
The Resolve/Undertaking to Slay Śaṅkhāsura (and the Greatness of Kārttika & Ekādaśī)
इस अध्याय में सत्यभामा पूछती हैं—जब समय के सभी विभाग भगवान् के ही रूप हैं, तो कार्त्तिक मास ‘श्रेष्ठ’ क्यों माना गया और एकादशी ‘प्रिय’ क्यों है? देवदेवेश श्रीकृष्ण उत्तर देते हुए नारद के प्राचीन संवाद का वर्णन करते हैं, जिसमें कार्त्तिक की विशेष महिमा प्रकट होती है। कथा के अनुसार सागरपुत्र शंखासुर ने देवताओं को पराजित कर वेदों का अपहरण किया और उन्हें जल में छिपा दिया; वेद भय से जलराशि में लीन हो गए। तब ब्रह्मा, इन्द्र तथा त्रयस्त्रिंश देवों ने स्तुति, दीप, उपचार, संगीत-कीर्तन और रात्रि-जागरण द्वारा भगवान् विष्णु को जगाया और शरण ली। भगवान् प्रसन्न होकर वर देते हैं, कार्त्तिक-व्रत की व्यवस्था बताते हैं—आश्विन शुक्ल एकादशी से लेकर प्रबोधिनी/उद्बोधिनी एकादशी तक जागरण, स्नान, पूजन, दीपदान और भजन-कीर्तन। वे शंखासुर का वध कर वेदों को पुनः लाने का संकल्प करते हैं और बताते हैं कि ये साधन पापशुद्धि, भगवत्कृपा तथा अंततः विष्णुधाम-प्राप्ति का कारण हैं।
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