
Glories and Characteristics of Servant-Vaiṣṇavas (Marks of a Vaiṣṇava and Proper Worship)
पार्वती शिव से वैष्णवों के लक्षण और उनकी महिमा पूछती हैं। महेश्वर बताते हैं कि सच्चा वैष्णव शुद्ध, सत्यवादी, क्षमाशील, दयालु, अनासक्त, वेद-विचार में प्रवृत्त, अतिथि-सत्कारी, अग्निहोत्र-पालक और सर्वभूत-हितैषी होता है; उसके शरीर पर शंख-चक्र आदि वैष्णव-चिह्न भी शोभते हैं। भक्तों की निंदा करने से बार-बार नीच योनियों में जन्म मिलता है—यह कठोर चेतावनी दी गई है। फिर अर्चना का विधान आता है—धातु या शिला में गोपाल/कृष्ण की प्रतिमा बनाना, शालग्राम और द्वारावती-शिला का आदर करना, आगम-वैदिक मंत्रों से प्रतिष्ठा करना और षोडशोपचार से पूजा करना। शिव विष्णु और शिव की अभिन्नता का प्रतिपादन करते हैं तथा संप्रदाय-विद्वेष मिलाकर की गई पूजा की निंदा करते हैं। नारद, प्रह्लाद, अम्बरीष, ध्रुव और कलियुग में शूद्र भक्त हरिदास के उदाहरण भक्ति की व्यापकता दिखाते हैं।
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