
The Greatness and Transmission of the Viṣṇu Thousand Names (Dialogue of Śiva and Nārada)
नैमिषारण्य के ऋषि सूतजी की स्तुति करके पूछते हैं कि नारद ने हरिनाम का माहात्म्य कैसे जाना। सूत कहते हैं—नारद मेरु पर जाकर ब्रह्मा से पूछते हैं कि विशेषकर कलियुग में कौन-सा साधन प्रधान है; तब ब्रह्मा बताते हैं कि नाम-जप ही मुख्य मार्ग है। वे हरि-नाम की पाप-नाशक शक्ति, तीर्थ-यात्रा और प्रायश्चित्त से भी बढ़कर उसकी महिमा का वर्णन करते हैं और नारद को कैलास भेजते हैं, यह कहकर कि शिव परम वैष्णव हैं और सम्पूर्ण रहस्य उन्हीं को ज्ञात है। कैलास में नारद विश्वेश्वर शिव से विष्णु के सहस्रनाम का उपदेश माँगते हैं। शिव पार्वती को पूर्व में बताए गए रहस्य का स्मरण कराते हुए ऋषि, छन्द, बीज, शक्ति, कीलक, विनियोग तथा न्यास आदि विधि-तत्त्व बताते हैं, फिर सहस्रनाम और उसके फल का पाठ करते हैं। अध्याय के अंत में गोपनीयता, पात्रता और श्रद्धा-भक्ति सहित जप की आज्ञा दी जाती है, तथा शिव एक नाम ‘राम’ के प्रति अपनी विशेष प्रियता भी प्रकट करते हैं।
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