Adhyaya 82
Uttara KhandaAdhyaya 820

Adhyaya 82

Glories and Characteristics of Servant-Vaiṣṇavas (Marks of a Vaiṣṇava and Proper Worship)

पार्वती शिव से वैष्णवों के लक्षण और उनकी महिमा पूछती हैं। महेश्वर बताते हैं कि सच्चा वैष्णव शुद्ध, सत्यवादी, क्षमाशील, दयालु, अनासक्त, वेद-विचार में प्रवृत्त, अतिथि-सत्कारी, अग्निहोत्र-पालक और सर्वभूत-हितैषी होता है; उसके शरीर पर शंख-चक्र आदि वैष्णव-चिह्न भी शोभते हैं। भक्तों की निंदा करने से बार-बार नीच योनियों में जन्म मिलता है—यह कठोर चेतावनी दी गई है। फिर अर्चना का विधान आता है—धातु या शिला में गोपाल/कृष्ण की प्रतिमा बनाना, शालग्राम और द्वारावती-शिला का आदर करना, आगम-वैदिक मंत्रों से प्रतिष्ठा करना और षोडशोपचार से पूजा करना। शिव विष्णु और शिव की अभिन्नता का प्रतिपादन करते हैं तथा संप्रदाय-विद्वेष मिलाकर की गई पूजा की निंदा करते हैं। नारद, प्रह्लाद, अम्बरीष, ध्रुव और कलियुग में शूद्र भक्त हरिदास के उदाहरण भक्ति की व्यापकता दिखाते हैं।

Shlokas

No shlokas available for this adhyaya yet.