
महाभिषेकः — Sugriva’s Coronation and Angada’s Installation
किष्किन्धाकाण्ड
इस सर्ग में शोक से धर्मसम्मत शासन की ओर संक्रमण दिखाया गया है। शौच-स्नान के भीगे वस्त्रों में शोकाकुल सुग्रीव के पास वानर-प्रधान आते हैं—यह शोक-क्रिया की पूर्णता और सार्वजनिक कर्तव्य के लिए तत्परता का संकेत है। हनुमान राम से किश्किन्धा में प्रवेश कर राज-संबंध औपचारिक करने का निवेदन करते हैं; राम पिता की आज्ञा-पालन का स्मरण कराते हुए कहते हैं कि चौदह वर्षों तक वे किसी ग्राम-नगर में प्रवेश नहीं करेंगे, पर राज्य-प्रक्रिया को अनुमति देते हैं कि सुग्रीव समृद्ध गुहा-नगरी में जाकर विधिपूर्वक अभिषिक्त हों। राम आगे आदेश देते हैं कि बाली के ज्येष्ठ पुत्र, पराक्रम में समान अंगद को युवराज के रूप में अभिषेकित किया जाए, जिससे उत्तराधिकार सुरक्षित रहे। साथ ही वे नीति बताते हैं कि श्रावण से आरम्भ होने वाले चार मास के वर्षाकाल में त्वरित अभियान उचित नहीं; कार्तिक के आगमन पर रावण-वध की तैयारी और प्रयत्न किए जाएँ। सुग्रीव किश्किन्धा में प्रवेश करते हैं; प्रजा उन्हें प्रणाम करती है। बंधु और वानर-नायक वैदिक अग्निहोत्र और हवन करते हुए, नदियों-तीर्थों-समुद्रों से लाए पवित्र जल को स्वर्ण कलशों में भरकर, वृषभ-शृंग तथा स्वर्ण घट जैसे मंगल उपकरणों से अभिषेक करते हैं। श्वेत छत्र, चामर, वस्त्र, सुगंध, रत्न, औषधि-लेप और रंग आदि राजचिह्नों का वर्णन कर विधि की पूर्णता से राजवैधता स्थापित होती है। अभिषेक के बाद अंगद युवराज पद पर प्रतिष्ठित होते हैं; ध्वज-पताकाओं से सजी नगरी आनंदित जनसमूह से भर जाती है। सुग्रीव महाभिषेक की सूचना राम को देते हैं और रुमां को पुनः प्राप्त करते हैं—मानो इन्द्र ने अपना राज्य फिर पा लिया हो।
Verse 1
ततश्शोकाभिसन्तप्तं सुग्रीवं क्लिन्नवाससम्।शाखामृगमहामात्राः परिवार्योपतस्थिरे।।
तब शोक से दग्ध, भीगे वस्त्र धारण किए हुए सुग्रीव के चारों ओर वानर-सेनापति और महामंत्री एकत्र हो गए और उसकी सेवा में उपस्थित रहे।
Verse 2
अभिगम्य महाबाहुं राममक्लिष्टकारिणम्।स्थिताः प्राञ्जलयस्सर्वे पितामहमिवर्षयः।।
महाबाहु, क्लेश-निवारक श्रीराम के पास जाकर वे सब हाथ जोड़कर ऐसे खड़े हो गए, जैसे ऋषिगण पितामह ब्रह्मा के सामने खड़े हों।
Verse 3
ततः काञ्चनशैलाभ स्तरुणार्कनिभाननः।अब्रवीत्प्राञ्जलिर्वाक्यं हनूमान्मारुतात्मजः।।
तब मंत्र-विद् जनों ने कुशा बिछाकर जातवेद अग्नि को प्रज्वलित किया और मंत्रों से पवित्र किए हुए हवि की आहुति दी।
Verse 4
भवत्प्रसादात्सुग्रीवः पितृपैतामहं महत्।वानराणां सुदुष्प्रापं प्राप्तो राज्यमिदं प्रभो।।
वहाँ ऐसा कार्य सम्पन्न होने पर प्रसन्न होकर सबने महात्मा राम और लक्ष्मण की बार-बार स्तुति की।
Verse 5
भवता समनुज्ञातः प्रविश्य नगरं शुभम्।।संविधास्यति कार्याणि सर्वाणि ससुहृज्जनः।स्नातोऽयं विविधैर्गन्धैरौषधैश्च यथाविधि।।
आपकी आज्ञा पाकर वह अपने सुहृदों सहित उस शुभ नगर में प्रवेश करेगा और समस्त कार्यों की व्यवस्था करेगा। वह विधिपूर्वक विविध सुगन्धों और औषधियों से स्नान कर चुका है।
Verse 6
भवता समनुज्ञातः प्रविश्य नगरं शुभम्4.26.5।।संविधास्यति कार्याणि सर्वाणि ससुहृज्जनः।स्नातोऽयं विविधैर्गन्धैरौषधैश्च यथाविधि4.26.6।।
आपकी अनुमति से वह अपने मित्रों सहित शुभ नगर में प्रवेश करके सब कार्यों को सुव्यवस्थित करेगा। वह शास्त्रोक्त विधि के अनुसार विविध सुगन्धों और औषधियों से स्नान कर चुका है।
Verse 7
अर्चयिष्यति रत्नैश्च माल्यैश्च त्वां विशेषतः।इमां गिरिगुहां रम्यामभिगन्तुमितोऽर्हसि।।कुरुष्व स्वामिसम्बन्धं वानरान्सम्प्रहर्षय।
वह विशेष रूप से रत्नों और मालाओं से आपका अर्चन करेगा। अतः अब इस रमणीय पर्वत-गुफा में पधारना आपके लिए उचित है; स्वामी से सम्बन्ध स्थापित कीजिए और वानरों को हर्षित कीजिए।
Verse 8
एवमुक्तो हनुमता राघवः परवीरहा।।प्रत्युवाच हनूमन्तं बुद्धिमान्वाक्यकोविदः।
हनुमान् के ऐसा कहने पर, पराक्रमी शत्रुवीरसंहारक, बुद्धिमान् और वाणी-निपुण राघव ने हनुमान् को प्रत्युत्तर दिया।
Verse 9
चतुर्दश समास्सौम्य ग्रामं वा यदि वा पुरम्।।न प्रवेक्ष्यामि हनुमन्पितुर्निर्देशपालकः।
हे सौम्य हनुमान! पिता की आज्ञा का पालन करने वाला मैं चौदह वर्षों तक न किसी ग्राम में, न किसी नगर में प्रवेश करूँगा।
Verse 10
सुसमृद्धां गुहां रम्यां सुग्रीवो वानरर्षभः।।प्रविष्टो विधिवद्वीरः क्षिप्रं राज्येऽभिषिच्यताम्।
वानरों में श्रेष्ठ सुग्रीव उस रमणीय और समृद्ध गुहा-नगरी में प्रवेश करे; और वह वीर विधिपूर्वक शीघ्र ही राज्याभिषेक से अभिषिक्त किया जाए।
Verse 11
एवमुक्त्वा हनूमन्तं रामस्सुग्रीवमब्रवीत्।।वृत्तज्ञो वृत्तसम्पन्नमुदारबलविक्रमम्।
हनुमान से ऐसा कहकर, मर्यादा-ज्ञाता श्रीराम ने सदाचार-संपन्न, उदार बल और पराक्रम से युक्त सुग्रीव से कहा।
Verse 12
इममप्यङ्गदं वीर यौवराज्येऽभिषेचय।।ज्येष्ठस्य स सुतो ज्येष्ठस्सदृशो विक्रमेण ते।अङ्गदोऽयमदीनात्मा यौवराज्यस्य भाजनम्।।
हे वीर! इस अंगद का भी युवराज्य में अभिषेक करो। वह तुम्हारे ज्येष्ठ भ्राता का ज्येष्ठ पुत्र है और पराक्रम में तुम्हारे समान है। यह अंगद दीन-मन वाला नहीं; युवराज्य के पद के योग्य है।
Verse 13
इममप्यङ्गदं वीर यौवराज्येऽभिषेचय4.26.12।।ज्येष्ठस्य स सुतो ज्येष्ठस्सदृशो विक्रमेण ते।अङ्गदोऽयमदीनात्मा यौवराज्यस्य भाजनम्4.26.13।।
हे वीर! इस अंगद को युवराज्य में अभिषिक्त करो। वह वाळी के ज्येष्ठ पुत्र—तुम्हारे ज्येष्ठ भ्राता का पुत्र—और पराक्रम में तुम्हारे समान है। यह अङ्गद अडिग मन वाला, युवराज्य के भार को धारण करने योग्य है।
Verse 14
पूर्वोऽयं वार्षिको मासः श्रावणस्सलिलागमः।प्रवृत्तास्सौम्य चत्वारो मासा वार्षिकसज्ञिकाः।।
हे सौम्य, यह वर्षा-ऋतु का प्रथम मास श्रावण है, जिसमें जल का आगमन आरम्भ होता है। अब वर्षा कहलाने वाले चारों मास प्रवृत्त हो गए हैं॥
Verse 15
नायमुद्योगसमयः प्रविश त्वं पुरीं शुभाम्।अस्मिन्वत्स्याम्यहं सौम्य पर्वते सह लक्ष्मणः।।
यह पराक्रम और उद्योग का समय नहीं है; तुम अपनी शुभ नगरी में प्रवेश करो। हे सौम्य, मैं लक्ष्मण के साथ इसी पर्वत पर निवास करूँगा॥
Verse 16
इयं गिरिगुहा रम्या विशाला युक्तमारुता।प्रभूतसलिला सौम्य प्रभूतकमलोत्पला।।
हे सौम्य सुग्रीव, यह पर्वत-गुहा रमणीय और विशाल है, तथा इसमें सम्यक् वायु का संचार है। यहाँ प्रचुर जल है और बहुत-से कमल व उत्पल खिले हैं॥
Verse 17
कार्तिके समनुप्राप्ते त्वं रावणवधे यत।एष नस्समयस्सौम्य प्रविश त्वं स्वमालयम्।।अभिषिक्तस्व राज्ये च सुहृदस्सम्प्रहर्षय।
कार्तिक मास के आ जाने पर तुम रावण-वध के लिए प्रयत्न करना। हे सौम्य, यही हमारे कार्य का उचित समय है; तुम अपने निवास-नगर में प्रवेश करो। राज्य में विधिवत् अभिषिक्त होकर अपने मित्रों को हर्षित करो॥
Verse 18
इति रामाभ्यनुज्ञातस्सुग्रीवो वानराधिपः।।प्रविवेश पुरीं रम्यां किष्किन्धां वालिपालिताम्।
इस प्रकार राम से अनुमति पाकर वानरों के अधिपति सुग्रीव, वलि द्वारा पूर्व में पालित रमणीय किष्किन्धा नगरी में प्रविष्ट हुआ॥
Verse 19
तं वानरसहस्राणि प्रविष्टं वानरेश्वरम्।।अभिवाद्य प्रविष्टानि सर्वतः पर्यवारयन्।
तब अपने राजा सहित भीतर प्रविष्ट हुए वानरों के सहस्रों दलों ने वानरेश्वर को प्रणाम किया और सेवा-भाव से चारों ओर से घेरकर उपस्थित रहे।
Verse 20
ततः प्रकृतयस्सर्वा दृष्ट्वा हरिगणेश्वरम्।।प्रणम्य मूर्ध्ना पतिता वसुधायां समाहिताः।
तब समस्त प्रजाजन वानर-गणों के स्वामी को देखकर, मस्तक से पृथ्वी को स्पर्श कर प्रणाम करके गिर पड़े और संयमित चित्त से एकत्र होकर बैठ गए।
Verse 21
सुग्रीवः प्रकृतीस्सर्वास्सम्भाष्योत्थाप्य वीर्यवान्।।भ्रातुरन्तःपुरं सौम्यं प्रविवेश महाबलः।
वीर्यवान्, महाबली सुग्रीव ने समस्त प्रजाजनों से मधुर वचन कहकर उन्हें उठाया; फिर वह अपने भ्राता के सौम्य अन्तःपुर में प्रविष्ट हुआ।
Verse 22
प्रविश्य त्वभिनिष्क्रान्तं सुग्रीवं प्लवगेश्वरम्।।अभ्यषिञ्चन्त सुहृदस्सहस्राक्षमिवामराः।
वानरों के स्वामी सुग्रीव भीतर जाकर फिर बाहर निकले; तब उसके सुहृदों ने उसका अभिषेक किया—जैसे देवताओं ने सहस्राक्ष इन्द्र का अभिषेक किया था।
Verse 23
तस्य पाण्डुरमाजह्रुश्छत्रं हेमपरिष्कृतम्।।शुक्ले च वालव्यजने हेमदण्डे यशस्करे।तथा सर्वाणि रत्नानि सर्वबीजौषधीरपिसक्षीराणां च वृक्षाणां प्ररोहान्कुसुमानि च।शुक्लानि चैव वस्त्राणि श्वेतं चैवानुलेपनम्।।सुगन्धीनि च माल्यानि स्थलजान्यम्बुजानि च।चन्दनानि च दिव्यानि गन्धांश्च विविधान्बहून्।।अक्षतं जातरूपं च प्रियङ्गुमधुसर्पिषी।दधि चर्म च वैयाघ्रं वाराही चाप्युपानहौ।।समालम्भनमादाय रोचनां समनश्शिलाम्।आग्मुस्तत्र मुदिता वराः कन्यास्तु षोडश।।
उनके लिए वे स्वर्ण-भूषित धवल छत्र, और यश बढ़ाने वाले स्वर्ण-दण्डयुक्त श्वेत चँवर ले आए। साथ ही सब प्रकार के रत्न, नाना बीज-औषधियाँ, दूध देने वाले वृक्षों के कोमल अंकुर और पुष्प, श्वेत वस्त्र तथा श्वेत अनुलेपन, सुगन्धित मालाएँ—स्थलज और जलज (कमल) दोनों—दिव्य चन्दन और अनेक प्रकार की सुगन्धियाँ, अक्षत और सुवर्ण, प्रियंगु, मधु और घृत, दधि, व्याघ्रचर्म तथा वराह-चर्म की उपानहें भी लाए। रोचना और मनःशिला आदि अभिषेक-सामग्री लेकर सोलह हर्षित, सुन्दरी कन्याएँ वहाँ पहुँचीं।
Verse 24
तस्य पाण्डुरमाजह्रुश्छत्रं हेमपरिष्कृतम्4.26.23।।शुक्ले च वालव्यजने हेमदण्डे यशस्करे।तथा सर्वाणि रत्नानि सर्वबीजौषधीरपि4.26.24सक्षीराणां च वृक्षाणां प्ररोहान्कुसुमानि च।शुक्लानि चैव वस्त्राणि श्वेतं चैवानुलेपनम्4.26.25।।सुगन्धीनि च माल्यानि स्थलजान्यम्बुजानि च।चन्दनानि च दिव्यानि गन्धांश्च विविधान्बहून्4.26.26।।अक्षतं जातरूपं च प्रियङ्गुमधुसर्पिषी।दधि चर्म च वैयाघ्रं वाराही चाप्युपानहौ4.26.27।।समालम्भनमादाय रोचनां समनश्शिलाम्।आग्मुस्तत्र मुदिता वराः कन्यास्तु षोडश4.26.28।।
यह श्लोक दक्षिणी पाठ में 4.26.23–28 का विस्तृत पुनरुक्ति-रूप है। इसमें सुग्रीव के अभिषेक हेतु वही राजचिह्न—छत्र, चँवर आदि—तथा रत्न, बीज-औषधियाँ, श्वेत वस्त्र-अनुलेपन, मालाएँ, चन्दन-सुगन्ध, अक्षत-सुवर्ण, मधु-घृत-दधि, चर्म और उपानह आदि सभी मंगल द्रव्य एकत्र किए जाने का ही वर्णन है।
Verse 25
तस्य पाण्डुरमाजह्रुश्छत्रं हेमपरिष्कृतम्4.26.23।।शुक्ले च वालव्यजने हेमदण्डे यशस्करे।तथा सर्वाणि रत्नानि सर्वबीजौषधीरपि4.26.24सक्षीराणां च वृक्षाणां प्ररोहान्कुसुमानि च।शुक्लानि चैव वस्त्राणि श्वेतं चैवानुलेपनम्4.26.25।।सुगन्धीनि च माल्यानि स्थलजान्यम्बुजानि च।चन्दनानि च दिव्यानि गन्धांश्च विविधान्बहून्4.26.26।।अक्षतं जातरूपं च प्रियङ्गुमधुसर्पिषी।दधि चर्म च वैयाघ्रं वाराही चाप्युपानहौ4.26.27।।समालम्भनमादाय रोचनां समनश्शिलाम्।आग्मुस्तत्र मुदिता वराः कन्यास्तु षोडश4.26.28।।
वे श्वेत वस्त्र और अभिषेक के लिए श्वेत अनुलेपन भी ले आए।
Verse 26
तस्य पाण्डुरमाजह्रुश्छत्रं हेमपरिष्कृतम्4.26.23।।शुक्ले च वालव्यजने हेमदण्डे यशस्करे।तथा सर्वाणि रत्नानि सर्वबीजौषधीरपि4.26.24सक्षीराणां च वृक्षाणां प्ररोहान्कुसुमानि च।शुक्लानि चैव वस्त्राणि श्वेतं चैवानुलेपनम्4.26.25।।सुगन्धीनि च माल्यानि स्थलजान्यम्बुजानि च।चन्दनानि च दिव्यानि गन्धांश्च विविधान्बहून्4.26.26।।अक्षतं जातरूपं च प्रियङ्गुमधुसर्पिषी।दधि चर्म च वैयाघ्रं वाराही चाप्युपानहौ4.26.27।।समालम्भनमादाय रोचनां समनश्शिलाम्।आग्मुस्तत्र मुदिता वराः कन्यास्तु षोडश4.26.28।।
वे सुगन्धित मालाएँ—स्थलज और जलज (कमल) दोनों—तथा दिव्य चन्दन और अनेक प्रकार की सुगन्धियाँ भी ले आए।
Verse 27
तस्य पाण्डुरमाजह्रुश्छत्रं हेमपरिष्कृतम्4.26.23।।शुक्ले च वालव्यजने हेमदण्डे यशस्करे।तथा सर्वाणि रत्नानि सर्वबीजौषधीरपि4.26.24सक्षीराणां च वृक्षाणां प्ररोहान्कुसुमानि च।शुक्लानि चैव वस्त्राणि श्वेतं चैवानुलेपनम्4.26.25।।सुगन्धीनि च माल्यानि स्थलजान्यम्बुजानि च।चन्दनानि च दिव्यानि गन्धांश्च विविधान्बहून्4.26.26।।अक्षतं जातरूपं च प्रियङ्गुमधुसर्पिषी।दधि चर्म च वैयाघ्रं वाराही चाप्युपानहौ4.26.27।।समालम्भनमादाय रोचनां समनश्शिलाम्।आग्मुस्तत्र मुदिता वराः कन्यास्तु षोडश4.26.28।।
वे अक्षत और सुवर्ण, प्रियंगु, मधु और घृत; तथा दधि, व्याघ्रचर्म और वराह-चर्म की उपानहें भी ले आए।
Verse 28
तस्य पाण्डुरमाजह्रुश्छत्रं हेमपरिष्कृतम्4.26.23।।शुक्ले च वालव्यजने हेमदण्डे यशस्करे।तथा सर्वाणि रत्नानि सर्वबीजौषधीरपि4.26.24सक्षीराणां च वृक्षाणां प्ररोहान्कुसुमानि च।शुक्लानि चैव वस्त्राणि श्वेतं चैवानुलेपनम्4.26.25।।सुगन्धीनि च माल्यानि स्थलजान्यम्बुजानि च।चन्दनानि च दिव्यानि गन्धांश्च विविधान्बहून्4.26.26।।अक्षतं जातरूपं च प्रियङ्गुमधुसर्पिषी।दधि चर्म च वैयाघ्रं वाराही चाप्युपानहौ4.26.27।।समालम्भनमादाय रोचनां समनश्शिलाम्।आग्मुस्तत्र मुदिता वराः कन्यास्तु षोडश4.26.28।।
तब वे सुगन्धित लेप, गोरोचना और मनःशिला साथ लेकर, हर्ष से भरी हुई सोलह श्रेष्ठ कन्याएँ वहाँ आ पहुँचीं।
Verse 29
ततस्ते वानरश्रेष्ठं यथाकालं यथाविधि।रत्नैर्वस्त्रैश्च भक्ष्यैश्च तोषयित्वा द्विजर्षभान्।।
फिर, हे वानरश्रेष्ठ! उन्होंने उचित समय और विधि के अनुसार, रत्नों, वस्त्रों और भक्ष्य-दान से श्रेष्ठ ब्राह्मणों को संतुष्ट किया।
Verse 30
ततः कुशपरिस्तीर्णं समिद्धं जातवेदसम्।मन्त्रपूतेन हविषा हुत्वा मन्त्रविदो जनाः।।
तब मंत्र-विद् जनों ने कुशा बिछाकर जातवेद अग्नि को प्रज्वलित किया और मंत्रों से पवित्र किए हुए हवि की आहुति दी।
Verse 31
ततो हेमप्रतिष्ठाने वरास्तरणसंवृते।प्रासादशिखरे रम्ये चित्रमाल्योपशोभिते।।प्राङ्मुखं विविधैर्मन्त्रै: स्थापयित्वा वरासने।नदीनदेभ्यस्संहृत्य तीर्थेभ्यश्च समन्ततः।।आहृत्य च समुद्रेभ्यस्सर्वेभ्यो वानरर्षभाः।अपः कनककुम्भेषु निधाय विमलाश्शुभाः।।शुभैर्वृषभशृङ्गैश्च कलशैश्चापि काञ्चनैः।शास्त्रदृष्टेन विधिना महर्षिविहितेन च।।गजो गवाक्षो गवयश्शरभो गन्धमादनः।मैन्दश्च द्विविदश्चैव हनुमान्जाम्बवान्नलः।।अभ्यषिञ्चन्त सुग्रीवं प्रसन्नेन सुगन्धिना।सलिलेन सहस्राक्षं वसवो वासवं यथा।।
तब चित्र-विचित्र मालाओं से शोभित, रमणीय प्रासाद-शिखर पर उत्तम बिछावन से आच्छादित स्वर्ण-आसन स्थापित किया गया।
Verse 32
ततो हेमप्रतिष्ठाने वरास्तरणसंवृते।प्रासादशिखरे रम्ये चित्रमाल्योपशोभिते4.26.31।।प्राङ्मुखं विविधैर्मन्त्रै: स्थापयित्वा वरासने।नदीनदेभ्यस्संहृत्य तीर्थेभ्यश्च समन्ततः4.26.32।।आहृत्य च समुद्रेभ्यस्सर्वेभ्यो वानरर्षभाः।अपः कनककुम्भेषु निधाय विमलाश्शुभाः4.26.33।।शुभैर्वृषभशृङ्गैश्च कलशैश्चापि काञ्चनैः।शास्त्रदृष्टेन विधिना महर्षिविहितेन च4.26.34।।गजो गवाक्षो गवयश्शरभो गन्धमादनः।मैन्दश्च द्विविदश्चैव हनुमान्जाम्बवान्नलः4.26.35।।अभ्यषिञ्चन्त सुग्रीवं प्रसन्नेन सुगन्धिना।सलिलेन सहस्राक्षं वसवो वासवं यथा4.26.36।।
विविध मंत्रों के साथ उन्हें पूर्वाभिमुख उत्तम आसन पर प्रतिष्ठित करके, चारों ओर से नदियों, नालों और तीर्थों का पवित्र जल एकत्र किया गया।
Verse 33
ततो हेमप्रतिष्ठाने वरास्तरणसंवृते।प्रासादशिखरे रम्ये चित्रमाल्योपशोभिते4.26.31।।प्राङ्मुखं विविधैर्मन्त्रै: स्थापयित्वा वरासने।नदीनदेभ्यस्संहृत्य तीर्थेभ्यश्च समन्ततः4.26.32।।आहृत्य च समुद्रेभ्यस्सर्वेभ्यो वानरर्षभाः।अपः कनककुम्भेषु निधाय विमलाश्शुभाः4.26.33।।शुभैर्वृषभशृङ्गैश्च कलशैश्चापि काञ्चनैः।शास्त्रदृष्टेन विधिना महर्षिविहितेन च4.26.34।।गजो गवाक्षो गवयश्शरभो गन्धमादनः।मैन्दश्च द्विविदश्चैव हनुमान्जाम्बवान्नलः4.26.35।।अभ्यषिञ्चन्त सुग्रीवं प्रसन्नेन सुगन्धिना।सलिलेन सहस्राक्षं वसवो वासवं यथा4.26.36।।
वानर-श्रेष्ठों ने सब समुद्रों से जल मँगाकर, उन निर्मल और मंगलमय जलों को सुवर्ण-कलशों में भरकर रख दिया।
Verse 34
ततो हेमप्रतिष्ठाने वरास्तरणसंवृते।प्रासादशिखरे रम्ये चित्रमाल्योपशोभिते4.26.31।।प्राङ्मुखं विविधैर्मन्त्रै: स्थापयित्वा वरासने।नदीनदेभ्यस्संहृत्य तीर्थेभ्यश्च समन्ततः4.26.32।।आहृत्य च समुद्रेभ्यस्सर्वेभ्यो वानरर्षभाः।अपः कनककुम्भेषु निधाय विमलाश्शुभाः4.26.33।।शुभैर्वृषभशृङ्गैश्च कलशैश्चापि काञ्चनैः।शास्त्रदृष्टेन विधिना महर्षिविहितेन च4.26.34।।गजो गवाक्षो गवयश्शरभो गन्धमादनः।मैन्दश्च द्विविदश्चैव हनुमान्जाम्बवान्नलः4.26.35।।अभ्यषिञ्चन्त सुग्रीवं प्रसन्नेन सुगन्धिना।सलिलेन सहस्राक्षं वसवो वासवं यथा4.26.36।।
मंगलमय वृषभ-शृंगों तथा सुवर्ण-कलशों के साथ, शास्त्रसम्मत और महर्षियों द्वारा विहित विधि से उन्होंने अभिषेक-संस्कार संपन्न किया।
Verse 35
ततो हेमप्रतिष्ठाने वरास्तरणसंवृते।प्रासादशिखरे रम्ये चित्रमाल्योपशोभिते4.26.31।।प्राङ्मुखं विविधैर्मन्त्रै: स्थापयित्वा वरासने।नदीनदेभ्यस्संहृत्य तीर्थेभ्यश्च समन्ततः4.26.32।।आहृत्य च समुद्रेभ्यस्सर्वेभ्यो वानरर्षभाः।अपः कनककुम्भेषु निधाय विमलाश्शुभाः4.26.33।।शुभैर्वृषभशृङ्गैश्च कलशैश्चापि काञ्चनैः।शास्त्रदृष्टेन विधिना महर्षिविहितेन च4.26.34।।गजो गवाक्षो गवयश्शरभो गन्धमादनः।मैन्दश्च द्विविदश्चैव हनुमान्जाम्बवान्नलः4.26.35।।अभ्यषिञ्चन्त सुग्रीवं प्रसन्नेन सुगन्धिना।सलिलेन सहस्राक्षं वसवो वासवं यथा4.26.36।।
गज, गवाक्ष, गवय, शरभ, गन्धमादन तथा मैन्द, द्विविद, हनुमान, जाम्बवान और नल—ये सभी प्रमुख वीर उस अभिषेक-विधि में उपस्थित थे।
Verse 36
ततो हेमप्रतिष्ठाने वरास्तरणसंवृते।प्रासादशिखरे रम्ये चित्रमाल्योपशोभिते4.26.31।।प्राङ्मुखं विविधैर्मन्त्रै: स्थापयित्वा वरासने।नदीनदेभ्यस्संहृत्य तीर्थेभ्यश्च समन्ततः4.26.32।।आहृत्य च समुद्रेभ्यस्सर्वेभ्यो वानरर्षभाः।अपः कनककुम्भेषु निधाय विमलाश्शुभाः4.26.33।।शुभैर्वृषभशृङ्गैश्च कलशैश्चापि काञ्चनैः।शास्त्रदृष्टेन विधिना महर्षिविहितेन च4.26.34।।गजो गवाक्षो गवयश्शरभो गन्धमादनः।मैन्दश्च द्विविदश्चैव हनुमान्जाम्बवान्नलः4.26.35।।अभ्यषिञ्चन्त सुग्रीवं प्रसन्नेन सुगन्धिना।सलिलेन सहस्राक्षं वसवो वासवं यथा4.26.36।।
उन्होंने सुग्रीव का प्रसन्न, सुगन्धित और निर्मल जल से अभिषेक किया—जैसे वसुओं ने देवाधिपति सहस्राक्ष (इन्द्र) का अभिषेक किया था।
Verse 37
अभिषिक्ते तु सुग्रीवे सर्वे वानरपुङ्गवाः।प्रचुक्रुशुर्महात्मानो हृष्टा स्तत्र सहस्रशः ।।
सुग्रीव के अभिषेक होते ही वहाँ सभी वानर-श्रेष्ठ महात्मा हर्ष से भरकर सहस्रों की संख्या में जय-जयकार करने लगे।
Verse 38
रामस्य तु वचः कुर्वन्सुग्रीवो हरिपुङ्गवः।अङ्गदं सम्परिष्वज्य यौवराज्येऽभ्यषेचयत्।।
राम के वचन का पालन करते हुए वानर-श्रेष्ठ सुग्रीव ने अंगद को हृदय से आलिंगन कर युवराज्य पद पर अभिषिक्त किया।
Verse 39
अङ्गदे चाभिषिक्ते तु सानुक्रोशाः प्लवङ्गमाः।साधु साध्विति सुग्रीवं महात्मानोऽभ्यपूजयन्।।
अंगद के भी अभिषेक हो जाने पर करुणामय महात्मा वानरों ने ‘साधु! साधु!’ कहकर सुग्रीव का बार-बार सम्मान किया।
Verse 40
रामं चैव महात्मानं लक्ष्मणं च पुनः पुनः।प्रीताश्च तुष्टुवुस्सर्वे तादृशे तत्र वर्तिते।।
वहाँ ऐसा कार्य सम्पन्न होने पर प्रसन्न होकर सबने महात्मा राम और लक्ष्मण की बार-बार स्तुति की।
Verse 41
हृष्टपुष्टजनाकीर्णा पताकाध्वजशोभिता।बभूव नगरी रम्या किष्किन्धा गिरिगह्वरे।।
गिरि-गुहा में स्थित रमणीय किष्किन्धा नगरी हर्षित और पुष्ट जनसमूह से परिपूर्ण तथा पताकाओं-ध्वजों से शोभित होकर अत्यन्त दीप्तिमान हो उठी।
Verse 42
निवेद्य रामाय तदा महात्मनेमहाभिषेकं कपिवाहिनीपतिः।रुमां च भार्यं प्रतिलभ्य वीर्यवानवाप राज्यं त्रिदशाधिपो यथा।।
तब वानर-सेना के पराक्रमी स्वामी ने महात्मा श्रीराम को उस महाभिषेक का निवेदन किया; और अपनी पत्नी रुमा को पुनः पाकर, त्रिदशाधिप इन्द्र के समान अपना राज्य प्राप्त किया।
Rama refuses to enter any village or city during the fourteen-year exile—an explicit maryādā-based constraint—yet he still enables just governance by authorizing Sugriva’s lawful coronation and the establishment of succession through Angada.
Dharma is enacted through disciplined boundaries and timely policy: vows are not negotiable, but righteous outcomes can be achieved through delegated, ritually legitimate action; additionally, strategy must respect ṛtu (season), postponing major enterprise during the rains.
Kishkindha is framed as a mountain-cavern capital (giri-guhā/purī), and the cultural landmark is the royal abhiṣeka protocol: kuśa-strewn sacred fire, tīrtha waters collected from rivers and oceans, golden vessels, and regalia (chatra, chamaras, banners) that publicly encode sovereignty.