
प्रस्रवणगिरिवासवर्णनम् (Residence on Mount Prasravana; Counsel during the Rains)
किष्किन्धाकाण्ड
सुग्रीव के अभिषेक के बाद वह किष्किन्धा की गुहा-नगरी में लौटकर राज्य-व्यवस्था सँभालता है। उधर श्रीराम और लक्ष्मण वर्षा-ऋतु में निवास हेतु प्रस्रवण पर्वत पर जाते हैं और वहाँ एक विशाल, स्वच्छ वायु से युक्त गुफा चुनते हैं। इस सर्ग में पर्वत-प्रदेश का सूक्ष्म वर्णन है—रंग-बिरंगे खनिजों से युक्त शिखर, गुफाएँ और झरने, कमल-भरे सरोवर, गुफा के आसपास की दिशागत विशेषताएँ (ईशान्य की ओर उतरान, पश्चिम की ओर ऊँचाई, वायु से सुरक्षित स्थान) तथा पूर्व की ओर बहती निर्मल नदी, जो त्रिकूट की जाह्नवी के समान कही गई है। नदी-तटों पर विविध वृक्ष-पुष्पों का उल्लेख है और पक्षियों, मयूरों, हंसों, सारसों तथा जोड़े में विचरने वाले चक्रवाकों की मधुर ध्वनियाँ वातावरण को पवित्र बनाती हैं। दूर से किष्किन्धा के वाद्य-नगाड़ों का स्वर भी सुनाई देता है, जो सुग्रीव की पुनःसमृद्धि का संकेत है। पर बाह्य सुख-सुविधा के बीच भी श्रीराम का हर्ष अल्प रहता है; उदित चन्द्रमा सीता-स्मृति को तीव्र कर देता है और उन्हें निद्रा नहीं आती। तब लक्ष्मण क्रमबद्ध ढंग से धैर्य बँधाते हैं—विषाद त्यागो, पुरुषार्थ करो, वर्षा बीतने तक प्रतीक्षा रखो और शरद् आते ही दृढ़ संकल्प से शत्रु का विनाश करेंगे। श्रीराम इस उपदेश को स्वीकार कर ऋतु-धर्म के अनुसार संयम का व्रत लेते हैं और सहायता का प्रत्युपकार करना वीरों का धर्म है—कृतज्ञता ही शौर्य की शोभा है—यह नीति स्पष्ट करते हैं।
Verse 1
अभिषिक्ते तु सुग्रीवे प्रविष्टे वानरे गुहाम्।आजगाम सह भ्रात्रा रामः प्रस्रवणं गिरिम्4.27.1।।
सुग्रीव के अभिषेक हो जाने पर और वानर के गुहा-नगर में प्रवेश कर लेने पर, राम अपने भ्राता सहित प्रस्रवण पर्वत पर आए।
Verse 2
शार्दूलमृगसङ्घुष्टं सिंहैर्भीमरवैर्वृतम्।नानागुल्मलतागूढं बहुपादपसङ्कुलम्4.27.2।।ऋक्षवानरगोपुच्छैर्मार्जारैश्च निषेवितम्।मेघराशिनिभं शैलं नित्यं शुचिजलाशयम्।।4.27.3।।
यह पर्वत बाघों और मृगों के शब्दों से गूँजता है, और भयानक गर्जना करने वाले सिंहों से घिरा है। नाना प्रकार की झाड़ियों और लताओं से आच्छादित, अनेक वृक्षों से सघन है। भालुओं, वानरों, लंगूरों तथा वन-बिल्लियों द्वारा सेवित यह शैल मेघ-राशि के समान प्रतीत होता है और इसमें सदा निर्मल जल के सरोवर रहते हैं।
Verse 3
शार्दूलमृगसङ्घुष्टं सिंहैर्भीमरवैर्वृतम्।नानागुल्मलतागूढं बहुपादपसङ्कुलम्4.27.2।।ऋक्षवानरगोपुच्छैर्मार्जारैश्च निषेवितम्।मेघराशिनिभं शैलं नित्यं शुचिजलाशयम्।।4.27.3।।
यह पर्वत बाघों और मृगों के शब्दों से गूँजता है, और भयानक गर्जना करने वाले सिंहों से घिरा है। नाना प्रकार की झाड़ियों और लताओं से आच्छादित, अनेक वृक्षों से सघन है। भालुओं, वानरों, लंगूरों तथा वन-बिल्लियों द्वारा सेवित यह शैल मेघ-राशि के समान प्रतीत होता है और इसमें सदा निर्मल जल के सरोवर रहते हैं।
Verse 4
तस्य शैलस्य शिखरे महतीमायतां गुहाम्।प्रत्यगृह्णत वासार्थं रामस्सौमित्रिणा सह4.27.4।।
उस पर्वत-शिखर पर श्रीराम ने सौमित्रि (लक्ष्मण) के साथ निवास हेतु एक विशाल, विस्तृत गुफा को चुन लिया।
Verse 5
कृत्वा च समयं रामस्सुग्रीवेण सहानघः।कालयुक्तं महद्वाक्यमुवाच रघुनन्दनः4.27.5।।विनीतं भ्रातरं भ्राता लक्ष्मणं लक्ष्मिवर्धनम्।
सुग्रीव के साथ संधि करके निष्पाप रघुनन्दन श्रीराम ने समयोचित, गंभीर वचन अपने विनीत भ्राता लक्ष्मण—जो उनकी कीर्ति बढ़ाने वाले हैं—से कहे॥
Verse 6
इयं गिरिगुहा रम्या विशाला युक्तमारुता।अस्यां वत्स्याम सौमित्रे वर्षरात्रमरिन्दम4.27.6।।
हे सौमित्रे, शत्रुदमन! यह पर्वत-गुहा रमणीय, विशाल और सुगंधित वायु से युक्त है। हम वर्षा-ऋतु की रात्रियाँ यहीं निवास करेंगे॥
Verse 7
गिरिशृङ्गमिदं रम्यमुन्नतं पार्थिवात्मज4.27.7।।श्वेताभिः कृष्णताम्राभिश्शिलाभिरुपशोभितम्।नानाधातुसमाकीर्णं दरीनिर्झरशोभितम्4.27.8।।विविधैर्वृक्षषण्डैश्च चारुचित्रलतायुतम्।नानाविहगसङ्घुष्टं मयूररवनादितम्4.27.9।।मालतीकुन्दगुल्मैश्च सिन्धुवारैश्शिरीषकैः।कदम्बार्जुनसर्जैश्च पुष्पितैरुपशोभितम्4.27.10।।
हे राजकुमार! यह पर्वत-शिखर रमणीय और ऊँचा है।
Verse 8
गिरिशृङ्गमिदं रम्यमुन्नतं पार्थिवात्मज4.27.7।।श्वेताभिः कृष्णताम्राभिश्शिलाभिरुपशोभितम्।नानाधातुसमाकीर्णं दरीनिर्झरशोभितम्4.27.8।।विविधैर्वृक्षषण्डैश्च चारुचित्रलतायुतम्।नानाविहगसङ्घुष्टं मयूररवनादितम्4.27.9।।मालतीकुन्दगुल्मैश्च सिन्धुवारैश्शिरीषकैः।कदम्बार्जुनसर्जैश्च पुष्पितैरुपशोभितम्4.27.10।।
यह श्वेत, कृष्ण और ताम्रवर्ण शिलाओं से सुशोभित है। नाना प्रकार के धातुओं से आकीर्ण है और गुफाओं तथा झरनों की शोभा से विभूषित है।
Verse 9
गिरिशृङ्गमिदं रम्यमुन्नतं पार्थिवात्मज4.27.7।।श्वेताभिः कृष्णताम्राभिश्शिलाभिरुपशोभितम्।नानाधातुसमाकीर्णं दरीनिर्झरशोभितम्4.27.8।।विविधैर्वृक्षषण्डैश्च चारुचित्रलतायुतम्।नानाविहगसङ्घुष्टं मयूररवनादितम्4.27.9।।मालतीकुन्दगुल्मैश्च सिन्धुवारैश्शिरीषकैः।कदम्बार्जुनसर्जैश्च पुष्पितैरुपशोभितम्4.27.10।।
यह विविध वृक्ष-समूहों और मनोहर, चित्र-विचित्र लताओं से युक्त है। नाना पक्षियों के कलरव से गूँजता है और मयूरों के नाद से उल्लसित है।
Verse 10
गिरिशृङ्गमिदं रम्यमुन्नतं पार्थिवात्मज4.27.7।।श्वेताभिः कृष्णताम्राभिश्शिलाभिरुपशोभितम्।नानाधातुसमाकीर्णं दरीनिर्झरशोभितम्4.27.8।।विविधैर्वृक्षषण्डैश्च चारुचित्रलतायुतम्।नानाविहगसङ्घुष्टं मयूररवनादितम्4.27.9।।मालतीकुन्दगुल्मैश्च सिन्धुवारैश्शिरीषकैः।कदम्बार्जुनसर्जैश्च पुष्पितैरुपशोभितम्4.27.10।।
हे राजकुमार! यह रमणीय पर्वत-शिखर अत्यन्त ऊँचा है, श्वेत, कृष्ण और ताम्रवर्ण शिलाओं से सुशोभित है। यह नाना धातुओं से आकीर्ण है तथा गुफाओं और झरनों की शोभा से दीप्त है। विविध वृक्ष-समूहों और मनोहर, चित्र-विचित्र लताओं से युक्त है; अनेक पक्षियों के कलरव से गूँजता है और मयूरों की पुकार से निनादित है। यह पुष्पित मालती-कुन्द के झुरमुटों, सिन्धुवार, शिरीष तथा खिले हुए कदम्ब, अर्जुन और सर्ज वृक्षों से और भी अलंकृत है।
Verse 11
इयं च नलिनी रम्या फ़ुल्लपङ्कजमण्डिता।नातिदूरे गुहायानौ भविष्यति नृपात्मज4.27.11।।
हे नृपात्मज! यह रमणीय नलिनी पूर्ण-विकसित कमलों से मण्डित है; यह गुहा से अधिक दूर नहीं है और हमारे लिए उपयुक्त होगी।
Verse 12
प्रागुदक्प्रवणे देशे गुहा साधु भविष्यति।पश्चाच्चैवोन्नता सौम्य निवातेयं भविष्यति4.27.12।।
हे सौम्य! पूर्व और उत्तर की ओर ढलान वाले प्रदेश में यह गुहा उत्तम प्रकार से स्थित होगी; और पश्चिम की ओर ऊँची होने से यह स्थान प्रबल वायु से सुरक्षित, निर्वात रहेगा।
Verse 13
गुहाद्वारे च सौमित्रे शिला समतला शुभा।श्लक्ष्णा चैवायता चैव भिन्नाञ्जनचयोपमा4.27.13।।
हे सौमित्रि! गुहा-द्वार पर एक शुभ शिला है—समतल, चिकनी और विस्तृत—जो फूटे हुए अंजन-चय के समान दीप्तिमान प्रतीत होती है।
Verse 14
गिरिशृङ्गमिदं तात पश्य चोत्तरतः शुभम्।भिन्नाञ्जनचयाकारमम्भोधरमिवोत्थितम्4.27.14।।
हे तात! उत्तर दिशा में इस शुभ गिरिशिखर को देखो—यह उठे हुए मेघ के समान है और फूटे अंजन-चय के आकार-सा प्रतीत होता है।
Verse 15
दक्षिणस्यामपि दिशि स्थितं श्वेतमिवापरम्।कैलासशिखरप्रख्यं नानाधातुविभूषितम्4.27.15।।
और दक्षिण दिशा में भी एक अन्य शिखर स्थित है, मानो श्वेत—कैलास-शिखर के समान—नाना धातुओं से विभूषित।
Verse 16
प्राचीनवाहिनीं चैव नदीं भृशमकर्दमाम्।गुहायाः पूर्वतः पश्य त्रिकूटे जाह्नवीमिव4.27.16।।चन्दनैस्तिलकैस्तालैस्तमालैरतिमुक्तकैः।पद्मकैः सरलैश्चैव अशोकैश्चैव शोभिताम्4.27.17।।
गुहा के पूर्व में यह प्राचीना-वाहिनी नदी त्रिकूट पर बहती जाह्नवी के समान अत्यन्त निर्मल और कीचड़-रहित दिखती है। चन्दन, तिलक-वृक्ष, ताड़, तमाल, अतिमुक्तक लताएँ, पद्मक, सरल और अशोक वृक्षों से वह सर्वथा शोभायमान है।
Verse 17
प्राचीनवाहिनीं चैव नदीं भृशमकर्दमाम्।गुहायाः पूर्वतः पश्य त्रिकूटे जाह्नवीमिव4.27.16।।चन्दनैस्तिलकैस्तालैस्तमालैरतिमुक्तकैः।पद्मकैः सरलैश्चैव अशोकैश्चैव शोभिताम्4.27.17।।
गुहा के पूर्व में यह प्राचीना-वाहिनी नदी त्रिकूट पर बहती जाह्नवी के समान अत्यन्त निर्मल और कीचड़-रहित दिखती है। चन्दन, तिलक-वृक्ष, ताड़, तमाल, अतिमुक्तक लताएँ, पद्मक, सरल और अशोक वृक्षों से वह सर्वथा शोभायमान है।
Verse 18
वानीरैस्तिमिशैश्चैव वकुलैः केतकैर्धवैः।हिन्तालैस्तिनिशैर्नीपैर्वेत्रकैः कृतमालकैः4.27.18।।तीरजैश्शोभिता भाति नानारूपै स्ततस्ततः।वसनाभरणोपेता प्रमदेवाभ्यलङ्कृता4.27.19।।
वानीर, तिमिश, वकुल, केतकी, धव, हिन्ताल, तिनिश, नीप, वेत्रक और कृतमालक आदि नाना प्रकार के तटवर्ती वृक्षों से यह नदी जगह-जगह शोभित होकर चमकती है—मानो वस्त्र और आभूषण धारण किए कोई सुन्दरी सजी हो।
Verse 19
वानीरैस्तिमिशैश्चैव वकुलैः केतकैर्धवैः।हिन्तालैस्तिनिशैर्नीपैर्वेत्रकैः कृतमालकैः4.27.18।।तीरजैश्शोभिता भाति नानारूपै स्ततस्ततः।वसनाभरणोपेता प्रमदेवाभ्यलङ्कृता4.27.19।।
वानीर, तिमिश, वकुल, केतकी, धव, हिन्ताल, तिनिश, नीप, वेत्रक और कृतमालक आदि नाना प्रकार के तटवर्ती वृक्षों से यह नदी जगह-जगह शोभित होकर चमकती है—मानो वस्त्र और आभूषण धारण किए कोई सुन्दरी सजी हो।
Verse 20
शतशः पक्षिसङ्घैश्च नानानादैर्विनादिता।एकैकमनुरक्तैश्च चक्रवाकैरलङ्कृता।।4.27.20।।पुलिनैरतिरम्यैश्च हंससारससेवितैः।प्रहसन्तीवभात्येषा नारी सर्वविभूषिता।।4.27.21।।
सैकड़ों पक्षी-समूहों के नाना स्वर से यह नदी गूँज रही है और परस्पर अनुरक्त चक्रवाक-युगलों से अलंकृत है। हंसों और सारसों से सेवित अत्यन्त रमणीय बालुका-तटों सहित यह नदी, मानो सर्वाभूषणों से सजी नारी हँसती हुई चमक रही हो।
Verse 21
शतशः पक्षिसङ्घैश्च नानानादैर्विनादिता।एकैकमनुरक्तैश्च चक्रवाकैरलङ्कृता।।4.27.20।।पुलिनैरतिरम्यैश्च हंससारससेवितैः।प्रहसन्तीवभात्येषा नारी सर्वविभूषिता।।4.27.21।।
सैकड़ों पक्षी-समूहों के नाना स्वर से यह नदी गूँज रही है और परस्पर अनुरक्त चक्रवाक-युगलों से अलंकृत है। हंसों और सारसों से सेवित अत्यन्त रमणीय बालुका-तटों सहित यह नदी, मानो सर्वाभूषणों से सजी नारी हँसती हुई चमक रही हो।
Verse 22
क्वचिन्नीलोत्पलैश्छन्ना भाति रक्तोत्पलैः क्वचित्।क्वचिदाभाति शुक्लैश्च दिव्यैः कुमुदकुट्मलैः4.27.22।।
कहीं यह नदी नील कमलों से आच्छादित है, कहीं रक्त कमलों से शोभित होती है, और कहीं दिव्य श्वेत कुमुद-कलीयों से चमक उठती है।
Verse 23
पारिप्लवशतैर्जुष्टा बर्हिक्रौञ्चविनादिता।रमणीया नदी सौम्य मुनिसङ्घैर्निषेविता4.27.23।।
हे सौम्य! यह रमणीय नदी सैकड़ों जलपक्षियों का प्रिय आश्रय है, मयूर और क्रौञ्चों के नाद से गूँजती है तथा मुनि-समूहों द्वारा सेवित है।
Verse 24
पश्य चन्दनवृक्षाणां पङ्क्तीस्सुरचिता इव।ककुभानां च दृश्यन्ते मनसेवोदितास्समम्4.27.24।।
देखो—चन्दन-वृक्षों की पंक्तियाँ मानो देवों ने सुसज्जित की हों; और दिशाएँ भी समान रूप से ऐसी प्रतीत होती हैं, जैसे मन ने ही उन्हें रचा हो।
Verse 25
अहो सुरमणीयोऽयं देशश्शत्रुनिषूदन।दृढं रंस्याव सौमित्रे साध्वत्र निवसावहै4.27.25।।
अहो, हे शत्रुनिषूदन! यह देश अत्यन्त रमणीय है। हे सौमित्रि, निश्चय ही हम यहाँ आनंद करेंगे—आओ, इसी स्थान पर निवास करें।
Verse 26
इतश्च नातिदूरे सा किष्किन्धा चित्रकानना।सुग्रीवस्य पुरी रम्या भविष्यति नृपात्मज4.27.26।।
यहाँ से अधिक दूर नहीं वह चित्रवनों से सुशोभित किष्किन्धा है—हे नृपकुमार, सुग्रीव की वह रमणीय पुरी।
Verse 27
गीतवादित्रनिर्घोषश्श्रूयते जयतां वर।नर्दतां वानराणां च मृदङ्गाडम्बरै स्सह4.27.27।।
हे जयशीलों में श्रेष्ठ, यहाँ गीत और वाद्यों का कोलाहल सुनाई देता है; साथ ही वानरों की गर्जना और मृदंगों की गूँजती ध्वनि भी।
Verse 28
लब्ध्वा भार्यां कपिवरः प्राप्य राज्यं सुहृद्वृतः।ध्रुवं नन्दति सुग्रीवस्सम्प्राप्य महतीं श्रियम्4.27.28।।
कपिश्रेष्ठ सुग्रीव ने पत्नी को पुनः पाकर, मित्रों से घिरकर अपना राज्य प्राप्त किया; महान् समृद्धि को पाकर वह निश्चय ही आनंदित है।
Verse 29
इत्युक्त्वा न्यवसत्तत्र राघवस्सहलक्ष्मणः।बहुदृश्यदरीकुञ्जे तस्मिन्प्रस्रवणे गिरौ4.27.29।।
ऐसा कहकर राघव लक्ष्मण सहित वहीं ठहर गए—उस प्रस्रवण पर्वत पर, जहाँ अनेक मनोहर गुफाएँ और कुंज दृष्टिगोचर होते थे।
Verse 30
सुसुखेऽपि बहुद्रव्ये तस्मिन्हि धरणीधरे।वसतस्तस्य रामस्य रतिरल्पापिना भवेत्4.27.30।।
उस सुखद और बहु-सम्पन्न पर्वत पर रहते हुए भी श्रीराम के हृदय में तनिक भी रति (आनन्द) न उत्पन्न हुई।
Verse 31
हृतां हि भार्यां स्मरतः प्राणेभ्योऽपि गरीयसीम्।उदयाभ्युदितं दृष्ट्वा शशाङ्कं च विशेषतः4.27.31।।
अपहृता अपनी भार्या—जो प्राणों से भी अधिक प्रिय थी—का स्मरण करते हुए, विशेषतः पूर्व दिशा में उदित चन्द्रमा को देखकर उनका विरह और भी बढ़ गया।
Verse 32
आविवेश न तं निद्रा निशासु शयनं गतम्।तत्समुत्थेन शोकेन बाष्पोपहतचेतसम्4.27.32।।
रात्रि में शय्या पर लेटने पर भी उन्हें निद्रा न आई; भीतर से उठते उसी शोक ने, आँसुओं से आच्छन्न चित्त वाले श्रीराम को फिर जकड़ लिया।
Verse 33
तं शोचमानं काकुत्स्थं नित्यं शोकपरायणम्।तुल्यदुःखोऽब्रवीद्भ्राता लक्ष्मणोऽनुनयन्वचः4.27.33।।
सदा शोक में डूबे, विलाप करते काकुत्स्थ (श्रीराम) को देखकर, समान दुःख से पीड़ित भ्राता लक्ष्मण ने उन्हें धैर्य देने वाले सांत्वनावचन कहे।
Verse 34
अलं वीर व्यथां गत्वा न त्वं शोचितुमर्हसि।शोचतो व्यवसीदन्ति सर्वार्था विदितं हि ते4.27.34।।
हे वीर, बस करो—इस व्यथा को त्यागो; तुम्हें शोक करना शोभा नहीं देता। शोक करने वाले के सब प्रयोजन डूब जाते हैं—यह तुम्हें भलीभाँति विदित है।
Verse 35
भवान्क्रियापरो लोके भवान् देवपरायणः।आस्तिको धर्मशीलश्च व्यवसायी च राघव4.27.35।।न ह्यव्यवसितश्शत्रुं राक्षसं तं विशेषतः।समर्थस्त्वं रणे हन्तुं विक्रमैर्जिह्मकारिणम्4.27.36।।
हे राघव, तुम लोक में कर्मनिष्ठ हो; देवपरायण हो। आस्तिक, धर्मशील और उद्योग में अडिग हो।
Verse 36
भवान्क्रियापरो लोके भवान् देवपरायणः।आस्तिको धर्मशीलश्च व्यवसायी च राघव4.27.35।।न ह्यव्यवसितश्शत्रुं राक्षसं तं विशेषतः।समर्थस्त्वं रणे हन्तुं विक्रमैर्जिह्मकारिणम्4.27.36।।
दृढ़ निश्चय के बिना तुम रण में उस शत्रु को—विशेषतः उस राक्षस को—जो कुटिल उपाय करता है, अपने पराक्रम से भी नहीं मार सकोगे।
Verse 37
समुन्मूलय शोकं त्वं व्यवसायं स्थिरं कुरु।ततस्सपरिवारं तं निर्मूलं कुरु राक्षसम्।।4.27.37।।
तुम अपने शोक को जड़ से उखाड़ फेंको और अपना निश्चय दृढ़ करो। तब तुम उस राक्षस को उसके समस्त परिवार सहित निर्मूल कर दोगे।
Verse 38
पृथिवीमपि काकुत्स्थ ससागरवनाचलाम्।परिवर्तयितुं शक्तः किमङ्गपुन रावणम्4.27.38।।
हे काकुत्स्थ, तुम समुद्र, वन और पर्वत सहित पृथ्वी को भी उलट देने में समर्थ हो—फिर रावण की तो बात ही क्या!
Verse 39
शरत्कालं प्रतीक्षस्व प्रावृट्कालोऽयमागतः।ततस्सराष्ट्रं सगणं रावणं त्वं वधिष्यसि4.27.39।।
यह वर्षा-ऋतु आ पहुँची है; तुम शरद्-ऋतु की प्रतीक्षा करो। फिर तुम उसके राज्य और सेना सहित रावण का वध करोगे॥
Verse 40
अहं तु खलु ते वीर्यं प्रसुप्तं प्रतिबोधये।दीप्सैराहुतिभिः काले भस्मच्छन्नमिवानलम्4.27.40।।
मैं तो तुम्हारे सुप्त पराक्रम को जगाता हूँ—जैसे समय आने पर आहुति से भस्म से ढकी अग्नि प्रज्वलित हो उठती है॥
Verse 41
लक्ष्मणस्य तु तद्वाक्यं प्रतिपूज्य हितं शुभम्।राघवस्सुहृदं स्निग्धमिदं वचनमब्रवीत्।।4.27.41।।
लक्ष्मण के उस शुभ और हितकर वचन का आदर करके राघव ने स्नेह और मैत्री से परिपूर्ण ये वचन कहे॥
Verse 42
वाच्यं यदनुरक्तेन स्निग्धेन च हितेन च।सत्यविक्रमयुक्तेन तदुक्तं लक्ष्मण त्वया4.27.42।।
हे लक्ष्मण, तुमने जो कहा है वही कहने योग्य है—भक्तिभाव से युक्त, स्नेहपूर्ण, हितैषी और सत्य-पराक्रम से संपन्न पुरुष जैसा बोलता है, वैसा ही तुमने कहा।
Verse 43
एष शोकः परित्यक्तस्सर्वकार्यावसादकः।विक्रमेष्वप्रतिहतं तेजः प्रोत्साहयाम्यहम्।।4.27.43।।
यह शोक, जो समस्त कार्यों को शिथिल कर देने वाला है, मैं अब त्याग देता हूँ। पराक्रम के कर्मों में मैं अपने भीतर ऐसी अप्रतिहत तेजस्विता को जगाऊँगा।
Verse 44
शरत्कालं प्रतीक्षिष्ये स्थितोऽस्मि वचने तव।सुग्रीवस्य नदीनां च प्रसादमनुपालयन्4.27.44।।
तुम्हारे वचन में स्थिर रहकर मैं शरद्-ऋतु की प्रतीक्षा करूँगा—सुग्रीव की अनुकूलता और नदियों के शांत होने (जल उतरने) की भी प्रतीक्षा करता हुआ।
Verse 45
उपकारेण वीरस्तु प्रतीकारेण युज्यते।अकृतज्ञोऽप्रतिकृतो हन्ति सत्त्ववतां मनः4.27.45।।
वीर पुरुष उपकार का प्रतिकार (उचित प्रत्युपकार) करता है। परंतु कृतघ्न, जो किए हुए का प्रत्युपकार नहीं करता, वह सज्जनों के मन को तोड़ देता है।
Verse 46
अथैव मुक्तःप्रणिधाय लक्ष्मणःकृताञ्जलिस्तत्प्रतिपूज्य भाषितम्।उवाच रामं स्वभिरामदर्शनंप्रदर्शयन्दर्शनमात्मनश्शुभम्4.27.46।।
तब लक्ष्मण ने विचार करके, कही गई बात का आदर करते हुए, हाथ जोड़कर सदा मनोहर दर्शन वाले श्रीराम से कहा—और अपना शुभ मत प्रकट किया।
Verse 47
यथोक्तमेतत्तव सर्वमीप्सितंनरेन्द्र कर्ता न चिराद्धरीश्वरः।शरत्प्रतीक्षः क्षमतामिमं भवान्जलप्रपातं रिपुनिग्रहे धृतः4.27.47।।
हे नरेन्द्र! जैसा आपने कहा है, वैसा ही आपका समस्त अभीष्ट वानराधिपति शीघ्र ही सिद्ध करेगा। आप शरद्-ऋतु की प्रतीक्षा करते हुए, शत्रु-निग्रह के लिए धैर्य धारण कर इस जलप्रपात-काल को सहन करें।
Verse 48
नियम्य कोपं प्रतिपाल्यतां शरत्क्षमस्व मासां श्चतुरो मया सह।वसाचलेऽस्मिन्मृगराजसेवितेसंवर्धयन् शत्रुवधे समुद्यमम्4.27.48।।
क्रोध को संयमित कर शरद्-ऋतु की प्रतीक्षा कीजिए। मेरे साथ इन चार मासों को क्षमा कीजिए। सिंहों से सेवित इस पर्वत पर निवास करते हुए, शत्रु-वध के उद्योग को दृढ़ और पुष्ट कीजिए।
The dilemma is whether sorrow should govern conduct when the mission is urgent. The action prescribed is śoka-nigraha (uprooting grief) and vyavasāya (firm enterprise), coupled with a strategic pause mandated by the rainy season, so that action resumes effectively in autumn.
Lakṣmaṇa frames dharma as purposeful agency: grief obstructs objectives, while steadfast resolve enables righteous victory. Rāma further adds a social ethic—reciprocation of assistance is integral to noble character, and ingratitude harms the moral heart of the virtuous.
Mount Prasravaṇa and its cave-dwelling site; the directional terrain around the cave (northeast descent, western elevation, wind-shelter); a lotus pond; an east-flowing pure river compared to the Jahnavī at Trikūṭa; and audible cultural life from Kiṣkindhā (song, instruments, drums).