाल्मलीम्।।4.40.38।।

प्रलयकाल के काले मेघ के समान, महान गर्जना करने वाले और महा-नागों से सेवित उस महोदधि (महासागर) के तट-मार्ग से जाकर तुम उसके निकट पहुँचोगे।

Verse 38

तं कालमेघप्रतिमं महोरगनिषेवितम्।अभिगम्य महानादं तीर्थेनैव महोदधिम्।।4.40.37।।ततो रक्तजलं भीमं लोहितं नाम सागरम्।गत्वा प्रेक्ष्यथ तां चैव बृहतीं कूटशाल्मलीम्।।4.40.38।।

फिर रक्त-जल से भरे, भयानक ‘लोहित’ नामक सागर के पास जाकर, वहीं तुम विशाल कूटशाल्मली वृक्ष को भी देखोगे।

Verse 39

गृहं च वैनतेयस्य नानारत्नविभूषितम्।तत्र कैलाससङ्काशं विहितं विश्वकर्मणा।।4.40.39।।

वहीं तुम वैनतेय (गरुड़) का नाना रत्नों से विभूषित गृह भी देखोगे, जिसे विश्वकर्मा ने कैलास के समान दीप्तिमान बनाकर रचा है।

Verse 40

तत्र शैलनिभा भीमा मन्देहा नाम राक्षसाः।शैलशृङ्गेषु लम्बन्ते नानारूपा भयावहाः।।4.40.40।।

वहाँ ‘मन्देह’ नामक भयानक राक्षस रहते हैं—पर्वत के समान विशाल, अनेक रूप धारण करने वाले; वे पर्वत-शिखरों की चट्टानों से लटकते रहते हैं और देखने में अत्यन्त भयावह हैं।

Verse 41

ते पतन्ति जले नित्यं सूर्यस्योदयनं प्रति।निहता ब्रह्मतेजोभिरहन्यहनि राक्षसाः।।4.40.41।।अभितप्ताश्च सूर्येण लम्बन्ते स्म पुनः पुनः।

वे राक्षस प्रतिदिन सूर्योदय के समय जल में गिर पड़ते हैं—पवित्र मन्त्र-बल से उत्पन्न ब्रह्मतेज द्वारा दिन-प्रतिदिन मारे हुए। सूर्य की तपिश से दग्ध होकर वे बार-बार फिर नीचे लटकते दिखाई देते हैं।

Verse 42

ततः पाण्डुरमेघाभं क्षीरोदं नाम सागरम्।।4.40.42।।गत्वा द्रक्ष्यथ दुर्धर्षा मुक्ताहारमिवोर्मिभिः।

फिर, हे अजेय वीरों, आगे जाकर तुम ‘क्षीरोद’ नामक सागर को देखोगे, जो धवल मेघों-सा उज्ज्वल है; उसकी तरंगें मानो मोतियों की माला-सी सजी हुई हैं।

Verse 43

तस्य मध्ये महान् श्वेतो ऋषभो नाम पर्वतः।।4.40.43।।दिव्यगन्धैः कुसुमितै राजितैश्च नगैर्वृतः।सरश्च राजतैः पद्मैर्ज्वलितैर्हेमकेसरैः।।4.40.44।।नाम्ना सुदर्शनं नाम राजहंसैस्समाकुलम्।

उस सागर के मध्य में ‘ऋषभ’ नाम का एक महान् श्वेत पर्वत है, जो दिव्य सुगन्ध वाले पुष्पित और शोभायमान उपवनों से घिरा है। वहीं ‘सुदर्शन’ नाम का एक सरोवर है, जिसमें रजत-कमल खिले हैं, जिनके केसर स्वर्ण-सा दमकते हैं, और जो राजहंसों से परिपूर्ण है।

Verse 44

तस्य मध्ये महान् श्वेतो ऋषभो नाम पर्वतः।।4.40.43।।दिव्यगन्धैः कुसुमितै राजितैश्च नगैर्वृतः।सरश्च राजतैः पद्मैर्ज्वलितैर्हेमकेसरैः।।4.40.44।।नाम्ना सुदर्शनं नाम राजहंसैस्समाकुलम्।

उस सागर के मध्य में ‘ऋषभ’ नाम का एक महान् श्वेत पर्वत है, जो दिव्य सुगन्ध वाले पुष्पित और शोभायमान उपवनों से घिरा है। वहीं ‘सुदर्शन’ नाम का एक सरोवर है, जिसमें रजत-कमल खिले हैं, जिनके केसर स्वर्ण-सा दमकते हैं, और जो राजहंसों से परिपूर्ण है।

Verse 45

विबुधाश्चारणा यक्षाः किन्नराश्चाप्सरोगणाः।।4.40.45।।हृष्टास्समभिगच्छन्ति नलिनीं तां रिरंसवः।

देव, चारण, यक्ष, किन्नर और अप्सराओं के गण—हर्षित होकर, विहार की इच्छा से—उस नलिनी (कमल-सर) के पास बार-बार आते हैं।

Verse 46

क्षीरोदं समतिक्रम्य तदा द्रक्ष्यथ वानराः।।4.40.46।।जलोदं सागरं शीघ्रं सर्वभूतभयावहम्।

हे वानरों, क्षीरोद सागर को पार करके तुम शीघ्र ही ‘जलोद’ नामक सागर को देखोगे, जो समस्त प्राणियों के लिए भयावह है।

Verse 47

तत्र तत्कोपजं तेजः कृतं हयमुखं महत्।।4.40.47।।अस्याहुस्तन्महावेगमोदनं सचराचरम्।

वहाँ क्रोध से उत्पन्न महान् ज्वलन्त तेज हयमुख के रूप में प्रकट हुआ। कहते हैं कि उसके प्रचण्ड वेग से प्रेरित होकर चर-अचर समस्त जगत् ही उसका आहार बन जाता है।

Verse 48

तत्र विक्रोशतां नादो भूतानां सागरौकसाम्।।4.40.48।।श्रूयते च समर्थानां दृष्ट्वा तद्बडबामुखम्।

वहाँ समुद्र में रहने वाले प्राणियों की चीत्कार-ध्वनि सुनाई देती है। उस भयङ्कर बडबामुख को देखकर समर्थ जन भी आतंकित हो उठते हैं।

Verse 49

स्वादूदस्योत्तरे देशे योजनानि त्रयोदश।।4.40.49।।जातरूपशिलो नाम महान्कनकपर्वतः।

उस मधुर जल वाले समुद्र के उत्तर दिशा में तेरह योजन दूर ‘जातरूपशिला’ नाम का महान् स्वर्णपर्वत स्थित है।

Verse 50

तत्र चन्द्रप्रतीकाशं पन्नगं धरणीधरम्।।4.40.50।।पद्मपत्रविशालाक्षं ततो द्रक्ष्यथ वानराः।आसीनं पर्वतस्याग्रे सर्वभूतनमस्कृतम्।।4.40.51।।सहस्रशिरसं देवमनन्तं नीलवाससम्।

हे वानरो! वहाँ तुम चन्द्र-प्रभा से दीप्त, पृथ्वी का भार धारण करने वाले, सहस्र-फणधारी देव अनन्त को देखोगे—नील-वस्त्रधारी, पद्मपत्र-सम विशाल नेत्रों वाले, पर्वत-शिखर पर आसीन, और समस्त प्राणियों द्वारा नमस्कृत।

Verse 51

तत्र चन्द्रप्रतीकाशं पन्नगं धरणीधरम्।।4.40.50।।पद्मपत्रविशालाक्षं ततो द्रक्ष्यथ वानराः।आसीनं पर्वतस्याग्रे सर्वभूतनमस्कृतम्।।4.40.51।।सहस्रशिरसं देवमनन्तं नीलवाससम्।

हे वानरो! वहाँ तुम चन्द्र-प्रभा से दीप्त, पृथ्वी का भार धारण करने वाले, सहस्र-फणधारी देव अनन्त को देखोगे—नील-वस्त्रधारी, पद्मपत्र-सम विशाल नेत्रों वाले, पर्वत-शिखर पर आसीन, और समस्त प्राणियों द्वारा नमस्कृत।

Verse 52

त्रिशिराः काञ्चनः केतुस्तालस्तस्य महात्मनः।।4.40.52।।स्थापितः पर्वतस्याग्रे विराजति सवेदिकः।

उस महात्मा का ध्वज पर्वत-शिखर पर वेदी सहित स्थापित है; तीन शिखरों वाला स्वर्णमय ताल-ध्वज वहाँ शोभायमान है।

Verse 53

पूर्वस्यां दिशि निर्माणं कृतं तत् त्रिदशेश्वरैः।।4.40.53।।ततः परं हेममय श्श्रीमानुदयपर्वतः।तस्य कोटिर्दिवं स्पृष्ट्वा शतयोजनमायता।।4.40.54।।जातरूपमयी दिव्या विराजति सवेदिका।

पूर्व दिशा में वह व्यवस्था त्रिदशों के अधिपतियों द्वारा रची गई है। उसके आगे श्रीमान् स्वर्णमय उदय-पर्वत स्थित है; उसकी शिखर-कोटि सौ योजन तक विस्तृत होकर आकाश को स्पर्श करती है, और वहाँ दिव्य स्वर्णमयी वेदी शोभित है।

Verse 54

पूर्वस्यां दिशि निर्माणं कृतं तत् त्रिदशेश्वरैः।।4.40.53।।ततः परं हेममय श्श्रीमानुदयपर्वतः।तस्य कोटिर्दिवं स्पृष्ट्वा शतयोजनमायता।।4.40.54।।जातरूपमयी दिव्या विराजति सवेदिका।

पूर्व दिशा में वह व्यवस्था त्रिदशों के अधिपतियों द्वारा रची गई है। उसके आगे श्रीमान् स्वर्णमय उदय-पर्वत स्थित है; उसकी शिखर-कोटि सौ योजन तक विस्तृत होकर आकाश को स्पर्श करती है, और वहाँ दिव्य स्वर्णमयी वेदी शोभित है।

Verse 55

सालैस्तालैस्तमालैश्च कर्णिकारैश्च पुष्पितैः।।4.40.55।।जातरूपमयैर्दिव्यै श्शोभते सूर्यसन्निभैः।

वह पुष्पित साल, ताल, तमाल और कर्णिकार वृक्षों से सुशोभित है; उनके दिव्य स्वर्णमय पुष्प सूर्य के समान दीप्तिमान हैं।

Verse 56

तत्र योजनविस्तारमुच्छ्रितं दशयोजनम्।।4.40.56।।शृङ्गं सौमनसं नाम जातरूपमयं ध्रुवम्।

वहाँ ‘सौमनस’ नामक अचल स्वर्णमय शृंग है—एक योजन विस्तार वाला और दस योजन ऊँचा।

Verse 57

तत्रपूर्वं पदं कृत्वा पुरा विष्णुस्त्रिविक्रमे।।4.40.57।।द्वितीयं शिखरे मेरोश्चकार पुरुषोत्तमः।

पुराकाल में त्रिविक्रम रूप धारण करने वाले पुरुषोत्तम विष्णु ने वहाँ अपना प्रथम पग रखा; और दूसरा पग मेरु पर्वत के शिखर पर स्थापित किया।

Verse 58

त्तरेण परिक्रम्य जम्बूद्वीपं दिवाकरः।।4.40.58।।दृश्यो भवति भूयिष्ठं शिखरं तन्महोच्छ्रयम्।

जम्बूद्वीप के उत्तर भाग की परिक्रमा करते हुए दिवाकर, उस अत्यन्त ऊँचे शिखर पर पहुँचकर सबसे अधिक स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है।

Verse 59

तत्र वैखानसा नाम वालखिल्या महर्षयः।।4.40.59।।प्रकाशमाना दृश्यन्ते सूर्यवर्णास्तपस्विनः।

वहाँ वैखानस और वालखिल्य नामक महर्षि तपस्वी दिखाई देते हैं—जो सूर्य के समान वर्ण और तेज से प्रकाशित होते हैं।

Verse 60

अयं सुदर्शनो द्वीपः पुरो यस्य प्रकाशते।।4.40.60।।यस्मिं स्तेजश्च चक्षुश्च सर्वप्राणभृतामपि।

यह सुदर्शन नामक द्वीप है, जो सामने प्रकाशमान है; जिसमें सूर्य का तेज और उसी के साथ समस्त प्राणियों की दृष्टि-शक्ति प्रकट होती है।

Verse 61

शैलस्य तस्य शृङ्गेषु कन्दरेषु वनेषु च।।4.40.61।।रावणस्सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्ततः।

उस पर्वत के शिखरों पर, उसकी कन्दराओं में और उसके वनों में—इधर-उधर—वैदेही सहित रावण का अन्वेषण करना चाहिए।

Verse 62

काञ्चनस्य च शैलस्य सूर्यस्य च महात्मनः।।4.40.62।।आविष्टा तेजसा सन्ध्या पूर्वा रक्ता प्रकाशते।

काञ्चन पर्वत और महात्मा सूर्य के तेज से आविष्ट होकर पूर्व दिशा की संध्या लाल वर्ण की होकर प्रकाशमान होती है।

Verse 63

पूर्वमेतत्कृतं द्वारं पृथिव्या भुवनस्य च।।4.40.63।।सूर्यस्योदयनं चैव पर्वा ह्येषा दिगुच्यते।

यह पृथ्वी और जगत के लिए बनाया गया पूर्व का द्वार है; और यहीं से सूर्य का उदय होता है, इसलिए यह दिशा ‘पूर्व’ कहलाती है।

Verse 64

तस्य शैलस्य पृष्ठेषु निर्झरेषु गुहासु च।।4.40.64।।रावण स्सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्ततः।

उस पर्वत की पीठों, ढलानों, झरनों और गुफाओं में—सर्वत्र—वैदेही के साथ रावण का भली-भाँति अन्वेषण करना चाहिए।

Verse 65

ततः परमगम्या स्याद्दिक्पूर्वा त्रिदशावृता।।4.40.65।।रहिता चन्द्रसूर्याभ्यामदृश्या तिमिरावृता।

उसके आगे पूर्व दिशा अत्यन्त दुर्गम है, देवताओं से आवृत है; चन्द्र-सूर्य से रहित, तम से ढकी हुई वह अदृश्य-सी हो जाती है।

Verse 66

शैलेषु तेषु सर्वेषु कन्दरेषु वनेषु च।।4.40.66।।ये च नोक्ता मया देशा विचेया तेषु जानकी।

उन सब पर्वतों में, उनकी कन्दराओं और वनों में, तथा जो प्रदेश मैंने विशेष रूप से नहीं बताए—उनमें भी जानकी का अन्वेषण करना।

Verse 67

एतावद्वानरैश्शक्यं गन्तुं वानरपुङ्गवाः।।4.40.67।।अभास्करममर्यादं न जानीमस्ततः परम्।

हे वानरश्रेष्ठो, यहाँ तक वानरों का जाना सम्भव है; इसके आगे जहाँ सूर्यप्रकाश नहीं और कोई मर्यादा-सीमा नहीं, वहाँ का हमें ज्ञान नहीं।

Verse 68

अधिगम्य तु वैदेहीं निलयं रावणस्य च।।4.40.68।।मासे पूर्णे निवर्तध्वमुदयं प्राप्य पर्वतम्।

उदय पर्वत पर पहुँचकर वैदेही का तथा रावण के निवास का पता लगाओ; और एक मास की अवधि पूर्ण होने पर लौट आओ।

Verse 69

ऊर्ध्वं मासान्न वस्तव्यं वसन्वध्यो भवेन्मम।।4.40.69।।सिद्धार्थास्सन्निवर्तध्वमधिगम्य तु मैथिलीम्।

एक मास से अधिक बाहर न ठहरना; अधिक ठहरे तो मेरे द्वारा दण्ड के पात्र होगे। मैथिली (सीता) को प्राप्त कर कार्य सिद्ध करके पूर्ण सफलता सहित लौट आना।

Verse 70

महेन्द्रकान्तां वनषण्डमण्डितांदिशं चरित्वा निपुणेन वानराः।अवाप्य सीतां रघुवंशजप्रियांततो निवृत्तास्सुखिनो भविष्यथ।।4.40.70।।

हे वानरो, महेन्द्र को प्रिय, वन-उपवनों से शोभित पूर्व दिशा में कुशलतापूर्वक विचरो। रघुवंशज (श्रीराम) की प्रिया सीता को पाकर फिर लौट आना; तब तुम सुरक्षित और सुखी रहोगे।

Frequently Asked Questions

The pivotal action is Rama’s deliberate delegation of command: he refuses to ‘command’ the vanaras directly and assigns operational authority to Sugriva (4.40.13–14). This frames leadership as role-appropriate dharma—Rama as ally and objective-holder, Sugriva as sovereign commander responsible for discipline, deployment, and outcomes.

The chapter teaches that righteous action requires (i) clarity of aim (Sita’s status and Ravana’s locus), (ii) proper governance structure (authority aligned with office), and (iii) time-bound execution (one-month limit). ‘देश-काल-नय’ becomes a moralized strategy: prudence and timing are treated as ethical competencies, not merely tactical skills.

A dense itinerary of the eastern quarter is provided: major rivers (Bhagirathi, Sarayu, Kausiki, Kalindi/Yamuna, Saraswati, Sindhu, Sona), regions and janapadas (Videha, Magadha, Vanga, Anga, etc.), and mytho-geographic sites (Yavadvipa, Sisira mountain, Lohita sea, Kshiroda ocean with Rishabha mountain and Sudarsana lake, Jatarupasila, Ananta’s seat, Udaya mountain). These serve as a narrative ‘search-map’ for the reconnaissance mission.