
The Great Swing Festival (Dolā-mahotsava)
उमा के मासानुसार उत्सव-व्रतों के प्रश्न पर महेश्वर चैत्र शुक्लपक्ष में होने वाले डोलामहोत्सव का विधान बताते हैं। वे विशेष रूप से एकादशी को भगवान् कृष्ण/विष्णु को झूले (डोला) पर विराजमान कर सार्वजनिक पूजा करने का निर्देश देते हैं और कहते हैं कि कलियुग में केवल दर्शन का भी महान् शुद्धिकारक प्रभाव है—भारी पापी भी प्रभु के दर्शन से, तथा प्रेमपूर्वक झूला हिलाने से, पापमुक्त होकर कल्याण पाते हैं। इस उत्सव में देव, नाग, गन्धर्व, अप्सराएँ और ऋषि आदि की दिव्य उपस्थिति का वर्णन है। गायत्री-शैली की उपासना, “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जप, षोडशोपचार पूजा, अंग/कर/शारीरक न्यास, श्री (लक्ष्मी) सहित प्रतिष्ठा, पाँच वाद्यों के साथ आरती, अर्घ्य-समर्पण, गुरु को दक्षिणा, वैष्णवों में प्रसाद-वितरण तथा भक्ति-संगीत और नृत्य का विधान करके इस महोत्सव को विधि और सामूहिक भक्ति—दोनों का संगम बताया गया है।
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